मोदी सरकार की बड़ी सामरिक सफलता है लिमोआ समझौता, चीन-पाक हुए हलकान!

गत दिनों भारत और अमेरिका के बीच लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) यानी लिमोआ समझौता संपन्न हुआ। भारतीय रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर और अमेरिकी सुरक्षा सचिव एश्टन कार्टर ने इस समझौते पर हस्ताक्षर कर सैद्धांतिक तौर पर इसे अंतिम रूप दिया। ज्ञात हो कि बीते जून में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका गए थे, तब उसने भारत को प्रमुख रक्षा सहयोगी का दर्जा दिया था। यह समझौता उसी दर्जे का अगला चरण कहा जा सकता है। इस समझौते के बाद भारत और अमेरिका न केवल एक-दूसरे के सैन्य साधनों का इस्तेमाल कर सकेंगे, बल्कि तकनिकी से लेकर सैन्य क्षमताओं के विभिन्न स्तरों पर एक-दूसरे का सहयोग भी कर सकेंगे। इसके तहत अमेरिका भारतीय सैन्य बेसों का इस्तेमाल कर सकेंगा तो वहीँ भारत भी दुनिया भर में कहीं भी स्थित अमेरिकी बेसों का उपयोग करने के लिए अधिकृत होगा। आवश्यकता पड़ने पर दोनों देश एक दूसरे को इंधन से लेकर जरूरी उपकरण आदि का आदान-प्रदान भी कर सकेंगे। एक दूसरे के सैन्य ठिकानों की मरम्मत आदि भी कर सकेंगे। कुल मिलाकर कहने का मतलब इतना है कि यह समझौता होने के बाद अब भारत और अमेरिका की सेनाएं भारत या अमेरिका किसी भी देश में किसी भी आपदा की स्थिति में एक होकर उसका सामना कर सकेंगी।

संप्रग सरकार के दस वर्षों के शासनकाल में देश की विदेशनीति और कूटनीति की धार एकदम कुंद हो गई थी। इसी कारण चीन और पाकिस्तान जैसे बदमाश और संदिग्ध पड़ोसी देश के सिर पर चढ़ गए थे। पाकिस्तान द्वारा कश्मीर राग छेड़ने से लेकर सीजफायर उल्लंघन तक तो चीन द्वारा भारतीय सीमाओं में सैन्य अतिक्रमण तक मनमोहन सरकार सिर्फ शब्दों से ही कठोरता दिखाती रहती थी। इनको लेकर कोई ठोस नीति उस सरकार के कार्यकाल में नहीं दिखी। दो साल पहले मोदी सरकार के आने के बाद इस सरकार ने भी पहले इन पड़ोसी देशों के साथ सौहार्दयुक्त सम्बन्ध बनाने के लिए प्रयास किए, जो कि ठीक भी था। लेकिन, जब इन देशों की तरफ से इस दिशा में कोई सहयोग नहीं मिला तो मोदी सरकार ने अपनी नीति बदल दी। अब उसी बदली नीति का ये परिणाम है कि बलूचिस्तान, पीओके आदि के जरिये पाकिस्तान को उसीकी भाषा में जवाब देने से लेकर चीन को कड़ा सन्देश देने के लिए अरुणाचल पर ब्रह्मोस की तैनाती का आदेश देने तक ठोस कदम उठाए गए। ये लिमोआ समझौता भी कहीं न कहीं उसी बदली नीति की एक कड़ी है।

इसी संदर्भ में अगर यह समझने का प्रयत्न करें कि इस समझौते में दोनों देशों में कौन कितने फायदे में रहेगा तो कई बातें सामने आती हैं। समझा जा सकता है कि अमेरिका की सैन्य क्षमता तकनिकी स्तर पर भारत से कहीं अधिक विकसित है, इसलिए इस बिंदु पर तो सीधे-सीधे भारत ही फायदे में रहेगा। साथ ही, अगर देश पर प्राकृतिक आदि कोई आपदा आती है तो उसमें भी हमारी सेना को अमेरिका का सहयोग मिलेगा। इस तरह इन सब मामलों में भारत को लाभ होगा। वहीँ, किसी आपात स्थिति में दोनों देश आवश्यकतानुसार एक दूसरे के सैन्य ठिकानों पर रसद आदि की आपूर्ति भी कर सकेंगे, इस स्तर पर अमेरिका लाभान्वित हो सकता है। क्योंकि दुनिया भर में इधर-उधर उसीने आतंकवाद आदि के विरुद्ध सैन्य अभियान छेड़ रखे हैं। साथ ही, चीन जैसे अपने बड़े प्रतिद्वंद्वी पर दबाव बनाने की दृष्टि से भी अमेरिका के लिए ये समझौता महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। हालांकि चीन की दृष्टि से तो तो यह लाभ भारत को भी होगा। इस प्रकार समझा जा सकता है कि यह परस्पर हितों पर आधारित एक समझौता है। यही बात समझौते के बाद साझा बयान में दोनों देशों के प्रतिनिधियों यानी रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर और अमेरिकी सुरक्षा सचिव एश्टन कार्टर द्वारा भी कही गई।

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बहरहाल, भविष्य में इस समझौते का जो प्रभाव और परिणाम सामने आए लेकिन, फिलहाल इस समझौते ने देश के चीन-पाक जैसे संदिग्ध पड़ोसियों को हलकान जरूर कर दिया है। दरअसल दक्षिणी चीन सागर में अबतक चीन जो दादागिरी दिखाता आया है, वो इस समझौते के बाद आसान नहीं रहेगी। सिर्फ दक्षिणी चीन सागर ही क्यों, इस समझौते के बाद अब अमेरिका भारत के साथ लगभग हर सैन्य अभियान में खड़ा रहेगा। इस नाते चीन अपनी सैन्य क्षमता के दम पर समूचे एशिया में जो दादागिरी दिखाता रहा है, वो भी अब आसान नहीं रहेगी। अब ऐसा कुछ भी उत्पात करते वक़्त उसे भारत का सामना करना पड़ सकता है, जो कि उसके लिए लोहे के चने चबाने जैसा होगा। ये प्रमुख कारण है कि चीन इस समझौते से हलकान है। अब जिस समझौते ने चीन जैसे देश को हलकान किया हुआ है, उससे पाकिस्तान का परेशान हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है।

इस प्रकार समझा जा सकता है कि इस लिमोआ समझौते के बाद भारत की सामरिक क्षमता को बेहद मजबूती मिलेगी। इसे मौजूदा सरकार की एक बड़ी सामरिक व कूटनीतिक सफलता कहा जा सकता है। दरअसल संप्रग सरकार के दस वर्षों के शासनकाल में देश की विदेशनीति और कूटनीति की धार एकदम कुंद हो गई थी। इसी कारण चीन और पाकिस्तान जैसे बदमाश और संदिग्ध पड़ोसी देश के सिर पर चढ़ गए थे। पाकिस्तान द्वारा कश्मीर राग छेड़ने से लेकर सीजफायर उल्लंघन तक तो चीन द्वारा भारतीय सीमाओं में सैन्य अतिक्रमण तक मनमोहन सरकार सिर्फ शब्दों से ही कठोरता दिखाती रहती थी। इनको लेकर कोई ठोस नीति उस सरकार के कार्यकाल में नहीं दिखी। दो साल पहले मोदी सरकार के आने के बाद इस सरकार ने भी पहले इन पड़ोसी देशों के साथ सौहार्दयुक्त सम्बन्ध बनाने के लिए प्रयास किए, जो कि ठीक भी था। लेकिन, जब इन देशों की तरफ से इस सम्बन्ध में कोई सहयोग नहीं मिला तो मोदी सरकार ने अपनी नीति बदल दी। अब उसी बदली नीति का ये परिणाम है कि बलूचिस्तान, पीओके आदि के जरिये पाकिस्तान को उसीकी भाषा में जवाब देने से लेकर अरुणाचल पर ब्रह्मोस की तैनाती का आदेश देने तक ठोस कदम उठाए गए हैं। ये लिमोआ समझौता भी कहीं न कहीं उसी नीति की एक कड़ी है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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