नेशनल राइटर्स मीट: लेखकों के जुटान से मिला अनुभवों का पिटारा

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउन्डेशन द्वारा दिल्ली में 30-31 जुलाई को आयोजित नेशनल राइटर्स मीट में देश भर से तीन सौ से ज्यादा लेखकों ने हिस्सा लिया। व्याख्यान में सवाल-जवाब वाले कई सत्र आयोजित हुए। डॉ श्यामा प्रसाद रिसर्च फाउन्डेशन की वेबसाईट नेशनलिस्ट ऑनलाइन डॉट कॉम को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा लांच किया गया। इस कार्यक्रम से लौटकर अपना आयोजन पर अनुभव साझा कर रहे हैं पुष्कर अवस्थी: सम्पादक 

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गत दिनों मुझे 30/31 जुलाई को दिल्ली में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘नेशनल राइटर्स मीट’ में भाग लेने का मौका मिला। इन दो दिनों में जहां अच्छे वक्ताओं को सुनने को मिला, वहीँ सोशल मीडिया और पत्रकारिता में गंभीर और सकारात्मक योगदान देने वालों से भी मुलाकात एवं चर्चा भी हुईऔर उनसे विचारों का आदान प्रदान हुआ। ‘नेशनल राइटर्स मीट’ के आयोजकों ने इन दो दिनों का प्रोग्राम शेड्यूल बेहद करीने से सजाया था और वक्ताओं के साथ-साथ हम सब सुनने वालों को प्रश्नोत्तर करने के लिए भी पर्याप्त समय दिया था। पूरा दो दिन, व्यस्तता भरा जरूर था लेकिन एक भी पल बोझिल नही था।
पहले दिन सबसे पहले डॉ बिबेक देबरॉय, (सदस्य नीति आयोग) का व्याख्यान था। उन्होंने अपने व्याख्यान में मोदी सरकार द्वारा शासन व्यवस्था में किये गए मूलभूत परिवर्तनों से आने वाले समय में होने वाले परिणामो पर प्रकाश डाला। दूसरा व्याख्यान डॉ विनय सहस्रबुद्धे (राज्यसभा सदस्य और बीजेपी के उपाध्यक्ष) का था और उन्होंने सरकार के अंत्योदय प्रोग्राम के तहत हुए और होने वाले विकास कार्यों की रियल डाटा के साथ तस्वीर सामने रखने का कार्य किया। तीसरा व्याख्यान विवेक अग्निहोत्री (फ़िल्मकार) का था जिन्होंने कला की दुनिया में, ख़ास तौर से मुंबई की फ़िल्मी दुनिया में वामपंथियों की घुसपैठ के कारणों को समझाया। संक्षिप्त में कहें तो उनके व्याख्यान से यही लगा कि वहां भारतीय संस्कृति पर बात करना या उस पर फिल्म बनाना, सेक्युलर विरोधी की श्रेणी में रखा जाता है और जो इस पर बात करता है, उसे काम नही मिलता है। पहले दिन के अंतिम सत्र में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का भाषण था, जिसका केंद्र बिंदु ‘राष्ट्र के पुनरुत्थान में राष्ट्रवादी विचारधारा की प्रमुखता और राजनीति में उससे सामंजस्य’ था। अपने भाषण से पहले अमित शाह जी ने nationalistonline.com वेबसाइट का आधिकारिक रूप से उदघाटन किया और बाद में उन्होंने हमलोगो के साथ रात्रि का भोजन भी किया। फिर हमलोगो के लिए रात्रि भोजन के पश्चात्, विवेक अग्निहोत्री की चर्चित फिल्म, ‘बुद्धा इन ट्रैफिक जैम’ का विशेष प्रदर्शन रखा गया था।

अगले दिन कार्यक्रम सुबह ही से था। पहला व्याख्यान एम जे अकबर( राज्य मंत्री, विदेश मंत्रालय) का था, जिन्होंने वर्तमान में चल रही बौद्धिक मंथनो को समझने की जरुरत पर जोर दिया और मोदी की परिकल्पना के भारत को, भारत के अस्तित्व की रीढ़ होने के कारणों को बेबाकी से समझाया। दूसरा व्याख्यान अरविंदन नीलकंदन (लेखक) का था, जिन्होंने अम्बेडकर पर व्याख्यान दिया। उन्होंने, उद्धरणों और उनके लेखों के माध्यम से यह लोगो को बताया कि अम्बेडकर आरएसएस की विचारधारा के समर्थक थे और हिंदुत्व के प्रति सजग थे। उनका जीवन काल के अंतिम समय में बौद्ध धर्म का अपनाना, एक राजनैतिक प्रोटेस्ट था, जिसे उनके पूर्व के विचारों को देखते हुए, जरूरत से ज्यादा महत्व नही देना चाहिए। मुझे यह व्याख्यान बड़ा रोचक लगा है। तीसरा व्याख्यान डॉ वामसी जुलूरी (प्रोफेसर ऑफ़ मीडिया स्टडी, यूनिवर्सिटी ऑफ सैनफ्रांसिस्को) का था। उन्होंने हिंदुत्व के इतिहास और संस्कृति को लेकर पाश्चात्य जगत के शैक्षणिक संस्थाओं में फैली भ्रांतियों के कारण और उनका विरोध करके दूर किये जाने के प्रयासों की रणनीति पर चर्चा की। चौथा व्याख्यान डॉ स्वपन दासगुप्ता (संसद सदस्य और लेखक) का था। उन्होंने भारतीय शैक्षणिक संस्थाओं पर वामपंथियों के कब्जे और उससे भारत की सांस्कृतिक को जानबूझ करके नष्ट किये जाने के कारणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने जहां वामपंथियों को कटघरे में खड़ा किया वहीँ पर उसके विरोध में तर्कपूर्ण रिसर्च न किये जाने पर राष्ट्रवादियों के प्रयासों की असफलता पर भी प्रकाश डाला।

सबसे अंतिम सत्र का व्याख्यान डॉ कृष्णगोपाल (सह सरकार्यवाह आरएसएस) वा श्री बीएल संतोष (नेशनल जॉइंट जनरल सेक्रेटरी आर्गेनाईजेशन बीजेपी) का था। इन दोनों ने व्याख्यान देने से पहले वहां बैठे लेखकों की, ‘राष्ट्रवादी विचारधारा और मोदी सरकार के शासन’ के सामंजस्य को लेकर हो रही दुविधा पर प्रश्नों को सुना और सवालों का विस्तृत उत्तर दोनों महानुभावो ने स्पष्टता से दिया। यह सत्र बेहद रोचक था। मोदी सरकार द्वारा, कुछ महत्वपूर्ण मामलो में की जा रही देरी पर उठे प्रश्नों को उन्होंने एक उदाहरण देकर समझाया कि, ‘ यदि किसी बस को ड्राइवर गलत दिशा में ले जारहा है तो बस को सही दिशा में ले जाने के लिए ड्राइवर बदलना पड़ेगा। उसके लिए आपको चलती बस में घुसना पड़ेगा और ड्राइवर की सीट पर खुद बैठना पड़ेगा। अब जब आप तुरंत ब्रेक लगा कर, बस की दिशा परिवर्तन करेंगे तो आप निश्चित ही बस को गिरा देंगे और एक्सीडेंट कर बैठेंगे। इसलिए यदि सफलता पूर्वक बस की दिशा परिवर्तित करनी है तो आपको बस उसी मार्ग पर थोड़ी देर और चलानी पड़ेगी, रफ्तार धीमी करनी पड़ेगी फिर आहिस्ता से ब्रेक लगाते हुए गियर बदल कर बस को सही दिशा की तरफ दौड़ा सकते है।’ मुझे यह बात पसन्द आयी क्योंकि यह बात मेरी विचारधारा से मेल खाती है क्योंकि परिवर्तन काल की गणना में, 2/3 वर्षो का काल, कोई बड़ा काल नही है।

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