भारतीयता के विरूद्ध जारी षड्यंत्रों का रहस्योद्घाटन करती पुस्तकः ‘अखंड भारत संस्कृति ने जोड़ा राजनीति ने तोड़ा’

शैलेन्द्र कुमार शुक्ला 

वर्तमान इंटरनेट, कप्यूटर और स्मार्ट फोन आदि के दौर में पुस्तकों का बचा रह जाना हैरान कर सकता है। वह भी जब ये गैजेट्स मनुष्य के दैनन्दिन जीवन का अनिवार्य हिस्सा हो चले हों। आजकल इंटरनेट पर सबकुछमिलता है। इस सबकुछका आकर्षण हमें बरबस ही अपनी ओर खींच लेता है। इसमें रचनाओं का अंबार है, जिसे एक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। इसमें एक बहुत बड़ा भ्रम भी है जिससे हमें खबरदार होने की जरूररत है। भ्रम यह है कि इंटरनेट और इससे जुड़े गैजेट्स की गठजोड़ से हमारा ज्ञानवर्धन होता है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि सूचनाएं अंततः सूचनाएं ही होती हैं। दरअसल सूचना और ज्ञान में कमोबेस वही फर्क होता है जो किसी समाचार पत्र और पुस्तक में। समाचार पत्रों से हमारी आँखे खुलती हैं तो पुस्तकों से हमारी दृष्टी निर्मित होती है। यही कारण है कि इस तकनीकि दौर में भी पुस्तकों की प्रासंगिकता और रोमांच बना हुआ है। हालिया दिनों में प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रखर राष्ट्रवादी देवेन्द्र स्वरूप द्वारा सृजितअखंड भारत संस्कृति ने जोड़ा राजनीति ने तोड़ाएक ऐसी पुस्तक आयी है जिस प्रत्येक संवेदनशील अध्येता के बुकसेल्फ में अनिवार्यतः होना चाहिए। अखंड भारत संस्कृति ने जोड़ा राजनीति ने तोड़ाएक ऐसी गंभीर पुस्तक है जो दृष्टी संपन्न बनाती है। हमारे बोध को पैना करती है समझ को विस्तार करती है। जैसा कि इस पुस्तक का शिर्षक है अखंड भारत संस्कृति ने जोड़ा राजनीति ने तोड़ायह अपने नाम से ही अपने विषय का पता देती है। इस पुस्तक का पहला अध्याय ही है अखंड भारतक्या है?

भारत के संदर्भ में अनेकता में एकता का नारा बहुप्रचलित है। भारत विविध भाषा बोली, रीति-रिवाज,पर्व- त्योहार, मान्यताओं और अनूठी भौगोलिक विशेषताओं वाला देश है। अनेकता तो साफ झलकती है लेकिन ऐक्य का वह सुत्र कहां है जिससे अनेकता में एकताकी बात की जाती है? भारत की एकता-अखंडता के जटिल सुत्रों की सुस्पष्ट एवं सफल शिनाख्त इस अध्याय में किया गया है वैसे तो इस पुस्तक में गुंफित चिंतन कुल 29 अध्यायों में विभक्त है। किंतु गौर करने पर आप पाएंगे कि पहले अध्याय अखंड भारत क्या है?’ का ही विस्तार है शेष 28 अध्यायों में। इन शेष 28 अध्यायों में भी दो शाखाएं देखी जा सकती है। आधा हिस्सा भारत के सांस्कृतिक एकता आखंडता, विशिष्टता, अछुण्णता और अविनाशी स्वरूप आदि पर गहरा चिंतन है।

भारत के संदर्भ में अनेकता में एकता का नारा बहुप्रचलित है। भारत विविध भाषा बोली, रीति-रिवाज,पर्व- त्योहार, मान्यताओं और अनूठी भौगोलिक विशेषताओं वाला देश है। अनेकता तो साफ झलकती है लेकिन ऐक्य का वह सुत्र कहां है जिससे अनेकता में एकताकी बात की जाती है? भारत की एकता-अखंडता के जटिल सुत्रों की सुस्पष्ट एवं सफल शिनाख्त इस अध्याय में किया गया है वैसे तो इस पुस्तक में गुंफित चिंतन कुल 29 अध्यायों में विभक्त है। किंतु गौर करने पर आप पाएंगे कि पहले अध्याय अखंड भारत क्या है?’ का ही विस्तार है शेष 28 अध्यायों में। इन शेष 28 अध्यायों में भी दो शाखाएं देखी जा सकती है। आधा हिस्सा भारत के सांस्कृतिक एकता आखंडता, विशिष्टता, अछुण्णता और अविनाशी स्वरूप आदि पर गहरा चिंतन है। तो दूसरे हिस्से में इस पर होने वाले राजनीतिक षडयंत्र, कुचक्र, विभाजनकारी मानसिकता आदि का न सिर्फ पर्दाफाश किया गया है बल्कि इन नाकारात्मकताओं का करारा जवाब भी दिया गया है। छद्म सेकुलर और मार्क्सवादी  जिस गांगा, गीता, राम,रामकथा, रामसेतु तथा रामजन्म भूमि आदि को मात्र धर्म विषेष का विषय बताकर रेड्यूज कर देते हैं उसे श्री देवेन्द्र स्वरूप जी ने अपनी ‘अखंड भारत संस्कृति ने जोड़ा राजनीति ने तोड़ा’ में मजबूत पक्षों-तर्कों के आधार पर इन्हे भारत की विराट सांस्कृतिक शरीर का स्वभाविक एवं जरूरी अंग साबित किया है। 

 उन्होने स्पष्ट बताया है कि हिंदुत्व एक जीवन शैली। संस्कृति है विविध संस्कृतियों का संगम है। इसका अंग-भंग करने वालो की डट कर सामना करती है यह पुस्तक। सबसे खास बात भारत की एकता और अखंडता के खिलाफ बौद्धिक प्रोपेगंडा रचने वाले कू-बुद्धिवादियों की साजिशों को छिन्न-भिन्न करती हैं।  इस पुस्तक की एक विशेषता यह भी है कि इसमें एक परोक्ष संदेश भी निहित है। यह संदेश उन मासूम पाठकों के लिए है जो वामपंथियों की ऐसी साजिश का अंजानें में शिकार हो गए है। जो भारत को मात्र भौगोलिक टूकड़े के रूप में मानकर विचार करता है। यहीं से वे भ्रांतियों के शिकार होते चले जाते हैं। परोक्ष संदेश यह है कि अपने देश पर विचार करने लिए पहले उसे अपना मानों तभी उसकी आत्मा तक पहुंच पाओगे। उसके दुःख दर्द को जान पाओगे। उसमें चित्कार सुन सकोगे। उन लोगों की पहचान कर सकोगे जिन्होने हिंदुस्तान के हृदय में खंजर घोपा है। यह पुस्तक पाठक को भारत के विराट इतिहास संस्कृति एवं राजनीति आदि की धड़कनों का एहसास कराता हुआ वर्तमान के चौखटों पर ला खड़ा करता है। जहां आप अकेले नहीं होते बल्कि इतिहास बोध से संपन्न, राष्ट्र की सेवा के लिए जिम्मेदारी की एहासास से लबरेज,साकारात्मक उर्जा से भरे राष्ट्र सेवा में समर्पित होने को, भारत की भावी चुनौतियों से लड़ने के लिए कर्म क्षेत्र में उभरने की मजबूत मानसिकता के साथ होते हैं। किसी पुस्तक की इससे बड़ी सफलता भी और क्या हो सकती है। ऐसी पुस्तक लिखने के लिए लेखक देवेन्द्र सवरूप जी ने कलम के साथ जैसा संघर्ष किया है वह अनुकरणीय है। उन्हे अनेक शुभकामनाएं।

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