मोदी के कूटनीतिक दांव में फंसे चीन और पाकिस्तान

अरविंद जयतिलक
अपने दो वर्ष के ऐतिहासिक कालखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की विदेश नीति में बदलाव के एक नए युग की शुरुआत की है। उनकी सफल कूटनीति से अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और रुस सरीखे ताकतवर देश भारत के करीब आए हैं वहीं चीन और पाकिस्तान की भारत विरोधी साझा रणनीति को करारा झटका लगा है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने पांच देशों (अफगानिस्तान, कतर, स्विट्जरलैंड, अमेरिका और मैक्सिको) की सफल यात्रा की है, जिससे भारत को व्यापार, उर्जा और सुरक्षा क्षेत्र में महती उपलब्धि हासिल हुई है वहीं न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) में भारत की सदस्यता का पुरजोर वैश्विक समर्थन से चीन-पाकिस्तान के मंसूबे ध्वस्त हुए हैं। प्रधानमंत्री के हाल की पांच देशों की यात्रा और उनकी पिछली यात्राओं में छिपे कूटनीतिक निहितार्थों को इसलिए समझना आवश्यक है कि वे बिना युद्ध लड़े ही चीन-पाकिस्तान को धुल चटा रहे हैं। दो वर्ष के कालखंड में प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्रा का चीन और पाकिस्तान पर क्या असर हुआ और भविष्य में इन देशों से रिश्ते-नाते कैसे होंगे उसका परीक्षण-मूल्यांकन आवश्यक है।

चीन पर प्रभाव
पहले बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस सधी हुई कूटनीति की जिसकी बदौलत भारत मिसाइल टेक्नोलाजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) में शामिल हुआ है। भारत की इस कामयाबी ने चीन की असहजता बढ़ा दी है और वह मनोवैज्ञानिक रुप से दबाव में आ गया है। दरअसल एमटीसीआर में शामिल होने के बाद भारत अब दूसरे देशों को अपनी मिसाइल टेक्नोलाॅजी बेच सकेगा और जरुरत पड़ने पर अमेरिका से उस प्रिडेटर ड्रोन्स को खरीद भी सकेगा। यह वही तकनीक है जिसने अफगानिस्तान में तालिबान के ठिकानों को पूरी तरह तबाह कर दिया। चीन की सबसे अधिक चिंता भारत की ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर है जो आवाज से भी तीन गुना रफ्तार से दुश्मन के ठिकाने को तबाह करने में सक्षम है। गौरतलब है कि चीन इस मिसाइल को अस्थिरता पैदा करने वाले हथियार के तौर पर देखता है और उसके विरोध कारण ही भारत की पूर्ववर्ती सरकार ने हनोई के साथ सौदा नहीं किया। लेकिन अब भारत चीन की परवाह नहीं करने वाला। बल्कि वह ब्रह्मोस मिसाइल की सौदेबाजी चीन को ध्यान में रखकर ही करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुपरसोनिक मिसाइल तैयार करने वाली कंपनी ब्रह्मोस एयरोस्पेस को उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दे दिए हैं। गौरतलब है कि वियतनाम चीन से अपने बचाव के लिए 2011 से ही ब्रह्मोस मिसाइल को खरीदने की जुगत में है। इसके अलावा मलेशिया, फिलीपींस और इंडोनेशिया भी ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने की कतार में हंै। ध्यान दें तो यह सभी देश दक्षिणी चीन सागर में चीन की साम्राज्यवादी नीति से परेशान हैं। फिलीपींस दक्षिणी चीन सागर मामले में चीन को संयक्ुत राष्ट्र ट्राइब्यूनल तक खींच ले आया है। इस मसले पर भारत और अमेरिका दोनों फिलीपींस के साथ हैं और चाहते हैं कि विवाद का हल अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से हो लेकिन चीन है कि अपनी हठधर्मिता के केंचूल से बाहर आने को तैयार ही नहीं है। अगर भारत चीन से परेशान इन सभी देशों को ब्रह्मोस मिसाइल बेचता है, जैसा कि तय भी है तो निःसंदेह चीन की मुसीबत बढ़ेगी। ऐसे में चीन पाकिस्तान के कंधे पर सवार होकर भारत को लक्षित करने के प्रयास के बजाए अपने पड़ोसियों से मिलने वाली चुनौतियों से पार पाने का रास्ता तलाशेगा। एक कहावत है कि शत्रु का शत्रु मित्र होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सूत्र को गांठ बांध लिया है और चीन को ‘जैसे को तैसा’ की भाषा में सटीक जवाब दे रहे हैं। गौर करें तो भारत-जापान मजबूत होते रिश्ते और दोनों देशों के बीच असैन्य परमाणु सहयोग, रक्षा उपकरण तकनीक और गोपनीय सैन्य सूचना संरक्षण समेत कई महत्वपूर्ण समझौते से भी चीन की बेचैनी बढ़ी है। भारत और जापान के साथ आने से दक्षिणी चीन सागर में उसके बढ़ते हस्तक्षेप को लगाम लगा है और अब वह धौंसबाजी के बजाए शांति के शब्दों को उच्चारित कर रहा है। उधर अमेरिका के साथ लाॅजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम आॅफ एग्रीमेंट सप्लाई एग्रीमेंट (एलईएमओ) ने भी चीन की चिंता बढ़ायी है। इस समझौते से दोनों देशों के युद्धपोत और फाइटर एयरक्राफ्ट एक दूसरे के सैनिक अड्डों का इस्तेमाल तेल भराने एवं अन्य साजो-सामान की आपूर्ति के लिए कर सकेंगे। इससे चीन खौफजदा है और उसे लग रहा है कि भारत और अमेरिका उसकी घेराबंदी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री की इस कूटनीति ने चीन पर मानसिक दबाव बढ़ा दिया है। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी शांति और सहअस्तित्व के पक्षधर हैं और पड़ोसी देशों से बेहतर संबंधों के हिमायती भी। देखा भी गया कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद का शपथ लेने के दिन सभी पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को निमंत्रित किया। साथ ही पड़ोसी देशों की यात्राएं भी की। इसी क्रम में उन्होंने चीन की भी यात्रा की। चीन से उम्मीद थी कि वह इस पहल का स्वागत करते हुए परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) तथा तीन अन्य निर्यात प्रतिबंध एजेंसियों में भारत की पूर्ण सदस्यता का समर्थन करेगा। लेकिन वह जिस तरह अब भी भारत विरोध की छः दशक पुरानी नीति पर कायम है और पाकिस्तान से कंधा जोड़कर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और संस्थाओं में विशेष रुप से परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता और स्थायी सीट का विरोध कर रहा है, उसी का करारा जवाब प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिया जा रहा है। यह किसी से छिपा नहीं है कि वह तिब्बत में मिसाइल बलों की संख्या में वृद्धि करके तथा सामरिक बंदरगाहों की श्रृंखला के द्वारा इसे घेरकर म्यांमार में कोको द्वीप से लेकर पाकिस्तान में ग्वादर तक बना रहा है। लेकिन पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-ईरान चाबहार समझौते को जमीनी आकार देकर भारत को घेरने की उसकी रणनीति की हवा निकाल दी है। भारत-ईरान चाबहार समझौता चीन की ग्वादर रणनीति पर भारी पड़ गया है। गौर करें तो चाबहार बंदरगाह भारत के लिए जितना सामरिक रुप से महत्वपूर्ण है उतना ही आर्थिक रुप से भी। अब भारत चाबहार से इस इलाके में चीन व पाकिस्तान के बीच होने वाली कारोबारी और रणनीतिक गतिविधियों पर आसानी से नजर रख सकेगा। चूंकि ईरान चाबहार को ट्रांजिट हब बनाना चाहता है वह भी एक किस्म से भारत की ही रणनीति के अनुकूल है। इस बंदरगाह ने भारत को अफगानिस्तान और राष्ट्रकूल देशों से लेकर पूर्वी यूरोप तक संपर्क उपलब्ध करा दिया है। अब भारत की वस्तुएं तेजी से ईरान पहुंचेगी और वह वहां से नए रेल व सड़क मार्ग के द्वारा अफगानिस्तान समेत मध्य एशियाई देशों को भी भेजा जा सकेगा। अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण के लिए अब भारत को पाकिस्तान पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। सच तो यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सफल कूटनीति के जरिए चीन से लड़े बिना ही उसे पराजय का खोल पहना दिया है। अन्यथा वह कभी भी 26/11 मुंबई आतंकी हमले में पाकिस्तान की भूमिका को स्वीकार नहीं करता।

पाकिस्तान पर प्रभाव
किसी भी राष्ट्र की विदेशनीति को प्रभावित करना या अपने अनुकूल करना आसान नहीं होता। वह भी तब जब अमेरिका जैसे ताकतवर देश की विदेशनीति को प्रभावित करनी हो अथवा अनुकूल करना हो। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने यह कमाल कर दिखाया है। उन्होंने दशकों पुराने अमेरिका की पाक नीति को काफी हद तक प्रभावित किया है। अन्यथा यों ही नहीं अमेरिका की प्रतिनिधि सभा भारत के साथ रक्षा संबंध विकासित करने और रक्षा उपकरणों की बिक्री तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के मामले में अन्य नाटो के सहयोगी देशों के साथ लाने की पहल के तहत द्विदलीय समर्थन वाले बिल को मंजूरी देती और पाकिस्तान को 8 एफ-16 लड़ाकू विमानों की प्रस्तावित बिक्री पर प्रतिबंध लगाती। यह मान लेना सही नहीं है कि पाकिस्तान के पास पैसा नहीं था इसलिए अमेरिका ने हथियार नहीं दिया। ध्यान दें तो पाकिस्तान को पैसा उसका आका चीन भी उपलब्ध करा सकता था। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की सधी हुई कूटनीति से अमेरिका को अपना फैसला बदलने पर मजबूर होना पड़ा। गौर करें तो यह एक असाधारण उपलब्धि है। यह समझने के लिए जानना होगा कि इससे पहले अमेरिका की पाकनीति क्या रही है। 1954 में अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ सैनिक समझौता करके बहुत अधिक मात्रा में सैन्य सामग्री दिया था जिसका उपयोग उसने 1965 और 1971 के युद्ध में किया। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने अमेरिका के इस कदम का जबरदस्त विरोध किया था। लेकिन अमेरिका ने उनके विरोध को तवज्जों नहीं दी। अमेरिका पाकिस्तान के कितना निकट रहा इसी से समझा जा सकता है कि मई, 1965 में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने जब अमेरिकी राष्ट्रपति जाॅन्सन के निमंत्रण पर वहां की यात्रा का कार्यक्रम बनाया, उसी समय पाकिस्तान के अयूब खान के दौरे के कार्यक्रम के कारण अमेरिका ने अपना निमंत्रण वापस ले लिया। यही नहीं जब भी कभी प्रतिबंधों की बात आयी है तो अमेरिका पाकिस्तान के साथ-साथ भारत को भी किसी प्रकार की अमेरिकी सहायता प्रदान करने पर रोक लगाया है। यानी उसके पलड़े पर भारत और पाकिस्तान बराबर रहे। अफ-पाक नीति के तहत उसने पाकिस्तान पर आंख बंदकर भरोसा किया और उसे मुंह मांगी आर्थिक मदद भी मुहैया करायी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की धारदार कूटनीति ने पाकिस्तान के असली चेहरे को बेनकाब कर अमेरिका को उससे न सिर्फ दूर किया है बल्कि अमेरिकी संसद के जरिए भारत और अमेरिका के अपरिहार्य संबंधों को भी निरुपित किया है। न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप यानी एनएसजी और एमटीसीआर के मसले पर अमेरिका के समर्थन को इसी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। अब मानकर चलना होगा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में पाकिस्तान को पहले जैसा न तो अमेरिका से करोड़ों डाॅलर की आर्थिक सहायता मिलने वाला है और न ही एफ-16 जैसे घातक लड़ाकू विमान। इससे उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर होगी और वह आतंकी संगठनों को आर्थिक मदद नहीं दे सकेगा। इसका कुपरिणाम यह होगा कि पाकिस्तान में अराजकता फैलेगी और बलूचिस्तान तथा पीओके में आजादी के आंदोलन तेज होंगे। सच तो यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका को पाकिस्तान से दूर कर उसकी नकारात्मक कूटनीति की कमर तोड़ दी है। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने चाबहार समझौते और हेरात स्थित सलमा डैम के जरिए ईरान और अफगानिस्तान से संबंध प्रगाढ़ कर पाकिस्तान को अपनी खोल में सिमटने को मजबूर कर दिया है। वह दिन दूर नहीं जब चीन और पाकिस्तान रिश्ते मजबूत करने और आतंकवाद खत्म करने की दुहाई देंगे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक पटल पर सामरिक और कूटनीति का मानदंड गढ़ेंगे।

                                                                                                                                                         (लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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