भारतीय समाज का सच्चा प्रतिविम्ब है लोक-साहित्य

शिवानन्द द्विवेदी
साहित्य समाज का वो आईना होता है जिसमे सदियों-सदियों तक तत्कालीन समाज का पारदर्शी चेहरा अपनी भौगोलिक,सांस्कृतिक एवं सामाजिक विविधताओं के विम्ब रूप में सुरक्षित रहता है। कम शब्दों में कहें तो साहित्य ही वो एकमात्र संचय-यंत्र है जिसमे समाज के हर तत्व को समेट लेने की अक्षय ऊर्जा होती है। इसमें कोई शक नहीं कि साहित्य के मूल्यांकन का मापदंड उसकी रचनाशीलता एवं अपने समाज के मूल स्वरुप के प्रतिचित्रण की चिरकालीनता होनी चाहिए। विविधताओं के समाज वाले भारत देश में समानांतर रूप से साहित्यिक विविधताओं का होना भी स्वाभाविक है। अगर पूर्वी उत्तरप्रदेश एवं मध्य सहित पश्चिमी बिहार की कुल साहित्यिक संपदा एवं रचनाशीलता पर एक विश्लेष्णात्मक नजर डालें तो यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि वहाँ घर-घर में पुरुषों एवं महिलाओं द्वारा तमाम लोकविधाओं पर समग्र लेखन किया जाता रहा है। चुकि उनके लेखन का सीधा सरोकार उनकी सीमित पारंपरिक संस्कृतियों से जुड़ा होता है शायद इसी वजह इस वजह से उनके साहित्य एवं रचनाकर्म को बड़े मंचों पर न तो जगह मिलता है और न ही लाने का प्रयास ही कभी किया जाता है। यहाँ एक बात स्पष्ट करना जरूरी होगा कि दुनिया के हर साहित्य में रचनाकर्म मूलतया दो ही शैली में किया जाता है, गद्य एवं काव्य। लेखनी के मूल मापदंडो पर अगर देखें तो या तो आप गद्य लिख रहे होते हैं या काव्य गढ़ रहे होते हैं। हाँ, गद्य एवं काव्य के अंतर्गत सैकड़ों प्रकार की विधाएं अथवा उपविधायें हो सकती हैं, जैसे गद्य में निबंध,कहानी,नाटक,उपन्यास,एकांकी एवं पद्य में कविता,दोहा,चौपाई,गीत,सोरठा,कह्मुकरी इत्यादि। अब अगर पूर्वी धरा की लोकविधाओं की तरफ जायें तो भोजपुरी,अवधि,मगही भाषा को बोलने वाले लोग साहित्य के गद्य एवं काव्य दोनों ही शैली के बड़े ही पारंगत रचनाकार नजर आयेंगे। बिना किसी चर्चा और बिना किसी विमोचन की प्रचारित औपचारिकता के एक बड़ा साहित्यिक खजाना इस समाज में गुमनाम मिल सकता है। प्रथम दृष्टया अगर गद्य विधा की बात करें तो डॉ राहुल सांकृत्यान नें नारी-दुर्दशा एवं जोंक जैसे कई नाटक आदि भोजपुरी में लिखा है लेकिन राहुल सांकृत्यान की ख्याति में कभी उनकी लोकभाषा की साहित्यिक कृतियों का जिक्र तक नहीं किया जाता है। डॉ राहुल सांकृत्यायन के अलावा डॉ जौहर शाफियाबादी द्वारा लिखित प्रथम भोजपुरी उपन्यास पूर्वी के धाह सहित रामनाथ पाण्डे द्वारा लिखित बिंदिया,इमारितीय काकी, महेंदर मिसिर आदि उपन्यास कृतियाँ साहित्यिक मानदंडो के अनुरूप होने के बावजूद साहित्यिक विमर्श के केन्द्र में नहीं आ सकीं हैं।

लोकसाहित्य का यह दुर्भाग्य ही है कि ऐसे तमाम लेखक-लेखिकाओं को गुमनाम एवं हाशिए पर रखकर हम एक सीमित दायरे में भारत के सम्पूर्ण साहित्य का मूल्यांकन करने का हठ किये बैठे हैं। लेकिन हम भूल रहे हैं कि साहित्य के इस संकुचित दायरे में बैठ कर रचनाओं को गढ़ने की होड़ में हम भारत की समूची साहित्यिक कौशल को कहीं पीछे छोड़ आये हैं और साहित्य की मामूली सामग्री के साथ साहित्य का पैरोकार बने घूम रहे हैं।

इसके अलावा, डॉ विद्या निवास मिश्र द्वारा लिखित निबंध संग्रह मानिक मोर हेरईलें एवं डॉ नीरन द्वारा लिखित पुरइन पात,पाण्डेय कपिल द्वारा लिखित भोजपुरी कृति फुलसुंघी पूर्वी साहित्य की रीढ़-कृतियाँ हैं। साहित्य की व्यंग्य विधा में भी भोजपुरी लोकसाहित्य के पास गुनगगन,लसरा कुटाइन,कबीरा खड़ा बाजार में जैसी कृतियाँ उपलब्ध हैं तो वहीँ यात्रा संस्मरण में लमहर उड़ान,सुनहला सफर जैसे यात्रा संस्मरण लिखे गए हैं। भोजपुरी लोकसाहित्य की की काव्यसंपदा तो उसके गद्य से भी अधिक समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। रघुवीर नारायण द्वारा रचित कालजयी गीत बटोहिया के बोल आज हर भोजपुरिया के लिए गौरव-गीत जैसे हैं। रघुवीर नारायण का यह गीत “सुन्दर सुभूमि भईया भारत की देशवा के मोरे प्रान बसे हिय खोहि रे बटोहिया” बटोहिया गीत के नाम से मशहूर है। इसके अलावा मोती बीए द्वारा रचित गीत संग्रह महुआबारी के तमाम गीत तत्कालीन सिनेमा से आजतक कायम हैं। इसके इतर पूर्वी धरा की महिलायें गीत विधा के अंतर्गत आने वाले लोकगीत जैसे सोहर,झूमर,गारी जैसी उप-विधाओं पर अकूत खजाना गढने के बावजूद विमर्श के पटल से कहीं गायब से हैं। अगर साहित्य में आलोचना के मूल मानदंडों पर सोहर.गारी,झूमर जैसे लोकगीतों की निष्पक्ष समीक्षा की जाय तो स्त्री-साहित्य का एक बड़ा खजाना भोजपुरी लोकसाहित्य की इन उप-विधाओं में हासिल किया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य कि अपनी सामाजिक परम्पराओं के निमित्त रची गयीं उनकी ऐसी तमाम रचनाएं आज हाशिए पर हैं। सोहर की रचना बालजन्म के उत्सव के निमित्त है तो वहीँ गारी उप-विधा रिश्तों में ठिठोली के लिए पूर्वी संस्कारों में खूब चर्चित है। सोहर और गारी जैसी रचनाओं की लेखिकाएं अनाम हैं अथवा अनाम होना उनकी मजबूरी भी है,क्योंकि साहित्य के राष्ट्रीय मानदंडों ने कभी उनको मुख्यधारा के साहित्यिक आलोचना की कसौटी पर कसने की कोशिश ही नहीं की है। सोहर विधा की एक रचना है जो कि हर पूरबिया के आँगन को गुलजार करती है “जुग-जुग जिया तू ललनवा महलवा के भागि जागल हो। ठीक उसी तरह से पूर्वी समाज के आस्था के केन्द्र में विद्यापति की एक रचना आस्था स्वरुप आरती-गीत बनकर कब घर-घर में घर कर गयी पता ही नहीं चला। इस कालजयी कृति में मशहूर मैथिल कवि विद्यापति लिखते हैं “जगदम्बा घर में दियना बारि अईनी हो,जगतारण घर में दियना बार अईनी हो” । इसके अलावा खेती-किसानी के अलग-अलग मौसमों के लिए अलग-अलग रचनाएं भी पूर्वी लोकसाहित्य की पहचान हैं। चैत माह में चईता हो अथवा फागुन का फगुवा हो या सावन में झूला-गीत हो, वहाँ के साहित्य के काव्य-पक्ष के सौंदर्य में चार चाँद लगाता है।
साहित्य के मूल मापदंडों में अगर राग-रंग,छंद,मात्रा एवं लय का कोई स्थान होता है तो साहित्य के रचनाकर्म का वो हर तत्व पूर्वी समाज की इन लोकसाहित्य की पंक्तियों में आसानी से मिल सकता है। दरअसल बुनियादी तौर पर लोकसाहित्य हमारी हमारी जटिल चेतनाओ को सहजता की तरफ उन्मुख करता है और हम बिना किसी बनावट का आवरण ओढ़े अपने मूल सामाजिक स्थिति को पंक्तियों में पिरो देते हैं। लोकसाहित्य पर समीक्षात्मक प्रकाश डालते हुए आधुनिक साहित्य जगत के चर्चित आलोचक एवं अंकारा विश्वविद्यालय टर्की में हिन्दी विषय के प्राध्यापक प्रो. विनोद तिवारी लिखते हैं “ लोक-साहित्य अपने मूल व्यवहार में जीवन की बहुविध जटिलताओं और ग्रंथियों को दुराने वाला सहज माध्यम है | सवाल यह है कि, लोक-साहित्य के समीप हम केवल ‘नास्टेल्जिया’ के चलते जाते हैं या उसको ‘जन’ की रुचियों, उसकी सामुदायिक-सांस्कृतिक बहुलताओं, भिन्न-भिन्न जातियताओं, उनकी जरूरतों, प्रतिरोधों की पहचान करने के लिए जाते हैं | अगर, हम ‘नास्टेल्जिया मात्र के चलते जाते हैं तो लोक-साहित्य को हम पर्यटक की तरह से देखते हुए स्मृतिओं में भाव-विगलित होंगे | पर, अगर उसे जीवन के राग-विराग और संघर्ष की तरह देखेंगे तो उसकी अंतिम सांस्कृतिक-बहुलता और जातीय-पहचान को लक्षित करेंगे | लोक-साहित्य की पढ़त का यह लक्ष्य ही सही अर्थों में ‘लोक’ की पहचान कराता है | अब बड़ा सवाल है कि एक ऐसा साहित्य क्षेत्र जिसके पास नारी-दुर्दशा,फुलसूंघी, जैसी गद्य रचना हो, जिसके पास अपनी तमाम काव्य विधाओं की रचनाओं का भंडार हो,जिस समाज के घर-घर में महिलायें गीत,गारी,सोहर,झूमर,उलटबासी आदि लिखती हों भला उस समाज के लोकसाहित्य को हाशिए पर रखा जाना किस लिहाज से उचित है एवं इसका कारण क्या है ? आज इस तरह के न जाने कितने लोकसाहित्य आलोचना के राष्ट्रीय पटल पर गुमनाम हैं। इन रचनाओं को आलोचना के पटल पर न तो रखा ही जाता है और न ही इनका मूल्यांकन तक करने की जहमत नहीं उठाई जाती। ऐसे में भला सम्पूर्ण भारत की साहित्यिक संपदा का संरक्षण किस तरह से संभव हो सकता है। क्या साहित्य का वृत्त कहानी,उपन्यास,नई कविता एवं चंद संस्मरणों तक ही सिमट कर रह गया है। पूर्वी विधाओं के रचनकारों ने सिर्फ और सिर्फ अपने सामाजिक एवं सांस्कृतिक सरोकारों के खातिर लिखा है,अपने समाज के लिए लिखा है। पूर्वी यूपी में गन्ना किसानो की बदहाली को उकेरते हुए भोजपुरी कवि नर्वदेश्वर देहाती की इन पंक्तियों से बेहतर भला और कौन सी पंक्तिया हो सकती हैं जिसमे वो लिखते हैं “अब ना उंख लउकी ना ही ऊँखियार बबुआ,ना ही लउकी कवनो गाँवे कोल्हार बबुआ’ । लेकिन लोकसाहित्य का यह दुर्भाग्य ही है कि ऐसे तमाम लेखक-लेखिकाओं को गुमनाम एवं हाशिए पर रखकर हम एक सीमित दायरे में भारत के सम्पूर्ण साहित्य का मूल्यांकन करने का हठ किये बैठे हैं। लेकिन हम भूल रहे हैं कि साहित्य के इस संकुचित दायरे में बैठ कर रचनाओं को गढ़ने की होड़ में हम भारत की समूची साहित्यिक कौशल को कहीं पीछे छोड़ आये हैं और साहित्य की मामूली सामग्री के साथ साहित्य का पैरोकार बने घूम रहे हैं।

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