दंगों के दम पर ही शासन करती रही है कांग्रेस, यही है उसकी राजनीति का असल चरित्र!

1948 में हैदराबाद राज्‍य में निजाम की सेना (रजाकरों) ने सत्‍याग्रहियों के खिलाफ जो जुल्‍म ढाया इतिहास में उसकी बहुत कम मिसाल मिलेगी। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि हिंदुओं के कत्‍लेआम और हिंदू महिलाओं के बलात्कार को  तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मूकदर्शक की भांति देखते रहे क्‍योंकि इसमें उनका राजनीतिक हित जुड़ा था। इसी तरह 1971 में पूर्वी पाकिस्‍तान में लाखों हिंदुओं के कत्‍लेआम और महिलाओं के बलात्कार को नेहरु की पुत्री इंदिरा गांधी ने ब्‍लैक आउट करा दिया था ताकि उस समय की प्रमुख राजनीतिक पार्टी जनसंघ हिंदुओं को एकजुट कर उनके खिलाफ माहौल न बना सके। भारतीयों को इस नरंसहार की खबर महीनों बाद विदेशी मीडिया से मिली थी। इंदिरा गांधी का मतलब साफ था कि हिंदुओं को एकजुट होने से रोको और मुसलमानों के एकमुश्‍त वोट के बल पर सत्‍ता हासिल करो। आगे चलकर इसी नीति को कमोबेश सभी कांग्रेसी सरकारों ने अपनाया।

भारत में सांप्रदायिक दंगों का लंबा इतिहास रहा है। अंग्रेजों ने अपनी “बांटों व राज करो” नीति को कामयाब बनाने के लिए जिस सांप्रदायिकता का बीज बोया था उसे आजाद भारत के कांग्रेसी व वामपंथी नेताओं ने खाद-पानी देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेसी व वामपंथी नेताओं द्वारा शुरू की गई सांप्रदायिक राजनीति को आगे चलकर क्षेत्रीय दलों ने उर्वर जमीन मुहैया कराई। इस नीति का नतीजा सांप्रदायिक दंगों के रूप में आया, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के कारण न तो दंगाइयों को सजा मिली और न ही दंगा पीड़ितों को इंसाफ।

इतना ही नहीं वोट बैंक की राजनीति के चलते आजादी के बाद देश में दंगों और नरंसहारों को राजनीतिक नफा-नुकसान की नजर से परिभाषित किया जाने लगा। यहां आजादी के ठीक बाद हुए हैदराबाद के दंगों का उल्‍लेख प्रासंगिक है। 1948 में हैदराबाद राज्‍य में निजाम की सेना (रजाकरों) ने सत्‍याग्रहियों के खिलाफ जो जुल्‍म ढाया इतिहास में उसकी बहुत कम मिसाल मिलेगी।

कासिम रिजवी के नेतृत्‍व में कट्टरपंथी मुसलमानों ने हिंदुओं पर भयानक अत्‍याचार किया ताकि हिंदुओं को हैदराबाद से भगाया जा सके। उस समय हैदराबाद में एक भी हिंदू महिला नहीं बची थी जिसके साथ बलात्‍कार न हुआ हो। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि हिंदुओं के कत्‍लेआम और हिंदू महिलाओं के बलात्कार को  तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मूकदर्शक की भांति देखते रहे क्‍योंकि इसमें उनका राजनीतिक हित जुड़ा था।

इसी तरह 1971 में पूर्वी पाकिस्‍तान में लाखों हिंदुओं के कत्‍लेआम और महिलाओं के बलात्कार को नेहरु की पुत्री इंदिरा गांधी ने ब्‍लैक आउट करा दिया था ताकि उस समय की प्रमुख राजनीतिक पार्टी जनसंघ हिंदुओं को एकजुट कर उनके खिलाफ माहौल न बना सके। भारतीयों को इस नरंसहार की खबर महीनों बाद विदेशी मीडिया से मिली थी। इंदिरा गांधी का मतलब साफ था कि हिंदुओं को एकजुट होने से रोको और मुसलमानों के एकमुश्‍त वोट के बल पर सत्‍ता हासिल करो। आगे चलकर इसी नीति को कमोबेश सभी कांग्रेसी सरकारों ने अपनाया।

कांग्रेस की दंगा नीति को दिल्‍ली के सिख विरोधी दंगों के उदाहरण से समझा जा सकता है। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्‍या के बाद दिल्‍ली में भयानक सिख विरोधी दंगे हुए जिसमें पांच हजार सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया लेकिन आज तक एक भी दंगाई को सजा नहीं हुई। सबसे बड़ी विडंबना है कि गुजरात दंगों की माला जपने वाली कांग्रेस दिल्‍ली के सिख विरोधी दंगों का भूलकर भी नाम नहीं लेती है क्‍योंकि कांग्रेसी नेताओं ने दंगाइयों को खुलेआम प्रश्रय दिया था।

इसे राजनीतिक हानि-लाभ का ही खेल कहेंगे कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 2014 के लोक सभा चुनाव के पहले अहमदाबाद की खूनी सड़कें तो दिखीं लेकिन 1984 में दिल्‍ली में सिखों का कत्‍लेआम नहीं दिखा। कमोबेश यही हालत मेरठ के हाशिमपुरा हत्‍याकांड का है। इस हत्‍याकांड के सभी आरोपियों को अदालत  द्वारा बरी कर दिए जाने के बाद कांग्रेस सन्‍नाटा खींचे रही तो इसकी वजह यह है कि उस समय उत्‍तर प्रदेश का मुख्‍यमंत्री कांग्रेस पार्टी का था। यदि हाशिमपुरा हत्‍याकांड के समय उत्‍तर प्रदेश में भाजपा की सरकार होती तो कांग्रेस अल्‍पसंख्‍यकों की रहनुमा बनकर राजनीतिक रोटी सेंकने में पीछे न हटती। इसी तरह के अनगिनत उदाहरण हैं जहां कांग्रेस ने राजनीतिक नफा-नुकसान देखकर सांप्रदायिक दंगों को परिभाषित किया।

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साभार: गूगल

भारत में वोट बैंक की राजनीति को समझने के लिए गुजरात केतमाम  दंगों और नरंसहार का विश्‍लेषण जरूरी है अन्‍यथा बात अधूरी रह जाएगी। आजादी के बाद से ही गुजरात में सांप्रदायिक दंगे होते रहे हैं। अहमदाबाद की सड़कें तो अक्‍सर बेगुनाहों के खून से लाल होती रहती थीं। 1969 में अहमदाबाद में भीषण सांप्रदायिक दंगा हुआ जिसमें 5000 मुसलमान मारे गए थे। उस समय राज्‍य के मुख्‍य मंत्री हितेंद्र भाई देसाई और देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं लेकिन दंगाइयों को सजा नहीं मिली।

इसके बाद 1985, 1987, 1990 और 1992 में अहमदाबाद में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए और इन दंगों के दौरान गुजरात की बागडोर कांग्रेसी मुख्‍यमंत्रियों के हाथ में रही। इसके बावजूद न तो दंगाइयों को सजा मिली और न ही दंगा पीड़ितों को इंसाफ। हां, इन दंगों के बल पर राजनीतिक रोटी सेंक कर कांग्रेस सूबे में राज जरूर करती रही। मगर कांग्रेस इनमें से किसी एक दंगे का नाम नहीं लेती, वो सिर्फ 2002 दंगे की ही बात करती है क्योंकि तब सूबे में उसकी सरकार नहीं थी।

हालांकि ऐसा करते वक़्त वो ये भूल जाती है कि गुजरात दंगे के लिए तत्कालीन सरकार के जिन लोगों पर वो आरोप लगाती है, उन्हें भारी जांच और छानबीन के बाद उच्चतम न्यायालय ने आरोपमुक्त कर दिया है। मगर कांग्रेस के लिए ये मायने नहीं रखता,  क्योंकि उसे तो सिर्फ दंगों पर राजनीति करनी होती है।  

उपरोक्‍त विवरण से स्‍पष्‍ट है कि देश में सांप्रदायिक दंगे कांग्रेस की वोट बैंक की राजनीति की देन हैं। चूंकि अब कांग्रेस की नीति को क्षेत्रीय दल अधिक परिमार्जित रूप में अपना चुके हैं इसलिए कांग्रेस का वोट बैंक छिटकता जा रहा है। वोट बैंक के ये नए रहनुमा कांग्रेस से मीलों आगे हैं। तभी तो ये जिंदा इंसान का ही नहीं मुर्दे का भी मजहब तय करने लगे हैं। यही कारण है कि शोक प्रकट करने से लेकर मुआवजे की रेवड़ी बांटने तक में जमकर भेदभाव किया जाता है। स्‍पष्‍ट है कांग्रेस का भले ही सूर्यास्‍त हो रहा है लेकिन कांग्रेस ने जिस सांप्रदायिक राजनीति को पालपोष कर बड़ा किया उसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है।

(लेखक केन्द्रीय सचिवालय में अधिकारी हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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