झूठ-फरेब है ‘आप’ का असली चरित्र, केजरीवाल खुद हैं बड़े अराजक

केजरीवाल सरकार और विवादों का शुरू से ही चोली-दामन का साथ रहा है। वह किसी न किसी मुद्दे को लेकर चर्चाओं का विषय बनी रहती है। फिर चाहे वह दिल्ली पुलिस की मांग हो, उपराज्यपाल से उसकी जंग हो, या फिर एक के बाद एक उसके विधायकों की गिरफ्तारी हो। पिछले साल फरवरी में ‘आप’ के दिल्ली की सत्ता में दूसरी बार आने के बाद से अब तक पार्टी के 12 विधायकों को अलग-अलग मामलों में दिल्ली, पंजाब और हरियाणा पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को डिग्री के मामले में बिना किसी आधार के घेरने वाले अरविंद केजरीवाल के विधायक स्वयं फर्जी डिग्री मामले में फंसते जा रहे हैं। हाल ही में हरियाणा पुलिस ने दिल्ली कैंट से ‘आप’ के विधायक सुरिंदर सिंह के खिलाफ पूर्व विधायक और बीजेपी नेता करण सिंह तंवर की शिकायत पर कार्रवाई करते धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया है। सुरिंदर पर स्नातक की फर्जी डिग्री के आधार पर सरकारी शिक्षक की नौकरी हासिल करने के आरोप लगने के बाद यह मामला दर्ज हुआ है। तंवर द्वारा सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत हासिल किए गए सुरिंदर के सेवा रिकॉर्ड से जुड़े दस्तावेजों से पता चला कि ‘आप’ विधायक ने 12वीं पास की थी, जबकि झज्जर के एक सरकारी स्कूल में शारीरिक प्रशिक्षण अनुदेशक (पीटीआई) के पद के लिए आवेदन करते वक्त उन्होंने खुद को स्नातक होने का दावा किया था।

केजरीवाल का कहना है कि उनके विधायकों को फंसाया जा रहा है, जबकि कोई भी यह देख-समझ सकता है कि उनके विधायक अपनी करनी के कारण क़ानून के शिकंजे में पड़ रहे हैं। केजरीवाल को समझना चाहिए कि उनके इस तरह के हवा-हवाई आरोप लगाने से न तो आम आदमी पार्टी के आरोपी नेता सही साबित नहीं हो जाएंगे और न ही उनकी सरकार की छवि ही सुधर जाएगी। आम आदमी पार्टी में अनुशासन का भारी अभाव है। क्योंकि केजरीवाल जो पार्टी के संयोजक है, खुद किसी प्रकार के अनुशासन को नहीं मानते तो फिर निचले नेता कैसे मानेगे ?

वहीं दूसरी ओर संसद भवन का वीडियो बनाकर फेसबुक पर अपलोड करने के मामले में ‘आप’ सांसद भगवंत मान की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। संसद की सुरक्षा से खिलवाड़ करने के मामले में जांच समिति ने भगवंत मान को 2 हफ्ते संसद न आने की सलाह देते हुए बड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी है। सवाल यह है कि ईमानदारी और सच्चाई की बड़ी-बड़ी डींगें हांककर दिल्ली की सत्ता पाने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आखिर इन विधायकों में ऐसा क्या देखा, जो इन्हें जनता की रखवाली के लिए आगे कर दिया ? हर बात पर केंद्र और पीएम मोदी पर उंगली उठाने वाले केजरीवाल के विधायक एक-एक करके कानूनी शिकंजे में फंसते जा रहे हैं। इससे पहले भी ओखला के विधायक अमानतुल्लाह खान को एक महिला को कार से कुचलने की कोशिश करने के आरोप में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था। वहीं दूसरी ओर महरौली से विधायक नरेश यादव को पंजाब पुलिस द्वारा मलेरकोटला में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इसके साथ ही आप विधायक और दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष दिनेश मोहनिया की एक महिला के साथ कथित छेड़छाड़ के आरोप में हुई गिरफ्तारी ने एक बार फिर से सबको सोचने पर मजबूर कर दिया कि ‘आप’ पार्टी में आखिर क्या हो रहा है। मोहनिया पर एक बुजुर्ग के साथ बदसलूकी का भी आरोप है। इससे पहले भी ‘आप’ के पूर्व कानून मंत्री रहे सोमनाथ भारती को ‘खिड़की एक्सटेंशन’ मामले में अफ्रीकन महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उन्हीं की पत्नी ने उन पर घरेलू हिंसा का आरोप लगाया था। जिसके बाद से पार्टी की काफी किरकिरी हुई थी।

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साभार : hindi.indiasanwad.com

इसके बाद भी यह मामला यहीं  नहीं थमा और दूसरी पारी में ‘आप’ पार्टी में कानून मंत्री का प्रभार संभालने वाले जीतेंद्र तोमर को भी फर्जी डिग्री के मामले में जेल की हवा खानी पड़ी। विधायकों के अलावा उनके प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के दफ्तर में भी सीबीआई का छापा मारा गया, उनको गिरफ्तार किया गया। इतना सब होने के बाद भी मुख्यमंत्री केजरीवाल अपने आपको पाक साफ बताते हुए अगले साल पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुटे हुए हैं। अपने विधायकों को नियंत्रित करने और पार्टी को सँभालने की बजाय केजरीवाल केंद्र सरकार पर दिल्ली में उनकी सरकार को काम नहीं करने देने का निराधार आरोप लगाने में लगे हैं। केजरीवाल का कहना है कि उनके विधायकों को फंसाया जा रहा है, जबकि कोई भी यह देख-समझ सकता है कि उनके विधायक अपनी करनी के कारण क़ानून के शिकंजे में पड़ रहे हैं। केजरीवाल को समझना चाहिए कि उनके इस तरह के हवा-हवाई आरोप लगाने से न तो आम आदमी पार्टी के आरोपी नेता सही साबित नहीं हो जाएंगे और न ही उनकी सरकार की छवि ही सुधर जाएगी।

आम आदमी पार्टी में अनुशासन का भारी अभाव है। क्योंकि केजरीवाल जो पार्टी के संयोजक है, खुद किसी प्रकार के अनुशासन को नहीं मानते तो फिर निचले नेता कैसे मानेगे ? वे पहले बिना बात दूसरों से भिड़ते हैं और जब मुंह की खानी पड़ती है, तो कुछ नए हवा-हवाई आरोप लेकर खड़े हो जाते हैं। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन्हें ऐसे ही उपराज्यपाल के साथ अधिकारों के टकराव मामले में आइना दिखाते हुए कहा है कि दिल्ली में उपराज्यपाल ही प्रमुख हैं। मगर, इससे केजरीवाल और उनकी पार्टी पर शायद ही कोई फर्क पड़े। आप को राजनीति में आए हुए लंबा समय हो गया है। यहां तक कि वह लोकसभा चुनाव 2014 में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभा चुकी है, लेकिन मोदी लहर के सामने कामयाब नहीं हो सकी और फिर से दिल्ली की सियासत की ओर रुख कर लिया। नई तरह की राजनीति का दावा करने वाले केजरीवाल की अभी तक किसी भी मामले में कोई परिपक्वता नहीं दिखाई दी है और न ही जनप्रतिनिधियों को देखकर लगता है कि वह अपने पद की गरिमा को भलि-भांति समझते हैं। पार्टी का अनुशासनहीन और गैर-जिम्मेदाराना रवैया कहीं न कहीं दिल्लीवासियों को निराश करता है, क्योंकि दिल्ली वालों ने उन्हें सत्ता की कमान राज्य की बेहतरी के लिए सौंपी थी और उनके पिछले कुकृत्यों को माफ कर फिर से एक मौका दिया है कि वह अपने कामों से यहां की जनता का दिल जीत सकें। लेकिन शायद यह फिर भूल गए कि इन्हें क्या करना है। विपक्षी नेताओं पर बिना सबूत के आरोप लगाना तो जैसे इनकी आदत में ही शुमार हो गया है।

केजरीवाल आए दिन भाजपा नेताओं पर बिना किसी सबूत के आरोप लगाते रहते हैं। दरअसल, पिछले कुछ दिनों से केजरीवाल सरकार अपने  विधायकों पर महिलाओं से छेड़छाड़ और यौन प्रताड़ना का आरोप लगने से बौखला गई है। इसके अलावा सप्‍ताह भर पहले ‘आप’ की एक महिला कार्यकर्ता ने अपने सुसाइड नोट पर आप के ही कुछ नेताओं पर आरोप लगा कर उन्हें और चिंता में डाल दिया। इस चिंता की चुप्पी को केजरीवाल ने हवा-हवाई ढंग से दिल्‍ली पुलिस, सीबीआई और आयकर विभाग के छापों के पीछे प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह और पीएमओ का हाथ बताकार बताकर तोड़ा। केजरीवाल को ये समझना होगा कि दिल्ली की जनता बेवकूफ नहीं है, वह भी जानती है कि वह क्या कर रहे हैं। अभी भी समय है कि केजरीवाल ऐसे विधायकों का समर्थन करने के बजाय उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दिलाएं और भविष्य में ऐसे विधायकों को अपनी पार्टी में भी शामिल करने से बचें,वर्ना ये राजनीति है और यहाँ सत्ता स्थायी नहीं होती।

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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