वामपंथी क्रांतिकारियों के गढ़ जेएनयू का सच!

जब जेएनयू से ख़बर आयी कि एक वामपंथी नेता ने अपने ही साथ पढ़नेवाली छात्रा-कार्यकर्ता के संग बलात्कार किया है, तो सच पूछिए मुझे आश्चर्य तक नहीं हुआ। मनोविज्ञान के मुताबिक जब आप लगातार दुखद और खौफनाक घटनाओं से दो-चार होते रहते हैं, तो धीरे-धीरे उसके प्रति एक स्वीकार्यता का भाव आपमें आ जाता है। जेएनयू में वामपंथियों द्वारा बलात्कार न पहली और न ही आखिरी घटना है। दरअसल, ताज़ातरीन बलात्कार तो उस लड़के ने अपनी वामी-कौमी परंपरा को कायम रखते हुए ही किया है। जेएनयू के वामपंथियों की दोमुही नीति और दोहरा व्यवहार मेरे लिए नया नहीं है। नारी-स्वतंत्रता की बात करते हुए जिस गिरोह की नज़रें बारहां लड़कियों-औरतों के नीवि-बंधन को खोलने पर ही सिमटकर रह जाती हो, उस गिरोह के मक्का यानी जनेवि में इस काम को अंजाम देनेवाला, दलितों-शोषितों की लड़ाई लड़ने का दावा करनेवाला एक कॉमरेड आखिर अपनी परंपरा का निर्वाहक ही तो है। 

इतिहास की बात करें, तो चार-पांच किताबें भर जाएं, ‘आइसा’ के क्रांतिकारियों ने लड़कियों का रेप करने में इतनी क्रांति की है। ज़रा देखिए न, अनमोल के पहले वामियों के बलात्कारी इतिहास को। अनमोल तो बस अपनी परंपरा का पालन कर रहा था, आप ज़रा देख लीजिए। अभी बस छह महीने पहले आइसा का ही कार्यकर्ता रह चुका ‘अरशद आलम’ भी तो रेप के आरोप में बर्खास्त हुआ था। वह तो खैर, विदेशी बाला थी, जिसकी वजह से उसे बर्खास्तगी झेलनी पड़ी, वरना जेएनयू से पहले जामिया में भी उस पर यौन-दुराचरण के कई आरोप लग चुके थे। अरशद तो खैर, अप्राकृतिक यौनाचार का भी ‘प्रोफेसर’ था, ऐसा कई लोग कहते हैं। उससे पहले अकबर चौधरी और सरफराज हामिद जैसे तथाकथित छात्र नेताओं (जेएनयूएसयू अध्यक्ष और संयुक्त सचिव-2014) को भी यौन-हिंसा का आरोपी पाया गया था। 

हमेशा की तरह इसबार भी शिकार एक कॉमरेड ही है, जो अपने वामपंथी साथियों के साथ कंधे से कंधा लगाकर नारेबाजी करती है, पोस्टर बनाती है, जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन करती है और क्रांति के गीत गाती है। सिगरेट के धुएं में लिपटे हुए ‘फ्री-सेक्स’ की वकालत के बहाने कब किसी लड़की के जिस्म से उसके कपड़े नोंच डाले जाएं, इसकी जुगत में ही रहनेवाले वामपंथी लंपटों, खासकर ‘आइसा’ के धुरंधरों के लिए, इस तरह लड़कियों को अपनी हवास का शिकार बनाना कोई नयी बात नहीं है। 

इतिहास की बात करें, तो चार-पांच किताबें भर जाएं, ‘आइसा’ के क्रांतिकारियों ने लड़कियों का रेप करने में इतनी क्रांति की है। ज़रा देखिए न, अनमोल के पहले वामियों के बलात्कारी इतिहास को। अनमोल तो बस अपनी परंपरा का पालन कर रहा था, आप ज़रा देख लीजिए। अभी बस छह महीने पहले आइसा का ही कार्यकर्ता रह चुका ‘अरशद आलम’ भी तो रेप के आरोप में बर्खास्त हुआ था। वह तो खैर, विदेशी बाला थी, जिसकी वजह से उसे बर्खास्तगी झेलनी पड़ी, वरना जेएनयू से पहले जामिया में भी उस पर यौन-दुराचरण के कई आरोप लग चुके थे। अरशद तो खैर, अप्राकृतिक यौनाचार का भी ‘प्रोफेसर’ था, ऐसा कई लोग कहते हैं। उससे पहले अकबर चौधरी और सरफराज हामिद जैसे तथाकथित छात्र नेताओं (जेएनयूएसयू अध्यक्ष और संयुक्त सचिव-2014) को भी यौन-हिंसा का आरोपी पाया गया था। 

JNU-Anmol-Ratan

मजे की बात है कि आइसा से ही अपना सफर शुरू करनेवाली कविता कृष्णन आज माले के ही एक विंग में शीर्षस्थ पद पर भी हैं, लेकिन गहरी और ख़तरनाक चुप्पी हमेशा की तरह ओढ़ ली गयी है। हालांकि, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं कविता ने तरुण तेजपाल के लिए भी फील्डिंग की थी। इनकी ही एक साथी मनीषा शेठी, अपनी खनखनाती अंग्रेजी में चार-पांच पन्ने रंगकर यह बताना नहीं भूलती कि दास्तानगोई के नाम पर बलात्कार करनेवाला फारूकी दरअसल बलात्कारी है या नहीं, यह विवादित विषय है। वह तो उसके खिलाफ आए फैसले की भी चीरफाड़ करने लगती हैं। विदेश में पकड़े गए खौफनाक बूढ़े कॉमरेड का किस्सा तो आपलोग नहीं ही भूले होंगे। अफसोसनाक यह कि दलित चिंतक भी इस पर कुछ नहीं बोलेंगे और रही बात मासूम बालाओं की, उनको तो खैर, यह पता भी नहीं चलता कि भेड़ की खाल ओढ़े ये भेड़िए दिन-रात जिस क्रांति की बात करते हैं, दरअसल उसका एकमात्र लक्ष्य किसी नारी शरीर को इस्तेमाल करना ही होता है। अनमोल रतन नामक इस कॉमरेड ने फेसबुक पर लिखी एक पोस्ट को ज़रिया बनाया और मज़े की बात है कि दलित-चेतना पर बनी शानदार फिल्म ‘सैराट’ दिखाने के बहाने उस लड़की की दुनिया ही उजाड़ डाली। तकनीक का इतना शानदार इस्तेमाल एक वामपंथी ही कर सकता है।

जब तेजपाल से लेकर खुर्शीद तक, अरशद से लेकर अनमोल तक, बलात्कार की एक लंबी श्रृंखला वाम-कलंक का चमकदार हिस्सा हो। जिनके कॉमरेड बलात्कारी मरहूम खुर्शीद को क्रांतिकारी शहीद खुर्शीद बना देते हैं, जिनके साथी तेजपाल से लेकर अरशद तक को बचाने की जुगत में दिन-रात एक कर देते हैं। ऐसे वामपंथी तो पी वी सिंधु के मुंह पर थूकना चाहते हैं, लेकिन बलात्कारी के पक्ष मे जाकर खड़े हो जाते हैं। यह अद्भुत कमाल केवल जेएनयू के ‘क्रांतिकारी कॉमरेड’ ही कर सकते हैं। कविता कृष्णन अपनी माता तक को फ्री-सेक्स के घटिया डिबेट में शामिल कर लेती हैं, लेकिन तरुण तेजपाल जैसे बलात्कारी का बचाव करती है, दलितों के साथ के नाम पर गुजरात तक जाती है, लेकिन अपनी ही पार्टी के बलात्कारी के ऊपर कुछ बोलते उसकी सांस फूल जाती है। उनके मुंह में दही जम जाता है।

इस बार कॉमरेड ‘अनमोल रतन’ से एक ही ग़लती हुई। वह शिकार लड़की को चुनने में धोखा खा गए। वह लड़की कोई दलित, मध्यवर्गीय या दबी-कुचली पृष्ठभूमि की होती, तो कॉमरेड इस बार भी बेदाग थे। लड़की दरअसल उनकी हैसियत से कहीं बड़ी निकल गयी। वह तो खुद खुले विचारोंवाली, वामपंथी धारा की प्रतिबद्ध सेनानी निकल गयी। पारिवारिक और सामाजिक हैसियत में भी मजबूत! इसलिए, वह खड़ी हो गयी। कोई गरीब-मजलूम लड़की होती, तो उसकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवज बन कर ही रह जानी थी। वामपंथियों को हमेशा से ही इसकी आदत है, इसलिए इस बार भी उन्होंने एजेंडा सेट कर दिया। आइसा ने तो बाकायदा पर्चा निकालकर किसी भी तरह घटना पर बात करने से ही मना कर दिया है, पीड़िता की पहचान का बहाना बनाकर, उसकी पहचान को गुप्त रखने के नाम पर इस मामले की चर्चा करने से ही रोक दिया है।

लड़की के सवाल को उठाकर अब कॉमरेड ने तुरुप की चाल चल दी। कोर्ट से लेकर समाज तक, सब इस प्रश्न को उठाने से आपको रोकेंगे। आप उस लड़की का नाम नहीं ले सकते और आइसा के हमारे कॉमरेड अब उच्चासन पर बैठकर ‘लिंगदोह’ से लड़ने का संकल्प ले रहे हैं। जाकर देखिए, जेएनयू में यह मसला अब भूस बन चुका है, जिसमें चिंगारियां नहीं बचीं। वहां दो दिनों से लिंगदोह-कमिटी पर चर्चा चल रही है।इस मामले के एकाध तथ्य और भी चौंकाऊ हैं। लड़की ने GSCASH में शिकायत नहीं की है। क्यों? कहीं इसलिए तो नहीं कि वह जेएनयू के जीएसकैश की सारी करतूतों से बहुत कायदे से वाकिफ है…आखिर इसी जीएसकैश ने तो बलात्कारी अरशद को बचाने की जी-तोड़ कोशिश की है। 

यह मामला पुलिस के ‘संवेदनशील’ मामलों में से है। लेकिन, पूरे जेएनयू में ख़तरनाक और असहज चुप्पी फैली हुई है। कोई भी इस मसले पर बात तक करने को तैयार नहीं है। क्यों? डर, धमकी, लोभ, लालच, खौफ..आखिर वजह क्या है? वजह है कॉमरेड्स का हैरतनाक और लज्जा की सारी हदों को पार करने वाला तरीका, जिसे जानना हो तो कभी ‘एक माओवादी की डायरी’ (Shoba Mandi) पढ़िए। जिनको ये कॉमरेड कहते हैं, जो इनके साथ कांधे से कांधा मिलाकर चलती हैं, उसे ही ये वामपंथी अपनी गलत हरकतों का शिकार बना डालते हैं।

शर्म तो तुमको आती नहीं न कॉमरेड…! अब देखो न, जो लड़की तुम्हारे साथ मिलकर जंतर-मंतर पर नारे लगाती थी, जेएनयू के एड-ब्लॉक पर गाने गाती थी, तुम्हारे पोस्टर ब्वॉय के तिहाड़ से छूटकर आने पर जो गुलाल और अबीर उडाती थी, उसे भी तुमने नहीं बख्शा…उसे भी अपनी गलत हरकतों का शिकार बना लिया। 

लेखक जेएनयू के पूर्व छात्र हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं।

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