सेना को बदनाम करने की साजिश का सच

लोकमित्र

गत 12 अप्रैल 2016 को श्रीनगर से 40 मील दूर स्थित हंदवाड़ा कस्बे में एक स्कूली लड़की वॉश रूम गई थी। जब वह वॉश रूम के बाहर निकली तो उसके साथ वहीं बाहर मौजूद दो लड़कों ने बदतमीजी करने की कोशिश की। वो वॉश रूम के बाहर उसका इंतजार कर रहे थे, जब लड़की निकली तो उन दो में से एक लड़के ने उसे खींच लिया और छेड़खानी करनी शुरू कर दी। इन दो लड़कों में से एक ने स्कूल की ड्रेस पहन रखी थी, जाहिर है वो उसी उम्र का था। लड़की इस हमले से घबरा गई। वह जोर से चीखी, जिससे कुछ ही दूर पर स्थित एक चेकपोस्ट पर मौजूद सेना का जवान दौड़कर आ गया, तब तक लड़के भाग चुके थे। सेना के जवान के साथ ही आसपास के तमाम दूसरे लोग भी अब तक दौड़कर घटनास्थल तक आ चुके थे। इन तमाम लोगों ने एक घबरायी हुई लड़की और वहीं मौजूद सेना के एक जवान को देखकर कल्पना से एक कहानी गढ़ ली।

लोग लड़की से कुछ पूछते, वह कुछ बताती इसके पहले ही हल्ला मचाने लगे कि सेना के जवान ने लड़की को छेड़ा है। हालांकि अब तक पुलिस के सामने लड़की खुद ऑन रिकॉर्ड यह स्वीकार कर चुकी थी कि उसे सेना के जवान ने नहीं छेड़ा, वह तो उसकी चीख सुनकर दौड़कर आया था। लेकिन अलगाववादी भला इस सच को कहां सुनना चाहते थे, उन्होंने लड़की की इस बयान को नक्कारखाने में न केवल तूती की आवाज के माफिक दबा दिया बल्कि इसे एक और साजिश ठहराने लगे। लोग चौक में इकट्ठे हो गए। उन्होंने सेना के खिलाफ नारे लगाने शुरू कर दिए और थोड़ी ही देर बाद सेना के एक बंकर पर पत्थरबाजी करने लगे।

सेना के जवान पर छेड़खानी की साजिशन रची गई यह कहानी कुछ ही देर में जंगल की आग की तरह पूरे कश्मीर में फैल गई। अलगाववादियों का भला और क्या चाहिए उन्होंने आनन-फानन में कई जगहों में सेना पर पथराव करा दिया ताकि सेना गोली चलाने लगे और ऐसा ही हुआ। कुपवाड़ा में एक भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सेना को मजबूरन गोली चलानी पड़ी। कई लोग घायल हो गए। दो लोगों की मौत हो गई और बाद में एक ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। देखते ही देखते कश्मीर हिंसा और टक्कराव की आग में झुलसने लगा। इसी दौरान जब मीडिया में लड़की के बयान का वीडियो प्रसारित हुआ, जिसमें वो साफ कह रही थी कि सेना के जवान ने उसे नहीं छेड़ा, तो इस पर अलगाववादियों ने लड़की की मां को कुछ इस तरह से अपने काबू में किया कि उसके बयान से सच को झूठा साबित किया जा सके।

लड़की की मां ने पत्रकारों के सामने आकर कहा कि उसकी लड़की वर्दी वालों के खौफ से झूठ बोल रही है। लड़की की मां ने मीडिया को कुछ और ही नमक मिर्च लगाकर कहानी सुनायी। उसके मुताबिक दो लड़के ने उसको नहीं छेड़ा था बल्कि लड़की के चीखने पर भागकर आए थे। आखिर भला कौन भाई बहन के चीखने की आवाज सुनकर भागा नहीं चला आयेगा। इस तरह की जुमलेबाजी के जरिए लड़की की मां ने माहौल को और यादा तनावपूर्ण बना दिया, जिससे देखते ही देखते पूरा कश्मीर सेना के विरूद्ध अलगाववादी नारों के साथ गोलबंद हो चुका था।

बहरहाल लड़की को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और लड़की ने फिर एक बार ईमानदारी से मजिस्ट्रेट के सामने भी वही कहा, जो पहले कहा था कि उसके साथ किसी सेना के जवान ने या पुलिस के जवान ने बदतमीजी नहीं की। उसके साथ जोर जबरदस्ती दो लड़के कर रहे थे। लड़की के इस बार के बयान से सबकी बोलती बंद हो गई। क्योंकि इस बार अलगाववादी यह आरोप नहीं लगा सकते थे कि वह वर्दी वालों के दबाव में ऐसा बयान दे रही है, क्योंकि मजिस्ट्रेट के सामने सुनवाई बंद अदालत में होती है। जिस समय यह सुनवाई होती है, वहां कोई मौजूद नहीं होता, न मीडिया, न पुलिस वाले और न ही सैनिक। इससे साफ हो गया कि लड़की को जानबूझकर अलगाववादी इस्तेमाल कर रहे थे। उन्होंने लड़की की मां को तो इस साजिश का हिस्सेदार बना ही लिया था। लेकिन लड़की को साधने में वो नाकाम रहे।

इससे साफ है कि कश्मीर में सिर्फ ईमानदारी से काम करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रशासन के खिलाफ ही अलगाववादी साजिश नहीं रचते बल्कि सेना जैसी ताकतवर संस्था के साथ भी वह ऐसा करने से बाज नहीं आते। वास्तव में कश्मीर में न सिर्फ सियासत, न सिर्फ ईमानदार वॉलंेटियर बल्कि सेना भी अलगाववादियों के कुत्सित विचारों की शिकार है। अलगाववादियों का दुस्साहस इस कदर बढ़ गया है कि वो दूध में दिखती हुई मक्खी को भी सरेआम निगल जाते हैं और बेशर्मी से कहते हैं, मक्खी है कहां? पिछले कई सालों से हर साल अलगाववादियों की साजिश और प्रेरणा के चलते सेना और प्रशासन के विरूद्ध 300 से यादा शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं, ये तमाम शिकायतें अलगाववादियों के इशारों पर ही दर्ज करायी जाती रही हैं। इस तरह देखा जाए तो कश्मीर में सिर्फ आम आदमी या आम कारोबारी ही साजिश का शिकार नहीं है बल्कि अलगाववादियों ने अपने दुस्साहस से सेना को भी रह- रहकर इसके चपेट में लिया है। वक्त आ गया है कि लोकतंत्र के नाम पर, प्रगतिशीलता के नाम पर हम एकदम से सच जाने बिना दूसरी सरकारी एजेंसियों पर आरोपों की बारिश न करें। सेना पर तमाम तरह के आरोप लगाकर उन्हें हतोत्साहित करना, कश्मीर के अलगाववादियों का मुख्य ध्येय है, वह चाहते हैं कि इसमें वो सफल हो जाएं। अलगावादी तो चाहते ही है कि भारतीय सेना की इमेज को किसी भी तरह खराब किया जाए। क्योंकि, उन्हें मालूम है कि जबतक सेना कश्मीर में हैं, उनकी साजिशें नाकाम होती रहेंगी। सेना के जवानों का राष्ट्रप्रेम उन्हें कतई रास नहीं आता। वे येन-केन-प्रकारेण सेना के जवानों को हतोत्साहित करना चाहते हैं।

यही वजह है कि कश्मीर में सेना के खिलाफ अलगाववादी रोज-रोज, नए-नए आरोप मढ़ते हैं। उनका मकसद ही यही है कि सेना के खिलाफ आरोप लगाकर वे भारतीय जनमानस में सेना की बनी अछी इमेज को कमतर करें। वास्तव में वो भारतीय जनमानस से सेना की विश्वसनीयता खत्म करना चाहते हैं। ऐसे में हमें बहुत सचेत रहने की जरूरत है। किसी भी उड़ती हुई खबर पर आंख बंद कर के विश्वास नहीं किया जा सकता है और न ही कोई आम अवधारणा बनाना उचित है। हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि अगर हम अपने घरों में चैन से सो पा रहे हैं तो इसके पीछे हमारे ये सैनिक ही है जो दुश्मनों से दिन-रात जूझ रहे हैं। हमारे सैनिकों पर दोषारोपण कर के ये अलगाववादी पूरी व्यवस्था पर निशाना साधने का प्रयास करते हैं। ऐसे में हमारी छोटी-सी नादानी सेना के इन वीर जवानों के आत्मबल को ठेस पहुंचा सकती है। अत: आम देशवासियों को इस मामले में चौकन्ना रहना होगा कि कश्मीर में अपनी जान की परवाह न करते हुए सुरक्षा का मोर्चा संभालने वाली सेना को अलगाववादी आरोपों के इशारों पर न नचाएं।

(लेखक इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर से जुड़े हैं)

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