मथुरा कांड : समाजवादी पार्टी सरकार का जातिवादी होना

MATHURA-2 मथुरा जवाहर बाग में कब्जा जमाए ‘रामवृक्ष यादव’ और उसके कथित ‘सत्याग्रहियों’ के खिलाफ देरी से कार्रवाई करने पर उत्तर प्रदेशकी सरकार कठघरे में है। खासकर समाजवादी सरकार के कैबिनेट मंत्री और मुख्यमंत्री के चाचा शिवपाल सिंह यादव की भूमिका पर बड़े प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी सहित अन्य दलों का आरोप है कि समाजवादी पार्टी के संरक्षण में रामवृक्ष यादव और उसके सहयोगी जवाहर बाग जैसे महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल पर कब्जा जमा पाने में कामयाब हो सके। वरना क्या कारण हो सकता है कि बाग के मुख्य द्वार पर तलवार लेकर पहरा देते कथित ‘सत्याग्रहियों’ को पुलिस और प्रशासन प्रतिदिन देख रहे थे, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई करने का साहस नहीं कर सके? आखिर पुलिस पर गोली चलाने का साहस भी आपराधिक किस्म के रामवृक्ष यादव के अनुयायियों में कहाँ से आया? स्वाभाविक है कि उन्हें लगा होगा कि जब सैंया भये कोतवाल, फिर डर काहे का। सरकार का साथ हासिल है तब पुलिस क्या कर लेगी? सरकार के लचर रवैए के कारण पुलिस को अपने दो अधिकारी खोने पड़ गए। सरकार के संरक्षण के बिना यह कैसे संभव है कि एक ओर पुलिस लाइन, एसपी ऑफिस और दूसरी ओर जज कॉलोनी से घिरे जवाहर बाग में दो-ढाई साल कोई अवैध कब्जा जमाए रखे। रामवृक्ष यादव ने यहाँ सिर्फ कब्जा ही नहीं जमा रखा था बल्कि उसके उत्पाति सत्याग्रहियों ने आस-पड़ोस के लोगों का जीना मुहाल कर दिया था। सरकार की भूमिका पर इसलिए भी सवाल उठ रहे हैं कि क्योंकि जब पुलिस अतिक्रमण हटाने गई, तब पुलिस पर रामवृक्ष यादव की ओर से गोलाबारी शुरू हो गई, ऐसे हालात में भी पुलिस को गोली चलाने का आदेश देरी से दिया गया, क्यों? क्या सरकार अपने दो पुलिस अधिकारियों के मारे जाने का इंतजार कर रही थी? या फिर रामवृक्ष यादव और उसकी गैंग को मौका दे रही थी? सरकारी संरक्षण को ठीक से समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि सपा सरकार ने स्वत: या स्थानीय रहवासियों की शिकायत पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं की। बल्कि सरकार ने तो रामवृक्ष यादव को बचाने के लिए हाईकोर्ट के निर्देश की भी अनदेखी कर दी थी। जब हाईकोर्ट ने दोबारा सख्ती दिखाई तब मजबूरी में सरकार को जवाहर बाग में पुलिस भेजनी पड़ी।

        बहरहाल, शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने समाजवादी पार्टी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। स्वामी स्वरूपानंद ने कहा है कि मथुरा में जातिवाद के कारण हिंसा हुई है। मथुरा कांड का मुख्य आरोपी रामवृक्ष ‘यादव’ था और सरकार भी यादवों की है। उन्होंने सवाल उठाया है कि जवाहर बाग में जमा हो रहे अस्त्र-शस्त्र और आसपास के लोगों का उत्पीडऩ सरकार को क्यों नहीं दिखाई दिया? शंकराचार्य ने कहा कि समय रहते ही उचित कदम उठा लिए गए होते तो ऐसा विनाश नहीं होता। स्वामी स्वरूपानंद के आरोप गंभीर हैं। उनके बयान को पुष्ट करने वाले सबूत भले अभी न हों, लेकिन उनके कथन में सच्चाई तो है ही। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने भी कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव का नाम लेते हुए कहा था कि उनके संरक्षण के कारण मथुरा को जलना पड़ा।समाजवादी पार्टी की सरकार पर पहले भी जातिवाद के आरोप लगते रहे हैं। माना जाता है कि समाजवादी पार्टी की सरकार आते ही प्रदेश में यादव और मुस्लिम समुदाय ताकतवर हो जाता है। दोनों समुदायों को भरोसा होता है कि सरकार उनका संरक्षण करेगी। सरकारी नीतियों और फैसलों से भी ऐसा प्रतीत होता है। इसलिए जब सब ओर से सपा सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि जातिवाद के कारण उसने हिंसक लोगों का संरक्षण किया, तब यह अधिक चिंताजनक मामला हो जाता है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को यदि सरकार की छवि बचानी है तब अपने चाचा और कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव से इस्तीफा माँगने का साहस दिखाना चाहिए। इसके साथ ही मामले की निष्पक्ष जाँच के लिए मुख्यमंत्री को केन्द्र सरकार से सीबीआई जाँच की सिफारिश करनी चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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