फिर जंगलराज के साये में बिहार

उमेश चतुर्वेदी
यह संयोग ही है कि छह मई को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दावा किया कि उनकी बहुचर्चित शराबबंदी योजना से राय में अपराध की घटनाओं में 27 फीसद की कमी आ गई, इसके ठीक दो दिन बाद उनके ही एक एमएलसी के बेटे ने महज रास्ता ना देने के चलते एक छात्र को उड़ा दिया। शराबबंदी की कामयाबी के जश्न के बीच जनता दल(यू) की ही विधानपरिषद सदस्य के बेटे के हाथों एक मासूम की हत्या ने निश्चित तौर पर बिहार की कानून व्यवस्था पर ही सवाल उठाए हैं। गया से विधानपरिषद सदस्य मनोरमा देवी के बेटे ने जिस तरह सरेआम गोली चलाई और फिर उसे भगाने में जिस तरह मनोरमा देवी ने भूमिका निभाई, उससे साफ है कि बिहार में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है।
बेशक नीतीश कुमार के हाथों में राय की कमान है, लेकिन जिस तरह बिहार में राजनीतिक दलों से जुड़े लोग ही अपराधों को अंजाम दे रहे हैं या फिर उन्हें ही निशाना बनाया जा रहा है, उससे संदेश यही जा रहा है कि नीतीश के सुशासन में उनके सहयोगी दलों के चलते दरार पड़ रही है। चूंकि 2005 के पहले तक बिहार को जंगलराज का पर्याय माना जाता था और निश्चित तौर पर इस तथ्य को दुनिया के सामने लाने में नीतीश कुमार की ही बड़ी भूमिका रही थी, लिहाजा एक बार फिर माना जाने लगा है कि बिहार में उसी दौर की वापसी हो रही है। लोक जनशक्ति पार्टी के सांसद चिराग पासवान ने इस घटना के बहाने बिहार में जंगलराज पार्ट दो के आने की आशंका जता ही दी है।
बिहार में करीब दस करोड़ चालीस लाख से यादा लोग रहते हैं। राय ने पिछले साल के नवंबर महीने में दस साल से जारी विकास और सुशासन की राह पर लगातार आगे बढ़ने का सपना देखा था, लेकिन हाल के दिनों में बिहार में जो हुआ है, उससे यह साबित हुआ है कि वहां की जनता की उम्मीदें इस बार जल्द धुलने लगी हैं। दस साल से जिस नीतीश कुमार की अगुआई में बिहार में विकास की नई पटकथा लिखी गई, साफ और चलने योग्य सड़कों का संजाल बढ़ा, बिहार से कम आय वर्ग के लोगों का पलायन घटा, उस बिहार में ऐसा लगता है कि फिलहाल सबकुछ ठीक नहीं है। यह पहला मौका नहीं है, जब नीतीश-लालू जोड़ी के राज में सत्ताधारी दल के किसी विधायक पर संगीन आरोप लगा है। मार्च महीने में ही सत्ताधारी गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय जनता दल के विधायक राजबल्लभ यादव पर एक किशोरी से रेप का आरोप लगा और वे लंबे वक्त तक फरार रहे।

जिस बिहार में दस साल तक कम से कम अपराध बीते दिनों की बात माना जाने लगा था, अचानक उसमें बाढ़ आएगी तो सवाल उठेंगे ही। सवाल उठ भी रहे हैं और माना जाने लगा है कि नीतीश कुमार चाहकर भी अपराधियों पर काबू नहीं कर पा रहे हैं। माना तो यहां तक जा रहा है कि मौजूदा माहौल में नीतीश के लिए पुराने तर्ज पर सुशासन को पटरी पर ला पाना आसान नहीं होगा। दरअसल राय की कड़वी सचाई यह है कि दस साल तक राय की सत्ता से दूर रहे राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकर्ता अपनी पार्टी की सत्ता में वापसी के बाद कुछ यादा ही उत्साह और जोश में हैं। वैसे भी लालू यादव के पंद्रह साल के शासनकाल में उनकी छवि सिर्फ और सिर्फ अराजकत ढंग से काम करने की ही रही है।

बिहार की राष्ट्रीय स्तर पर त्याग और क्रांति की पहचान देने वाली हस्तियों में से एक वीर कुंवर सिंह भी रहे हैं। उनकी ही धरती भोजपुर में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष विश्वेश्वर ओझा की सरेआम हत्या कर दी गई। उन्हीं दिनों रामविलास पासवान की पार्टी के नेता की राघोपुर इलाके में हत्या की गई तो समस्तीपुर में लालू यादव की पार्टी के नेता और व्यापार मंडल के स्थानीय नेता वीरेंद्र यादव को सरेआम छलनी कर दिया गया। नीतीश के सत्ता संभालते ही राय में इंजीनियरों की लगातार हत्याएं हुईं। जनवरी 2016 तक एक आंकड़े के मुताबिक बिहार में 578 हत्याएं हुईं। ऐसा नहीं कि नीतीश कुमार इससे चिंतित नहीं दिखे। उन्होंने दरभंगा में इंजीनियरों की हत्या के बाद वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सूबेभर के डीएम और एसपी से बात की और उन्हें कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए चेतावनी दी।
इसके बावजूद हत्याएं, बलात्कार और रंगदारी मांगने की घटनाओं में कमी नहीं दर्ज की जा रही है। जिस बिहार में दस साल तक कम से कम अपराध बीते दिनों की बात माना जाने लगा था, अचानक उसमें बाढ़ आएगी तो सवाल उठेंगे ही। सवाल उठ भी रहे हैं और माना जाने लगा है कि नीतीश कुमार चाहकर भी अपराधियों पर काबू नहीं कर पा रहे हैं। माना तो यहां तक जा रहा है कि मौजूदा माहौल में नीतीश के लिए पुराने तर्ज पर सुशासन को पटरी पर ला पाना आसान नहीं होगा। दरअसल राय की कड़वी सचाई यह है कि दस साल तक राय की सत्ता से दूर रहे राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकर्ता अपनी पार्टी की सत्ता में वापसी के बाद कुछ यादा ही उत्साह और जोश में हैं। वैसे भी लालू यादव के पंद्रह साल के शासनकाल में उनकी छवि सिर्फ और सिर्फ अराजकत ढंग से काम करने की ही रही है। सवाल यह है कि क्या पिछले दस साल में सत्ता से दूर रहने के चलते उन कार्यकर्ताओं की सोच बदल गई है और वे गांधीवाद के परम अनुयायी बन गए हैं। राय में बढ़ती अपराध की घटनाएं और उसमें सत्ताधारी दल के विधायक का ही शामिल होना दरअसल इसी तरफ इशारा करती हैं कि उनमें बदलाव नहीं आया है।
राय की सत्ताधारी राजनीति की भले ही नीतीश कुमार अगुआई कर रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि उनका दल दूसरे स्थान पर ही है। पहले नंबर पर राष्ट्रीय जनता दल है, जिसके 80 विधायक हैं। 71 विधायकों के साथ जनता दल (यू) का क}जा है। जबकि सहयोगी कांग्रेस के 27 विधायक हैं। जाहिर है कि ऐसे में नीतीश कुमार खुलकर नहीं शासन कर पा रहे हैं। हाल ही में नीतीश कुमार के एक मंत्री और विधायक ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया था कि भारतीय जनता पार्टी से समर्थन का डर दिखाकर दरअसल वे लोग लालू यादव को काबू में रखने की कोशिश कर रहे हैं। दिलचस्प यह है कि बिहार के चुनावों में अपनी गलत नीतियों, योजना और रणनीति के चलते पराजित भाजपा के लिए भी उम्मीद की किरण भी लालू यादव को महसूस कराया जा रहा यह डर ही है। वैसे भी भारतीय जनता पार्टी राय में हताश और पस्त पड़ी है। यही वजह है कि उसके उपाध्यक्ष की हत्या हो जाती है, हत्या को जायज ठहराते हुए जनता दल (यू) के एक विधायक मारे गए उपाध्यक्ष को धरती पर बोझ बताते रहते हैं और भाजपा कुछ कर नहीं पाती। ऐसे में सवाल यह है कि नीतीश राज में जिस जंगलराज की वापसी मानी जाने लगी है, उसका विरोध आखिर कौन करे और उसको एक्सपोज कौन करे?
मीडिया का भी एक काम करने का एक ढर्रा विकसित हो गया है। अगर उसे अपने सत्ता केंद्रों के आसपास खबरें मिलती हैं तो उसे ही वह दुनिया की सबसे बड़ी खबर बनाकर बेचता और परोसता है। भारत जैसे देश में दूर-दराज की खबरें कथित तौर पर राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां कम ही बन पाती हैं। उलटबांसी यह है कि कथित मीडिया की राष्ट्रीय खबरों के पीछे स्थानीय मीडिया भी दौड़ लगाने लगता है। वैसे भाषाई मीडिया का इस दौर में भरपूर विकास हुआ है, लेकिन उसने भी एक नया ट्रेंड स्वीकार कर लिया है। रायों में जैसी बहे बयार पीठ तैसी कीजै की तर्ज पर वह नाम और दाम कमाने में जुट जाता है। ऐसा लगता है कि स्थानीय स्तर पर सरकारों का विरोध कम से कम स्थानीय मीडिया के श}दकोश में नहीं है। इसलिए बिहार में नीतीश की लालू संग ताजपोशी के बाद से लेकर अब तक हो चुकी करीब छह सौ हत्याओं का कहीं कोई जिक्र नहीं है।
मीडिया कन्हैया की घटना से लहालोट है। ऐसे में नीतीश कुमार कन्हैया की बोलने की क्षमता पर बलिहारी क्यों न जाएं। आखिर उनकी नाकामियों से ध्यान हटाने का एक स्पेस जो मिल रहा है। यहीं पर आकर भारतीय लोकतंत्र की सीमाएं भी उजागर होती हैं। आखिर लोकतंत्र किसके लिए है, जनता के लिए, लेकिन जिस राय में जनता ही परेशान हो और उसकी परेशानी के बजाय हवाई बातों पर ही लोकतंत्र का चौथा खंभा मीडिया और लोकतंत्र के औजार राजनीतिक दल ध्यान दे रहे हों तो किया ही क्या जा सकता है? इसलिए जरूरी है कि लोकतंत्र के असल तंत्र लोक को ही जागना होगा। तभी जाकर हकीकत में बदलाव आ पाएगा, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि शुरुआत कहां से हो।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं एवं यह लेख २५ मई को दैनिक जागरण में प्रकाशित है)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Name *