सरोगेसी के मनमाने उपयोग पर लगेगी लगाम, सरकार लायी नया क़ानून!

प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर सेरोगेसी के व्यावसायिक इस्‍तेमाल पर देश में पूरी तरह से रोक लग गई है। इस फैसले ने देश और समाज में मानवता और संवदेना के नाम पर चल रहे बाजार को पूरी तरह से खत्‍म कर दिया है। सेरोगेसी अर्थात् किराए की कोख जिसे कुछ लोग वरदान मानते हैं,  तो कुछ लोग मातृत्व का व्यापार। देश में हर साल बढ़ते सरोगेसी के मामलों से बड़ा विवाद गहराता रहा है। किराए की कोख के बढ़ते व्यवसाय को देखते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने सेरोगेसी बिल 2016 को मंजूरी दे दी है। इसके तहत सेरोगेसी के व्यावसायिक इस्तेमाल को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने का प्रावधान रखा गया है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की अध्यक्षता में गठित मंत्री समूह की सिफारिशों के आधार पर ही यह बिल तैयार किया गया है, जिसमें केवल नि:संतान जोड़ों को ही इस तकनीक को अपनाने की अनुमति दी गई है।

विदेश मंत्री ने कहा कि यह तकनीकी सुविधा केवल जरूरतमंदों को ही मिलनी चाहिए न कि पहले से ही दो-दो बच्चे होने के बावजूद शौकिया तौर पर इसे आजमाने वालों को। इससे यह केवल व्यवसाय बनता जा रहा है, जिसके पास पैसा है, वह इसका लाभ उठा सकता है और जो संतान के लिए तरस रहा है, वह पैसों के अभाव में इससे वंचित रह जाता है। हाल ही में कई बड़ी हस्तियों ने बच्चे होने के बावजूद सेरोगेसी तकनीक का उपयोग किया। हद तो तब हो गई, जब अभिनेता तुषार कपूर को अविवाहित पिता बनने का चस्का लगा और उन्होंने भी किसी की परवाह किए बिना सेरोगोसी को शौकिया तौर पर इस्तेमाल किया।

कई मामले ऐसे भी देखे गए हैं, जिनमें विदेशी या फिर प्रवासी भारतीय भारत आते हैं और गरीब व आदिवासी महिलाओं को पैसों का लालच देकर उनसे किराए की कोख खरीदते हैं। इसके बाद जब यह बच्चा दुनिया में आ जाता है, तो वह इसे अपनाने से मना कर देते हैं या फिर महिला को छोड़कर रफ्फूचक्कर हो जाते हैं। इसके बाद उन बेबस महिलाओं के पास बच्चे को पालने या फिर मारने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता है। भारत में भी कई ऐसे विवादित मामले देखने को मिले हैं, जिसमें बच्चा अगर लड़की है या फिर दिव्यांग तो उसे भी लेने से मना कर दिया जाता है, जिसमें उस महिला का कोई दोष नहीं होता है, जो पूरे नौ महीने तक उसे अपनी कोंख में रखती  है।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि यह तकनीकी सुविधा केवल जरूरतमंदों को ही मिलनी चाहिए न कि पहले से ही दो-दो बच्चे होने के बावजूद शौकिया तौर पर इसे आजमाने वालों को। इससे यह केवल व्यवसाय बनता जा रहा है, जिसके पास पैसा है, वह इसका लाभ उठा सकता है और जो संतान के लिए तरस रहा है, वह पैसों के अभाव में इससे वंचित रह जाता है। गौरतलब है कि हाल ही में कई बड़ी हस्तियों ने बच्चे होने के बावजूद सेरोगेसी तकनीक का उपयोग किया। हद तो तब हो गई, जब अभिनेता तुषार कपूर को अविवाहित पिता बनने का चस्का लगा और उन्होंने भी किसी की परवाह किए बिना सेरोगोसी को शौकिया तौर पर इस्तेमाल किया।

इन विसंगतियों को देखते हुए सरकार ने नए कानून का जो प्रस्ताव तैयार किया है, उसमें कुछ यह प्रावधान भी किया गया है कि सिर्फ भारतीय ही सेरोगेसी का लाभ उठा सकेंगे। विदेशी, प्रवासी भारतीय या फिर अन्य भारतीय जो यहां का नागरिक होने का दावा करता है, उसे इस तकनीकी से दूर रखा जाएगा। इसमें अविवाहित पुरुष या महिला, सिंगल, लिव इन में रह रहा जोड़ा, समलैंगिक जोड़े और बच्चे को गोद लेने वाले कप्ल्स को भी सेरोगेसी के लाभ से दूर रखने का प्रावधान रखा गया है।

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साभार: satyagrah.scroll.in

इस कानून के मद्देनजर केवल किराए की कोख नजदीकी रिश्तेदार ही दे सकेंगे, जिसमें मौसी, मामी और बुआ को शामिल किया गया है। इसके अलावा शादीशुदा दंपत्ति को इसके लिए आवेदन देने से पहले चिकित्सीय जांच में यह दिखाना होगा कि वह मां—बाप बनने में सक्षम नहीं हैं, तभी उन्हें इस तकनीक को उपयोग में लाने की मंजूरी दी जाएगी। केंद्र सरकार जल्द ही इसके लिए सेरोगेसी नेशनल बोर्ड स्थापित करेगी। वहीं दूसरी ओर किराए की कोख से पैदा होने वाले बच्चे को मां-बाप के जैविक बच्चे के समान हर कानूनी अधिकार प्राप्त होंगे। बच्चे के होने पर उसे सेरोगेट मदर के पास नहीं छोड़ा जा सकता है, ऐसा करने पर 10 साल की जेल और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना देना होगा। 

आज की बिजी लाइफ और स्टेटस के चलते कई नामी-गिरामी हस्तियां अपना समय और उनकी पत्नियां अपने फीगर को खराब होने से बचाने के लिए इसका उपयोग कर रही है।  उनकी मानसिकता बन गई है कि वह पैसों के बल पर मातृत्व का सुख भी खरीद सकती हैं। पर यह सोच बहुत ही छोटी है! क्योंकि हमारे वेदों—पुराणों में यही लिखा गया है कि स्त्री तभी पूर्ण मानी जाती है, जब वह अपनी कोख में नौ माह तक एक बच्चे को धारण करती है, यह सुख भोगने के लिए उन्हें ईश्वर का ऋृणी होना चाहिए, लेकिन समाज की खोखली और दिखावे की मानसिकता ने लोगों को आज केवल रोबोट की तरह बना दिया है, जो केवल मशीन की तरह काम तो करता है, लेकिन उसमें भावनात्मकता और प्यार नाम की कोई चीज नहीं होती है। यकीनन मोदी सरकार का यह कदम ऐतहासिक और अत्यंत सराहनीय है।

(लेखिका पेशे से पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।) 

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