ऐतिहासिक धरोहर है हैदराबाद का गोलकुंडा किला

शिवानन्द द्विवेदी
दक्षिण भारत के आंध्र क्षेत्र के चर्चित शहर हैदराबाद ने अपनी गोद में वहाँ के निजामो और शासकों का विशाल इतिहास सजों कर रखा है। अगर कोई हैदराबाद जाए तो उसे हैदराबाद के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित गोलकोंडा किले का रुख जरुर करना चाहिए। अपनी बनावट एवं बसावट के साथ-साथ तमाम ऐतिहासिक तथ्यों को समेटता हैदराबाद की ग्रेनाईट वाली पहाड़ियों पर निर्मित यह गोलकोंडा किला अपने आप में बहुत कुछ कहता है। गोलकुंडा किले को बाहर से देखने पर तो पहाड़नुमा खंडहर चित्र आँखों से गुजरता है लेकिन अंदर जाने पर ऐसा लगता है मानो पहाड़ों को काट-काटकर किसी खास राजमिस्त्री ने इस किले को गढा होगा। गोलकोंडा का इतिहास लगभग आठ सौ साल पुराना है। इतिहास के पन्ने इस बात की तस्दीक करते हैं कि इसका निर्माण बारंगल के शासकों ने १३वी शताब्दी में कराया था। हालांकि बाद में इस किले की रौनक बाह्मनी एवं कुतुबशाही शासकों की वजह से ही बनी रही। ग्रेनाईट की पहाड़ी पर निर्मित यह किला आज भी पहाड़नुमा खंडहर इस वजह से दिखता है क्योंकि सामान्य सतह से इसकी उचाई लगभग ४२० फीट के आसपास है। अगर इस किले के बनावट पक्ष की बात करें तो इस किलें में आठ भव्य द्वार एवं सत्तासी बुर्ज हैं। चूंकि इस किले का उद्देश्य ही वाणिज्यिक उद्देश्यों एवं हीरे-जवाहरात के संरक्षण के लिए था लिहाजा इसके निर्माण में सुरक्षा आदि के पुख्ता इंतजाम स्वाभाविक थे। बाहर से अंदर तक यह किला तीन चारदीवारियों से घिरा हुआ है। कहा जाता है कि दुनिया में चर्चित कोहिनूर हीरा यही से मिला था।

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कोहिनूर के बारे में मशहूर है कि इसका पुराना नाम सम्यन्तक मणि था,जिसका प्रथम अस्तित्व महाभारत काल में सामने आता है। वही समयान्तक मणि गोलकुंडा में एक मजदूर को खुदाई के दौरान मिला था। तब किसी इसे ने बतौर नजराना इसे मुग़ल बादशाह शाहजहाँ को पेश किया, जिसे शाहजहाँ ने अपने तख्त–ए–ताउस में जड़वा दिया। बाद में इसे अंग्रेज ले गए और आज भी यह ब्रिटिश महारानी के मुकुट की शोभा बढ़ा रहा है। अगर निर्माण के नजरिये से देखें तो इस गोलकुंडा किले में कई खास भवन हैं। मसलन, शाही किला,दरबार हॉल,बारहदरी मस्जिद आदि। लेकिन किले के प्रवेश द्वारा पर ध्वनि-विज्ञान का अद्भुत नजारा मन मोह लेता है। दरअसल गोलकुंडा किले के प्रवेश द्वार की अंदरूनी छत षटकोणीय आकार में बनी है और इसी षटकोणीय आकार के नीचे अर्थात द्वार के नीचे खड़े होकर अगर कोई ताली बजाये अथवा कुछ बोले तो उसकी ध्वनि किले की सबसे ऊँचाई वाले भवन अंतिम भवन तक सुनी जा सकती है। इस षटकोणीय आकार वाली परिधि को वर्तमान में ‘तालियां का मंडप’ नाम से जाना जाता है। स्थानीय जानकार बताते हैं कि इसका निर्माण इस उद्देश्य से हुआ था कि प्रवेश द्वार से कोई सूचना अंदर के भवन तक बिना समय लिए पहुंचाई जा सके। अर्थात, दूरसंचार की अनोखी वास्तु-तकनीक का दर्शन गोलकुंडा के प्रवेश द्वार पर ही पर्यटकों को लुभाता है। अमूमन इस स्थान पर खड़े होकर लोग जोर-जोर से तालियां बजाते नजर आते हैं। हालांकि ध्वनि-सूचक तकनीक का इस्तेमाल इस किले के कई हिस्सों में अथवा भवनों में किया गया है। ऐसा बताया जाता है कि इन्हीं ध्वनि सूचकों से सूचना लेकर राजा लोगों से मिलते जुलते थे। किले की वास्तु कला का एक अन्य अद्भुत नजारा गोलकुंडा किले में जल आपूर्ति की व्यवस्था सम्बन्धी निर्माण को लेकर भी है। चुकि यह किला सामान्य सतह से सैकड़ों फीट उचाई पर स्थित है लिहाजा वहाँ तक जल की पहुँच बनाना वाकई आसान नही था। लेकिन गोलकुंडा किले में जल संचय एवं जल प्रवाह की अद्भुत तकनीक देखने को मिलती है। किले के नीचले तल्ले से लेकर उपरी तल्ले तक लगभग तीन से चार की संख्या में बड़े-बड़े तालाबनुमा जलाशय बने हैं जिनमे टेरीकोटा पाइपों द्वारा पानी का प्रवाह किया जाता था। हालांकि अब इन जलाशयों की स्थिति खंडहर से ज्यादा कुछ भी नही है।

अपने अद्भुत बनावट और बसावट के लिए ख्यातिलब्ध गोलकुंडा किले के साथ एक मुक्कमल इतिहास भी जुड़ा हुआ है। गोलकुंडा के इन काली पड़ती दीवारों नें न जाने कितने राजाओं, शासकों,बादशाहों को आते और मिटते देखा है। इस किले के बुर्जों पर १३वीं शताब्दी से १५वीं शताब्दी तक बारंगल एवं बरहमी राजाओं का शासन रहा। फिर बाराहमी साम्राज्य के पतन के बाद १५१८ से १६८७ तक इस किले की कमान कुतुबशाही शासकों के हाथों रही। बाद में औरंगजेब ने इसे अपने साम्राज्य में मिला लिया था। फिर १७१३ में गोलकुंडा के इस दुर्ग पर निजामो का कब्ज़ा हुआ जो कि १९४८ तक इस किले के तानाशाह रहे। लेकिन आजादी के बाद से यह किला भी अब किसी बादशाह की सम्पति नही बल्कि अपने इतिहासों के लिए जाना जाता है।

तत्कालीन दौर में पुरे किले के जल की व्यवस्था इन्हीं जलाशयों से होती थी और यहीं से जल प्रवाह होता था। गोलकुंडा किले के अंदर ऊँचाई तक जल पहुंचाने का यह अद्भुत तकनीक यह बताता है कि तबके वास्तुकार जलसंचय और ऊँचाई तक जलप्रवाह की यह तकनीक विकसित कर लिए थे। इसके अलावा अगर किले के अंदर के कुछ अन्य भवनों का जिक्र करें तो रामदास का कोठा,अम्बरखाना,कटोरा घर,रानी महल जैसे तमाम भवन हैं। रामदास का कोठा आयत के आकार में निर्मित चौड़ी दीवारों से घिरा भवन है। इस भवन के निर्माण का शुरुआती इतिहास ये है कि प्रारम्भ में यह बारंगल राजाओं द्वारा भंडारण आदि के लिए प्रयोग किया जाता था लेकिन आगे चलकर अबुल हसन कुतुबशाह (१६७२–१७८७) के दौरान इसे कारागार में बदल दिया गया। इस संदर्भ में एक कहानी है कि रामदास नामक व्यक्ति तब शाही खजाने के खजांची थे। बताया जाता है कि रामदास पर शाही खजाने के दुरूपयोग का आरोप लगा था इसी वजह से बादशाह ने उन्हें इसी कैदखाने में बंद कर दिया था। किले के कुछ और हिस्सों की बात करें तो अंदर जाते हुए काफी छतिग्रस्त अवस्था में एक जीर्ण-शीर्ण भवन है। इस भवन के एक तरफ से एक सुरंग नुमा रास्ता दिखता है। स्थानीय गाइड बताते हैं कि यह सुरंग लगभग सात से दस किलोमीटर लंबी हो सकती है। ऐसा माना जाता है कि कुतुबशाही शासक किसी विशेष अथवा आपात परिस्थिति में इस सुरंग का उपयोग करते थे।
इस महल के दूसरी तरफ अगर जायें तो अम्बरखाना अर्थात शाही खजाना के तमाम चिन्ह अवशेष रूप में प्राप्त होते हैं। ऐतिहासित तथ्य ये बताते हैं कि इस अम्बरखाना का निर्माण अब्दुल्ला कुतुबशाह ने सन १६४२ में करवाया था। इस किले की एक अनोखी बात ये भी है कि इस किले के बालाहिशार हिस्से के दायरे में एक छोटा सा हिंदू मंदिर भी निर्मित है। इस मंदिर का नाम मदन्ना मंदिर है। वहाँ के जानकार बताते हैं कि अब्दुलहसन तानाशाह के एक मंत्री का नाम मदन्ना था जिसके नाम पर इस मंदिर का नामकरण किया गया है। फिलहाल आपको इस मंदिर में पारंपरिक सिंदूर,टीका,रक्षा-सूत्र,भजन-कीर्तन जैसा वातावरण मिल जाएगा। बहुत सारे स्थानीय लोग इस मदन्ना मंदिर की वजह से नियमित किले में आते हैं। गोलकुंडा किला के इन खंडहरनुमा अवशेषों में कुतुबशाही साम्राज्य के कई शासकों द्वारा बनवाए गए वास्तुकला का अद्भुत नजारा नजर आता है। इनमें से भवन तो कई-कई मंजिला हैं। ऐसे सभी निर्माणों में चमकीले पत्थरों की कारीगरी एवं पत्थरों पर फूलों-पत्तियों की नक्काशी और कई पत्थरों के परत का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि यह अपुष्ट तथ्य है लकिन ऐसा बताया जाता है कि गोलकुंडा किले से एक गुप्त सुरंग चारमीनार तक भी जाती है। लेकिन अभी तक इस सुरंग के बारे में कोई पुख्ता जानकारी नही प्राप्त हो सकी है। अभी भी गोलकुंडा के इस प्राचीन किले में कुछ तोपों आदि के अवशेष जरुर मिलते हैं।
अपने अद्भुत बनावट और बसावट के लिए ख्यातिलब्ध गोलकुंडा किले के साथ एक मुक्कमल इतिहास भी जुड़ा हुआ है। गोलकुंडा के इन काली पड़ती दीवारों नें न जाने कितने राजाओं, शासकों,बादशाहों को आते और मिटते देखा है। इस किले के बुर्जों पर १३वीं शताब्दी से १५वीं शताब्दी तक बारंगल एवं बरहमी राजाओं का शासन रहा। फिर बाराहमी साम्राज्य के पतन के बाद १५१८ से १६८७ तक इस किले की कमान कुतुबशाही शासकों के हाथों रही। बाद में औरंगजेब ने इसे अपने साम्राज्य में मिला लिया था। फिर १७१३ में गोलकुंडा के इस दुर्ग पर निजामो का कब्ज़ा हुआ जो कि १९४८ तक इस किले के तानाशाह रहे। लेकिन आजादी के बाद से यह किला भी अब किसी बादशाह की सम्पति नही बल्कि अपने इतिहासों के लिए जाना जाता है। हैदराबाद के पश्चिमी क्षेत्र में पहाड़ी के ऊपर तन कर खड़ा यह अद्भुत किला अपने आप में विज्ञान और इतिहास की अद्भुत मिसाल सजोयें खड़ा है। पर्यटन के नजरिये से गोलकोंडा का इतिहास और भूगोल दोनों ही रुचिकर है।

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