थाईलैंड में हिन्दू-बौद्ध दर्शन का समावेश: राम को अपना आराध्य मानते हैं वहां के लोग

थाइलैंड की मान्यता के अनुसार रामायण थाइलैंड की कहानी है। थाइलैंड को पहले सियाम कहा जाता था जिसकी राजधानी अयुत्थया थी। ऐसा माना जाता है कि अयुत्थया या अयोध्या के राजा राम थे। इनके बाद 1782 में नए राजा ने कई कारणों से पुरानी राजधानी को अपने लिए अनुपयुक्त समझा और चाओ फरया नदी की दूसरी ओर ग्रांड पैलेस की स्थापना हुई। राजा ने न केवल यहाँ अपने रहने का स्थान बनवाया बल्कि सभी प्रशासनिक काम भी यहीं से होते थे। सबसे पहले यहाँ दो आवासीय इकाई बनीं ड्यूसिट महा प्रसात और फरा महा मोंथेन। महा मोंथेन के उत्तर में एक गलियारा इस बौद्ध मंदिर को जोड़ता है। थाईलैंड यात्रा से हाल में लौट कर अपना संस्मरण बता रहीं हैं पत्रकार वर्तिका: 

किसी इमारत से इश्क करना है तो बैंकॉक के शाही बौद्ध मंदिर चले जाना। रूमानियत, नफीसी, बारीकी और दिलकशी सब एक जगह। ऊपर से शाही रुआब भी। भीतर से ज़हनी क़िताब भी। देख कर आँखे फटी और मुँह खुला रह जाए। अपने आप को राजा राम का वंशज कहने वाले राजाओं ने अपने रहने के लिए ग्रांड पैलेस बनवाया था। यहाँ मौजूद यह शाही बौद्ध मंदिर देखने-दिखाने लायक है। बैंकॉक के ग्रांड पैलेस को बाहर से देखने पर अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल होता है कि इसके सफेद, सपाट, ऊँचे परकोटों के भीतर कितनी अपार भव्यता छिपी हो सकती है। बौद्ध स्थापत्य कला की अपने आप में बहुत समृद्ध परंपरा रही है लेकिन इस स्थान को बौद्ध स्थापत्य कला का चरम कहना ग़लत नहीं होगा। हिंदू और बौद्ध मान्यताओं की इस जुगलबंदी को देख कर चकित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। यहाँ चीनी कलाकारी के प्रभाव के साथ बनी संभवतः काल्पनिक पात्रों की मूर्तियों, आकृतियों, और तस्वीरों को देखकर अगर आप विस्मित होने से बच गए तो स्वर्णिम छटा के साथ चटकीले रंगो से सजे गुंबदों, मेहराबों और खंबों और दीवारों को देखकर को देखकर भी अगर आप बच नहीं पाएंगे। कई मंदिरों को शिखरों पर तो रंगीन पत्थरों के टुकड़े ऐसे जँचा रखे है जैसे लगे कि फूलों की सजावट है।

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इस मंदिर परिसर का मुख्य आकर्षण है, पन्ने से बने बुद्ध का मंदिर। इसके भीतर बौद्ध भिक्षुओं का अनुसरण कर प्रार्थना करते श्रद्धालुओं की स्वरलहरियाँ आत्मिक सुकून देती हैं। भाषा भले ही समझ न आए लेकिन गूँजती ध्वनितरंगे भीतर तक शांति पहुँचाती हैं। यहाँ स्वर्णिम सिंहासन पर विराजमान हरे रंग की यह बुद्ध प्रतिमा बेजोड़ है। इस सिंहासन को बुसाबोक लकड़ी पर पारंपरिक थाई कलाकारी कर सोने का पानी चढ़ा कर बनाया गया है। इस प्रतिमा की भी अपनी एक कहानी है। यह प्रतिमा सन् 1434 में थाईलैंड के उत्तर में स्थित चियांग राई के एक बौद्ध स्तूप में मिली थी। देखने में यह प्रतिमा सामान्य सी, प्लास्टर ऑफ पैरिस से बनी दिखती थी। इस प्रतिमा को खोजने वाले विद्वान को बाद में दिखा कि प्रतिमा की नाक से प्लास्टर झड़ रहा है। उन्होंने पूरी प्रतिमा से प्लास्टर झाड़ा तो हरे रंग के कारण उन्हें लगा कि यह प्रतिमा पन्ने से बनी है। लेकिन बाद में पता चला कि यह सेमी प्रीशियस स्टोन, हरे फिरोज़ा की चट्टान को काट कर बनाई गई है। लेकिन तब तक यह प्रतिमा पन्ने के बुद्ध नाम से मशहूर हो चुकी थी। इस मंदिर परिसर की बाहरी दीवारों के भीतरी गलियारे में रामायण की कहानियों को चित्रकारी से उकेरा गया है। यह चित्रकारी भी अद्भुत है। सीता हरण, लंका दहन और राम-रावण युद्ध की थाई शैली में की गई चित्रकारी देखकर कौतुहल होता है। विशेष पात्रों को स्वर्णिम रंग में डूबी कूँची से रेखांकित किया गया है। गलियारे की छाया में बाहर से पड़ती सूरज की हल्की सी रोशनी से ही यह पात्र चमक उठते हैं।
थाइलैंड की मान्यता के अनुसार रामायण थाइलैंड की कहानी है। थाइलैंड को पहले सियाम कहा जाता था जिसकी राजधानी अयुत्थया थी। ऐसा माना जाता है कि अयुत्थया या अयोध्या के राजा राम थे। इनके बाद 1782 में नए राजा ने कई कारणों से पुरानी राजधानी को अपने लिए अनुपयुक्त समझा और चाओ फरया नदी की दूसरी ओर ग्रांड पैलेस की स्थापना हुई। राजा ने न केवल यहाँ अपने रहने का स्थान बनवाया बल्कि सभी प्रशासनिक काम भी यहीं से होते थे। सबसे पहले यहाँ दो आवासीय इकाई बनीं ड्यूसिट महा प्रसात और फरा महा मोंथेन। महा मोंथेन के उत्तर में एक गलियारा इस बौद्ध मंदिर को जोड़ता है।
लेकिन हर इश्क की तरह इस तक पहुँचने के लिए भी कुछ इम्तहान देने पड़ते हैं। अगर आप चाओ फरिया नदी से नाव के रास्ते रॉयल पैलेस पहुँचे हैं तो सात-आठ मिनट का पैदल रास्ता है ग्रांड पैलेस तक। रास्ते में आपको कई लोग मिल सकते हैं जो बताएंगे कि रॉयल पैलेस में अभी नहीं जा सकते। अभी बंद है या कोई शाही रस्म चल रही है। हम आपको पास ही में ले चलते हैं, वहाँ ये अच्छा है, वो अच्छा है। असल में उन्हें देखकर मुझे आगरा के ताज की याद आ गई। वहाँ भी ऐसे ही कई लोग देखे थे जो विदेशी पर्यटकों को अपने फायदे के लिए बेवकूफ बना रहे थे। ग्रांड पैलेस के रास्ते में महसूस हुआ कि उन विदेशी पर्यटकों को कैसा लगता होगा। इन सब को पार करके आप ग्रांड पैलेस तक पहुँच भी गए तो दुनियाभर से आए श्रद्धालुओं और कद्रदानों की लंबी कतार को पार कर आपको एक मोटा प्रवेश शुल्क अदा करना होता है। फिर अगला चरण यह है कि अगर आपने बिना बाजू का टॉप या फिर कोई ऐसी ड्रेस जिसमें कंधे दिखते हों पहनी है तो आपको प्रवेश नहीं मिलेगा। लड़के भी शार्ट्स, बरमूडा या हाफ पैंट में अंदर नहीं जा सकते। लेकिन एक अच्छी बात यह है कि ग्रांड पैलेस के बाहर ही कई दुकाने हैं जहाँ थोड़े मँहगे दामों में ही सही, लेकिन आपकी मुश्किल हल हो सकती है।

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