राजनीतिक मूल्यों और विचारों से हीन है आप, पतन तो होना ही है!

आम आदमी पार्टी (आप) गत वर्ष फ़रवरी में जब सत्ता में आई, तबसे लेकर अबतक वो अपने कामों के लिए कम कारनामों के लिए अधिक चर्चा में रही है। राजनीतिक शुचिता, पारदर्शिता और कर्तव्यनिष्ठा की बड़ी-बड़ी कसमें खाकर सत्ता में आने वाली इस पार्टी ने सत्ता का रसपान करते ही कैसे इन कसमों को तिलांजलि दे दी, उसकी गवाही उसके शासन का  ये लगभग डेढ़ साल का समय देता हैं।  इन डेढ़ सालों में एक-एक करके उसके दर्जन भर से ऊपर विधायक भिन्न-भिन्न मामलों में जेल के अंदर जा चुके हैं। इनमे फर्जी डीग्री से लेकर दंगा फैलाने और छेड़खानी करने जैसे मामले तक शामिल हैं। साथ ही, विधायकों की एक लम्बी-चौड़ी सूची लाभकारी पदों पर रहने के आरोप में चुनाव आयोग के पास मौजूद है, जिनकी सदस्यता  जाने का पूरा खतरा बना हुआ है। लेकिन, इन सबसे बढ़कर अभी हाल में आप सरकार के कैबिनेट मंत्री संदीप कुमार से सम्बंधित जो मामला सामने आया है, उसने तो अनैतिकता की सारी हदें ही पार कर दी हैं।

दरअसल बात यह है कि आम आदमी पार्टी की न तो कोई विचारधारा है, न कोई राजनीतिक मूल्य हैं और न ही कोई सांगठनिक अनुशासन ही इसमें नज़र आता है। यह सिर्फ स्वार्थ आधारित लोगों का एक समूह भर बनकर रह गई है।  कहा जाता है कि शीर्ष नेता जैसा आचरण प्रस्तुत करता है, नीचे वाले उसीके अनुसार बरतते हैं। आप के शीर्ष नेतृत्व यानि अरविन्द केजरीवाल का आचरण ही ऐसा अराजक और अगंभीर है कि बाकी पार्टी नेताओं से किसी तरह की भद्रता की अपेक्षा बेमानी लगती है। केजरीवाल जनता से किए अपने बड़े-बड़े वादों का एक हिस्सा भी वो इन दो सालों में वो ढंग से पूरा नहीं कर सके हैं, लेकिन इन सबके लिए अपने जिम्मेदारी लेने की बजाय केंद्र सरकार को निराधार रूप से दोषी ठहरा देना उनका शगल बन गया है।

संदीप कुमार आप सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।  इनकी एक सीडी  सामने आई है, जिसमें कि ये दो-एक महिलाओं के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिख रहे हैं। हालाकि इस सीडी के सामने आने के बाद केजरीवाल सरकार द्वारा मंत्री महोदय को पद से तो हटा दिया गया है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इतना पर्याप्त है ? सवाल तो यह भी है कि इमानदारी और शुचिता के किन मानदंडों पर परखकर केजरीवाल ने अपने इन नेताओं का चयन किया था, कि सत्ता में आने के डेढ़ साल के अंदर ही ये अपने दर्जन भर से अधिक विधायक आरोपों में घिरे पड़े हैं। इन सवालों के जवाब में केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी के पास सिर्फ एक रटा-रटाया जुमला है कि केंद्र की मोदी सरकार उन्हें काम नहीं करने दे रही और उनके नेताओं को फंसा रही है।

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केजरीवाल और संदीप कुमार

दरअसल बात यह है कि आम आदमी पार्टी की न तो कोई विचारधारा है, न कोई राजनीतिक मूल्य हैं और न ही कोई सांगठनिक अनुशासन ही इसमें नज़र आता है। यह सिर्फ स्वार्थ आधारित लोगों का एक समूह भर बनकर रह गई है।  कहा जाता है कि शीर्ष नेता जैसा आचरण प्रस्तुत करता है, नीचे वाले उसीके अनुसार बरतते हैं। शीर्ष नेतृत्व यानि अरविन्द केजरीवाल का आचरण ही ऐसा अराजक और अगंभीर है कि बाकी पार्टी से किसी तरह की भद्रता की अपेक्षा बेमानी लगती है। जनता से किए अपने बड़े-बड़े वादों का एक हिस्सा भी वो इन दो सालों में पूरा नहीं कर सके हैं। जिस लोकपाल के अन्ना आन्दोलन के दम पर ये जनता के बीच अपनी एक छवि कायम किए, उन अन्ना और उस लोकपाल के विषय में तो ये सत्ता में आने के बाद ये बात करना ही छोड़ चुके हैं।  तिसपर अपने वादें पूरे न कर पाने के लिए केंद्र सरकार को निराधार रूप से दोषी ठहरा देना तथा विपक्षी दलों के किसी भी नेता पर बिना सबूत के आरोप लगाना और खुद को सबसे पाक साफ बताना आदि उनका शगल बन गया है। अब ऐसे अगंभीर और बड़बोले नेतृत्व की छाया में चलने वाली इस पार्टी के नेताओं का ये अनैतिक आचरण और चारित्रिक पतन कतई अचंभित नहीं करता है। ऐसी विचारविहीन पार्टियों की यही नियति होती है, आम आदमी पार्टी भी उसी नियति की तरफ अग्रसर है।  

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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