जीवन के हर क्षेत्र में सारथी की भूमिका निभाते हैं कृष्ण के विचार!

कृष्ण का जीवन जितना रोचक है, उतना ही मानवीय और मर्यादित भी। इसीलिए आम इंसान को बहुत कुछ सिखाता-समझाता है। नंदगांव के कन्हैया से लेकर अर्जुन के पार्थ तक उनका चरित्र जीवन जीने के अर्थपूर्ण संदेश संजोये हुए है, जो हर तरह से मानव कल्याण और जन सरोकार के भाव लिए हैं। बालपन से लेकर कुटुम्बीय जीवन तक, उनकी हर बात में जीवन-सूत्र छुपे हैं। तभी तो सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक और राजनीतिक हर क्षेत्र में सारथी की भूमिका में सच्चे हितैषी कहे जाते हैं कृष्ण! इंसान के विचार और व्यवहार स्वयं उनके ही नहीं बल्कि राष्ट्र और समाज की भी दिशा तय करते हैं। कृष्ण के सन्देश इन दोनों पक्षों के परिष्करण पर बल देते हैं। एक ऐसी जीवनशैली सुझाते हैं जो सार्थकता और संतुलन लिए हो। समस्याओं से जूझने की ललक लिए हो। गीता में वर्णित उनके सन्देश जीवन-रण में अटल विश्वास के साथ खड़े रहने की सीख देते हैं। महान दार्शनिक श्री अरविंदो ने कहा कि ‘भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक किताब न होकर एक जीवन-शैली है, जो हर उम्र को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है।’ दुनिया के जाने माने वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी कहा है कि ‘श्रीकृष्ण के उपदेश अतुलनीय हैं।’ कृष्ण से जुड़ी हर बात हमें जीवन के प्रति जागृत होने का सन्देश देती है। मानव-मन और जीवन के कुशल अध्येता कृष्ण यह कितनी सरलता और सहजता से बताते हैं कि जीवन जीना भी एक कला है। उनके चरित्र को जितना जानो उतना ही यह महसूस होता है कि इस धरा पर प्रेम का शाश्वत भाव वही हो सकता है, जो कृष्ण ने जिया है। यानि कि सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेम। यही अलौकिक प्रेम हम सबको आत्मीय सुख दे सकता है और इसी में समाई है जनकल्याणकारी चेतना भी।

चेहरे पर मुस्कान और मस्तिष्क में कर्म की दिशा का ज्ञान! बालसुलभ बातें और जीवन की गूढ़ समस्याओं के हल निकालने की गहरी समझ! यही उनके चमत्कारी व्यक्तिव के सबसे आकर्षक पहलू हैं। तभी तो कृष्ण की दूरदर्शी सोच समस्या नहीं बल्कि समाधान ढूँढने की बात करती है। वे उदासी नकारात्मकता के विरोधी है। कृष्ण यह समझाते, सिखाते हैं कि जीवन की लड़ाई संयम और सधी सोच के साथ लड़ी जाये। उनका जीवन इस बात को रेखांकित करता है कि जीवन में आने वाली हर तरह की परिस्थितियों में कहीं धैर्य तो कहीं गहरी समझ आवश्यक है। कर्म के समर्थक कृष्ण सही अर्थों में जीवन गुरु है। क्योंकि हमारे कर्म ही जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। कर्म की प्रधानता उनके संदेशों में सबसे ऊपर है। इसी कारण वे ईश्वरीय रूप में भी आम इंसानों से जुड़े से दीखते हैं।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी कहा है कि ‘जब मुझे कोई परेशानी घेर लेती है, मैं गीता के पन्नों को पलटता हूं।’ हम सब जानते हैं कि बापू भी मानवीय सोच और जनकल्याण के पैरोकर रहे हैं। कृष्ण का जीवन प्रकृति के बहुत करीब रहा। प्रकृति के लिए उनके मन में जो अपनत्व रहा, वो समाज और राष्ट्र के सरोकारों से भी जोड़ने वाला है। कदम्ब का पेड़ और यमुना का किनारा उनके लिए बहुत विशेष स्थान रखते थे। प्रकृति का साथ ही उनके विलक्षण चरित्र को आनन्द और उल्लास का प्रतीक बनाता है। शायद यह भी एक कारण है कि कान्हा का नाम लेने से ही मन में उल्लास और उमंग छा जाती है। उन्होनें कष्ट में भी चेहरे पर मुस्कुराहट और बातों में धैर्य की मिठास को बनाये रखा। कोई अपना रूठ जाए तो मनुहार कैसे करनी है ? किस युक्ति से अपनों को मनाया जाता है ? यह तो स्वयं कृष्ण के चरित्र से ही सीखना चाहिए। वसुधैव कुटम्बकम के भाव को वासुदेव कृष्ण ने जिया है। मनुष्यों और मूक पशुओं से ही नहीं मोरपंख और बांसुरी से भी उन्होनें मन से प्रेम किया। कई बार तो ऐसा लगता मानो कृष्ण ने किसी वस्तु को भी जड़ नहीं समझा। तभी तो आत्मीय स्तर का लगाव रहा उन्हें हर उस वस्तु से भी जो उस परिवेश का हिस्सा थी, जहाँ वे रहे। वैसे भी पेड़ पौधे हों या जीव जन्तु, सम्पूर्ण प्रकृति की चेतना से जुड़ना ही सच्ची मानवता है। कान्हा का गायों की सेवा और पक्षियों से प्रेम यह बताता है कि जीवन प्रकृति से ही जन्म लेता है और मां प्रकृति ही इसे विकसित और पोषित करती हैं। सच में कभी कभी लगता है कि हम सबमें इस चेतन तत्व का विकास होगा तभी तो आत्मतत्व जागृत हो पायेगा। प्रकृति से जुड़ा सरोकार का ये भाव मानवीय सोच को साकार करने वाला है। यही वजह है कि विचार, व्यवहार और अपनत्व का यह भाव आज के जद्दोज़हद भरे जीवन में सबसे ज़रूरी है।

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साभार: गूगल

मानवीय स्वभाव की विकृति और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जनजागरण करने वाले योगेशवर कृष्ण सही अर्थों में अत्याचार और अहंकार के विरोधी हैं। ये दोनों ही बातें समाज में असमानता और विद्वेष फैलाने वाली हैं। यही वजह है कि उन्हें बंधी-बधाई धारणाओं और परंपराओं की जड़ता को तोड़ने वाला माना गया है। उनका चिंतन राष्ट्र-समाज के लिए हितकर विचारों को प्रोत्साहन देने वाला है। आमजन को अत्याचार से लड़ने और जागरूक रहने का संदेश देते हैं। वे स्त्री अस्मिता के प्रबल समर्थक रहे। आज के समय में एक सखा रूप में स्त्री के मान की रक्षा और उसके मन की सुनने का इससे सुन्दर उदाहरण नहीं मिल सकता। इसीलिए कर्मयोगी कृष्ण दमन के खिलाफ तो हैं ही, मन की पूर्णता के भी समर्थक हैं। इस बिखराव भरे दौर में राष्ट्र-राज्य की उन्नति के लिए समर्पित उनकी सोच सही मायनों में दिशा देने वाली साबित हो सकती है। उनकी हर क्रिया में जगत के कल्याण का उद्देश्य निहित है।

चेहरे पर मुस्कान और मस्तिष्क में कर्म की दिशा का ज्ञान! बालसुलभ बातें और जीवन की गूढ़ समस्याओं के हल निकालने की गहरी समझ! यही उनके चमत्कारी व्यक्तिव के सबसे आकर्षक पहलू हैं। तभी तो कृष्ण की दूरदर्शी सोच समस्या नहीं बल्कि समाधान ढूँढने की बात करती है। वे उदासी नकारात्मकता के विरोधी है। कृष्ण यह समझाते, सिखाते हैं कि जीवन की लड़ाई संयम और सधी सोच के साथ लड़ी जाये। उनका जीवन इस बात को रेखांकित करता है कि जीवन में आने वाली हर तरह की परिस्थितियों में कहीं धैर्य तो कहीं गहरी समझ आवश्यक है। कर्म के समर्थक कृष्ण सही अर्थों में जीवन गुरु है। क्योंकि हमारे कर्म ही जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। कर्म की प्रधानता उनके संदेशों में सबसे ऊपर है। इसी कारण वे ईश्वरीय रूप में भी आम इंसानों से जुड़े से दीखते हैं। मनुष्यों ही नहीं संसार के समस्त प्राणियों के लिए उनका एकात्मभाव देखते ही बनता है।

मानवीय स्वभाव की विकृति और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जनजागरण करने वाले योगेशवर कृष्ण सही अर्थों में अत्याचार और अहंकार के विरोधी हैं। ये दोनों ही बातें समाज में असमानता और विद्वेष फैलाने वाली हैं। यही वजह है कि उन्हें बंधी-बधाई धारणाओं और परंपराओं की जड़ता को तोड़ने वाला माना गया है। उनका चिंतन राष्ट्र-समाज के लिए हितकर विचारों को प्रोत्साहन देने वाला है। आमजन को अत्याचार से लड़ने और जागरूक रहने का संदेश देते हैं। वे स्त्री अस्मिता के प्रबल समर्थक रहे। आज के समय में एक सखा रूप में स्त्री के मान की रक्षा और उसके मन की सुनने का इससे सुन्दर उदाहरण नहीं मिल सकता।

सच भी है कि आज के दौर में भी नागरिक ही किसी देश की नींव सुदृढ़ करते हैं। वहां बसने वाले लोगों की वैचारिक पृष्ठभूमि और व्यवहार यह तय करते हैं कि उस देश का भविष्य कैसा होगा ? मानवीय व्यवहार और संस्कार की शालीनता बताती है कि वहां जनकल्याण को लेकर कैसे भाव हैं। अधिकतर समस्याओं का हल देश के नागरिकों के विचार और व्यवहार पर ही निर्भर है। ऐसे में, कृष्ण का कर्मशील होने का सन्देश सृजन की राह सुझाता है। संकल्प की शक्ति देता है। कर्मठता का भाव पोषित करता है। यही शक्ति हर नागरिक के लिए अधिकारों सही समझ और कर्तव्य-निर्वहन के दायित्व की सोच की पृष्ठभूमि बनती है।

कृष्ण की समाधानमूलक दूरदर्शी सोच राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं के सन्दर्भ में भी लागू होती है। तभी तो भाग्य की बजाय कर्म करने पर विश्वास करने की सीख देने वाला मुरली मनोहर का दर्शन आज के दौर में सबसे अधिक प्रासंगिकता रखता है। कर्ममय जीवन के समर्थक कृष्ण जीवन को एक संघर्षों से भरा मार्ग ही समझते हैं। हम मानवीय मनोविज्ञान के आधार पर समझने की कोशिश करें तो पाते हैं कि अकर्मण्यता जीवन को दिशाहीन करने वाला बड़ा कारक है। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कृष्ण का जीवन हर तरह से एक आम इंसान का जीवन लगता है। तभी तो किसी आम मनुष्य के समान भी वे दुर्जनों के लिए कठोर रहे तो सज्जनों के लिए कोमल ह्दय। उनका यह व्यवहार भी तो प्रकृति से प्रेरित ही लगता है और कर्म की सार्थकता लिए है। और यही विशेषताएं उन्हें सच्चे अर्थों में लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित भी करती हैं।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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