दलित-मुस्लिम गठजोड़ की सियासी चाल को समझना होगा!

कुछ मुस्लिम राजनेताओं ने आजकल दलितों को मुसलमानों के साथ आने का न्योता दिया है। उनका दावा है कि वे जब मुसलमानों के साथ आ जाएंगे तो हिंदुओं की हिम्मत नहीं है कि उनका बाल भी बांका कर सकें। पर जो मुस्लिम नेता इतनी बहबूदी हांकते हुए दलितों को अपने साथ आने के लिए मनुहार कर रहे हैं, उनके अपने समाज में दलितों की क्या कद्र है, इसका नमूना भी वे जान लें तो बेहतर रहे। मेरे एक दोस्त जो कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक समृद्घ और उदार मानसिकता वाले मुस्लिम व्यवसायी हैं, ने मुझसे अपने लड़के के लिए वधू तलाशने को कहा। अब मुस्लिम समाज में मेरी इतनी पैठ तो नहीं कि मैं बस फटाफट कुंडली लेकर बैठ जाऊँ, इसलिए मैने अपनी जान-पहचान वाले मुस्लिम मित्रों से अनुरोध किया कि वे लड़की बताएं। मगर उनका जो जवाब आया उससे तो मैं हक्का-बक्का रह गया। हर मुस्लिम मित्र ने यही पूछा कि उनकी जाति क्या है? मजे की बात कि इतनी बेशर्मी से किसीकी जाति तो हिंदू समाज में भी नहीं पूछी जाती। मैने कहा भी कि वे मुसलमान हैं और जहां तक मेरी जानकारी है वे सच्चे और ईमान वाले मुसलमान हैं। लड़का खूब पढ़ा-लिखा है और अपने व्यापार में लगा हुआ है। लड़की को कभी कोई तकलीफ नहीं होगी। उनके पास किसी तरह की कमी नहीं है। वे फलां-फलां जातियां गिनाते हुए कहने लगे कि आप पता करिए कि वे इन जातियों से तो नहीं हैं। मैने कहा कि यह तो मुझे नहीं पता मगर वे हैं खानदानी रईस। पुराने नवाब परिवार से हैं। मगर वे लोग नहीं मानें।

मेरे एक दोस्त जो कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक समृद्घ और उदार मानसिकता वाले मुस्लिम व्यवसायी हैं, ने मुझसे अपने लड़के के लिए वधू तलाशने को कहा। मैने अपनी जान-पहचान वाले मुस्लिम मित्रों से अनुरोध किया कि वे लड़की बताएं। मगर उनका जो जवाब आया उससे तो मैं हक्का-बक्का रह गया। हर मुस्लिम मित्र ने यही पूछा कि उनकी जाति क्या है? वे फलां-फलां जातियां गिनाते हुए कहने लगे कि आप पता करिए कि वे इन जातियों से तो नहीं हैं। अब जिस समाज में जाति इतनी अहम हो कि बिना जाति जाने शादी-ब्याह तो दूर बराबरी तक बिठाने में हिचक हो, वहां का समाज हिंदू समाज की उस जाति को स्वीकार कर लेगा जिस पर ठप्पा ही लगा है कि वह सदियों से दलित है। यह दरअसल असउददीन ओवैसी टाइप कुछ चतुर मुसलमानों का खेल है ताकि वे सत्ता में अपनी दखल बना सकें।

अब जिस समाज में जाति इतनी अहम हो कि बिना जाति जाने शादी-ब्याह तो दूर बराबरी तक बिठाने में हिचक हो वहां का समाज हिंदू समाज की उस जाति को स्वीकार कर लेगा जिस पर ठप्पा ही लगा है कि वह सदियों से दलित है। यह दरअसल असउददीन ओवैसी टाइप कुछ चतुर मुसलमानों का खेल है ताकि वे सत्ता में अपनी दखल बना सकें। हालांकि भारतीय समाज के जो जातीय समीकरण हैं, उनके मुताबिक दलित और मुस्लिम मिलाकर भी तीस परसेंट नहीं होते। यानी उन्हें अपने साथ एकाधिक और जातीय वोट बैंक को लाना पड़ेगा।

collage6502_111915103047

यह भी सच है कि जो बीस प्रतिशत दलित हैं, वे सब के सब एक राय होकर वोट नहीं करते। जाटव अलग जाता है तथा खटिक व पासी अलग रास्ता पकड़ता है। वाल्मीकि तो शुरू से ही बीजेपी के साथ जाता रहा है, इसलिए यह समीकरण सिर्फ इसलिए साधा जा रहा है ताकि ओवैसी महाशय यूपी में अपनी पकड़ बना सकें। वे अब आंध्र या दक्षिण के राज्यों में तो ऐसा गठबंधन बना नहीं सकते इसलिए यहां पर यूपी का समीकरण बिगाडऩे के लिए वे यह खेल खेल रहे हैं। अगर दलित बसपा अथवा ओवैसी द्वारा बनाये जा रहे इस समीकरण को नहीं समझ सके और उस समाज के साथ चले गए जो उनसे और भी दूरी बरतता है तो यह उनका आत्मघाती कदम होगा।

सत्य तो यह है कि चूंकि भारतीय मुस्लिम स्वयं हिंदू समाज से ही बना है, इसलिए वह अपने साथ हिंदू समाज की कुछ अनावश्यक रस्मो-रिवाज भी ले गए। उन्हीं में से एक जाति-व्यवस्था भी है। भले इस्लाम पंथ में सारे मुसलमान समान हों पर आचार-विचार और सामाजिकता में यह अंतर साफ दीखता है। यहां तक कि अलग-अलग जातियों की मस्जिदें भी अलग-अलग हैं। मुसलमान समाज में बेहना की क्या हैसियत होती है, यह बताना नहीं पड़ेगा। इसके अलावा देवबंदवी और बरेलवियों के झगड़े कोई कम नहीं हैं। बरेलवी मुसलमान तो हिंदुओं की तरह अपने पीर-औलिया को पूजते हैं और एकदम हिंदू तीर्थों की तरह वहां पर पंडे-पुरोहित होते हैं जो हर एक यात्री का पूरा लेखाजोखा रखते हैं। इसके अलावा शिया-सुन्नी-वोहरा और अहमदिया मुसलमान अलग हैं। इनमें से हर एक दूसरे से दूरी बरतता है और हिंसक हो उठता है। कुछ मुस्लिम औरतें पूरा शरीर ढक कर घर से निकलती हैं तो कुछ मुसलमानों में मिनी स्कर्ट पहनने की भी अनुमति है। कुछ अन्य धर्मावलंबियों के साथ बराबरी से पेश आते हैं और शरीयत के हामी नहीं होते तो कुछ दूसरे धर्म वालों के साथ रहने में असहज हो उठते हैं। इसलिए जो लोग मुस्लिम-दलित एकता की बात करते हैं, वे दरअसल झुनझुना ही दिखा रहे हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Name *