पटेल ने नेहरू से कहा था, गांधी की हत्या से संघ का कोई लेना-देना नहीं!

संघ-विरोधियो के लिए गांधी की हत्या संघ को दबाने और कुचलने का साधन बन गयी थी, जिसका उपकरण के रूप में आज तक उपयोग किया जा रहा है। गांधी की हत्या के बाद दो-दो जांच आयोगों ने कभी भी संघ के नेतृत्व को इसमें लिप्त नही पाया, न ही संघ के कार्यकर्ताओ की कोई भूमिका प्रमाणित हुई। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को पत्र लिख कर कहा था “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इस कार्य से कुछ लेना देना नही है।” लेकिन फिर भी कुछ लोग “संघ-शक्ति” को उभरते हुए नही देखना चाहते थे, इसलिए हमेशा से यह एकपक्षीय प्रोपेगेंडा चलता रहा है, जिसे सिद्ध करने के लिए किसीके पास कोई प्रमाण नहीं है।

संघ-विरोधियो के लिए गांधी की हत्या संघ को दबाने और कुचलने का साधन बन गयी थी, जिसका उपकरण के रूप में आज तक उपयोग किया जा रहा है। गांधी की हत्या के बाद दो-दो जांच आयोगों ने कभी भी संघ के नेतृत्व को इसमें लिप्त नही पाया, न ही संघ के कार्यकर्ताओ की कोई भूमिका प्रमाणित हुई। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को पत्र लिख कर कहा था “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इस कार्य से कुछ लेना देना नही है।” लेकिन फिर भी कुछ लोग “संघ-शक्ति” को उभरते हुए नही देखना चाहते थे, इसलिए हमेशा से यह एकपक्षीय प्रोपेगेंडा चलता रहा है, जिसे सिद्ध करने के लिए किसीके पास कोई प्रमाण नहीं है।

गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार नाथूराम गोडसे कभी भी संघ का जिम्मेदार कार्यकर्ता नही रहा, गोडसे विशुद्ध रूप से हिन्दू महासभा से स्थानीय स्तर पर कहीं जुड़ा था, जो खुले आम तत्कालीन संघ नेतृत्व एवं स्वयंसेवको को लानत-मलानत भी भेजा करता था। इसी सन्दर्भ में एक बात और समझने की है, जिसके घालमेल की वजह से कुछ चीजे समाज में स्पष्ट रूप से नहीं जा पातीं। हमेशा से ही हिन्दू महासभा और संघ दो अलग अलग संगठन रहे हैं। महासभा एक राजनीतिक संगठन था तथा संघ अराजनीतिक संगठन। दोनों की कार्यपद्धति में विराट अंतर था लेकिन क्योंकि डा हेडगेवार आरम्भ में महासभा के वरिष्ठ नेताओ के सम्पर्क में रहे इसलिए तब संघ और महासभा को एक ही संगठन के तौर पे देखने की गलती कुछ लोग करते थे। महासभा के कुछ नेता भी संघ को अपना सैन्य संगठन बनाना चाहते थे जिसे डा हेडगेवार ने कभी स्वीकार नही किया।

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यहां तक कि महासभा समर्थित “वन्देमातरम्” पत्र में 12 लेखो की शृंखला में डा हेडगेवार को हठी, अभिमानी, घमण्डी, हिन्दुत्वशक्ति का विभाजक जैसे अपमानित करने वाले शब्दों का भी प्रयोग किया गया तब भी डा हेडगेवार अपने निर्धारित उच्च लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहे। कभी भी संघ को महासभा की महत्त्वाकांक्षा की आग में नष्ट नही होने दिया। इसका अभिप्राय यह हुआ कि महासभा के भी किसी कार्य के लिए संघ को उत्तरदायी ठहराना संघ के साथ अन्याय करने जैसा है।

गांधी की हत्या के लिए संघ को जिम्मेदार ठहराने के सन्दर्भ में संघ के शीर्ष नेतृत्व तथा कार्यकर्ताओ का व्यवहार भी परखना चाहिए, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि गांधी की हत्या में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष षड्यंत्र तो छोड़िये संघ का मानसिक या मौन समर्थन भी कदापि नही था। गांधी की हत्या का संदेश मिलते ही तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी ने सार्वजनिक पत्र लिखकर शोक व्यक्त किया था, वे इसे त्रासदी के रूप में देखते थे।

दीनदयाल उपाध्याय जो कि संघ के वरिष्ठ प्रचारक तथा जनसंघ के संस्थापको में रहे, उनका मानना था कि गांधी की ह्त्या हिन्दुत्ववादियों का सफाया करने का उत्तम राजनीतिक अवसर था, जिसका लाभ उठाकर 1948 में संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। संघ के एक अन्य वरिष्ठ प्रचारक तथा भारतीय मजदूर संघ के प्रणेता श्री दत्तोपंत ठेंगडी जी “हिन्दू मानसिकता” पुस्तक में लिखते हैं कि गांधी की हत्या से देश के बाद अगर किसी का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है तो वह संघ है। उस समय संघ का कार्य तेजी से देश भर में बढ़ रहा था परंतु गांधी की ह्त्या में लपेटने और प्रतिबन्ध लगने से संघ कार्य की बड़ी क्षति हुई। उन्होंने गांधी की हत्या को किसी भी दृष्टिकोण से उचित नही ठहराया अपितु गोडसे की कड़ी भर्त्सना की।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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