‘सुशासन’ के मुंह पर ‘जंगलराज’ का झन्नाटेदार तमाचा

यह लेखक जिस वक्त और जहां बैठकर यह बातें टाइप कर रहा है, उसके ठीक एक दिन पहले इस जगह से केवल दो किमी दूर, राजधानी पटना में सरेशाम एक प्रेस फोटोग्राफर के बेटे को गोली मार दी गयी है। उसी दिन दो और हत्याएं महज पांच किलोमीटर के दायरे में हुई हैं। इसी ख़बर के संदर्भ में एक और ख़बर को देखिए। शनिवार को ही बिहार के सीवान में आतंक का पर्याय रहा पूर्व सांसद शहाबुद्दीन छूटता है। जैसी की रवायत है, एक दुर्दांत अपराधी की रिहाई को भी हमलोगों ने राजनीतिक उठापटक में बदल दिया है। 

सवाल यह नहीं है कि शहाबुद्दीन को जमानत मिली, सवाल सबसे बड़ा इस जमानत के गिर्द घिरी चुप्पियों और महीन चालबाज़ियों का भी है। सवाल तो वैसे अपनी टीवी स्क्रीन काली कर लेनेवाले उस पत्रकार का भी है, जो बड़ी खूबसूरती से एक सामान्यीकृत बात करते हुए सीधे और साफ शब्दों में शहाबुद्दीन पर हमला करने से बच जाते हैं। सवाल, उन बुद्धिजीवियों का भी है, जिन्होंने कोई अवॉर्ड वापसी अभियान नहीं चलाया। सवाल तो उन आलोक धन्वा और अरुण कमल जैसे बुद्धिजीवियों से भी है, जो गहन चुप्पी साधे बैठे हैं। सवाल तो हरिवंश नामक संपादक के उस ‘अख़बार नहीं, आंदोलन’ से भी है, जो जद-यू के कोटे से राज्य सभा में बैठे ज्ञान बांच रहे हैं। सवाल, उन अशोक वाजपेयी और सैबाल गुप्ता से भी है, जो नीतीश के बगलगीर हैं।

शहाबुद्दीन की रिहाई ने कुछ मौलिक सवाल खड़े किए हैं। सवाल यह कि निकलने के तुरंत बाद जो उसके तेवर और बॉडी-लैंग्वेज थी, उसने साफ कर दिया कि इस अपराधी को न तो पश्चात्ताप है, न ही किसी तरह से उसे कानून और सरकार का खौफ है। जिस ठाठ और दबंगई से इसने अपना विजय-जुलूस निकलवाया, उसने तय कर दिया कि आनेवाले दिनों में सीवान की जनता को फिर से दबे-कुचले रह कर ही अपने दिन गुजारने होंगे। शहाबू के नाम पर हो रही ‘सांप्रदायिक गोलबंदी’ और उसके बदले किसी और अपराधी का उदाहरण देना, किसी और गुंडे का नाम लेना बताता है कि एक समाज के तौर पर हमारे अंदर कितनी सुधार की ज़रूरत है?

बिहार की मौजूदा राजनीति के बहाने यह भी सवाल कि अपराधीकरण का महिमा मंडन भी क्या हमारी राजनीति की जरूरत है, क्या एक वैचारिक प्रतिद्वंद्वी को ग़लत दिखाने के लिए हमें गुंडे-बदमाश की तस्वीर पर माला चढ़ाना जरूरी है? ग्यारह साल बाद जेल से रिहा होने के बाद घोषित अपराधी शहाबुद्दीन के स्वागत के नाम पर जिस तरह उसके समर्थकों ने उत्पात किया, भागलपुर से सीवान तक के रास्ते में लगभग 300-400 गाड़ियों का काफिला बिना किसी रोक के दौड़ा, वह भी समाज के तौर पर हमारी भौं पर बल डालने के लिए काफी होना चाहिए। हालात यह रहे कि पुलिस ने इलाके में पड़ने वाले सभी टोल बूथों को इस काफिले से कोई भी फीस ना लेने का आदेश दिया। सोचने की बात तो यह भी है कि अगर पुलिस टोल वसूलना भी चाहती, तो क्या मदमत्त हाथियों का यह झुंड टोल देता?

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मोहम्मद शहाबुद्दीन आरजेडी कार्यकारिणी के सदस्य हैं। उसको ट्रायल कोर्ट से कई मामलों में एक साल, दो साल, तीन साल और दस साल की सज़ा हो चुकी है। दो मामलों में आजीवन कारावास की सज़ा हो चुकी है। ये सारी सज़ा 2007 से लेकर 2015 के बीच हुई है। इन मामलों को शहाबुद्दीन ने ऊपरी अदालत में चुनौती दी है। इसके ख़िलाफ़ ट्रायल कोर्ट में ही 37 मामलों में गवाही पूरी हो चुकी है, लेकिन बचाव पक्ष के नहीं आने से फैसले नहीं हो सके। वैसे, मज़े की एक बात और है कि 2012 में शहाबुद्दीन ने उनकी खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए अपने लिए बेहतर वकील की मांग की थी। ट्रायल कोर्ट के तत्कालीन जज ने याचिका मंज़ूर की, लेकिन राज्य सरकार इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट गयी। वहीं, शहाबुद्दीन को मिली राहत पर स्टे लगा और उच्च अदालत ने निर्देश दिया कि शहाबुद्दीन ट्रायल में ख़ुद हाज़िर हों और अपना वकील रखें। चार साल से हाईकोर्ट का यह नोटिस शहाबुद्दीन को मिला ही नहीं है। शहाबुद्दीन कहां था? न्यायिक हिरासत में। सरकार क्या कर रही थी? सो रही थी….।

यह एक सामान्य सा कानूनी पेंच था, जिसे नीतीश कुमार और उनकी सरकार को छोड़कर बाक़ी सभी समझ सकते हैं, केवल वे ही नहीं समझ पाए। खैर, समझ के बाहर तो हम लोगों के यह भी नहीं है कि नीतीश सरकार के रसूखदार मंत्री ललन सिंह को इस ख़बर से शर्म भी क्यों नहीं आती कि शहाबुद्दीन और उसका काफिला बिना टोल टैक्स दिए एनएच को रौंदता रहा? ललन सिंह चुल्लू भर पानी में डूब मरने के बजाय बड़ी सुर्खी से गाल बजाते हुए भरी प्रेस कांफ्रेंस में कहते हैं कि टोल टैक्स तो वे और उनके समर्थक भी नहीं देते। इतना ही नहीं, वे तो कांफ्रेंस में पत्रकारों से भी पूछते हैं, ‘आप लोग भी टैक्स नहीं देते होंगे न?’ यह हमारा समाज है, यह हमारी सत्ता है, ऐसे बेशर्म हमारे मंत्री है, ऐसा हमारा तंत्र है…यही बिहार हमने बनाया है।

सरकार में जिस दिन से लालू प्रसाद की हिस्सेदारी (केवल हिस्सेदारी या वर्चस्व?) हुई, जिस दिन तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने, साफ तो उसी दिन हो गया था कि शहाबुद्दीन जेल से निकलेंगे, वरना उच्च अदालत के आदेश की प्रति न्यायिक हिरासत में बंद व्यक्ति को न मिले, यह काम तो ‘सुशासन’ में ही संभव है। साफ था कि शहाबुद्दीन को ज़मानत मिल जाएगी क्योंकि 37 मामलों में शहाबुद्दीन के पेश न होने से ट्रायल शुरू नहीं हुआ। सवाल इसका भी नहीं है कि शहाबुद्दीन को जमानत मिली, सवाल सबसे बड़ा इस जमानत के गिर्द घिरी चुप्पियों और महीन चालबाज़ियों का भी है। सवाल तो वैसे अपनी टीवी स्क्रीन काली कर लेनेवाले उस पत्रकार का भी है, जो बड़ी खूबसूरती से एक सामान्यीकृत बात करते हुए सीधे और साफ शब्दों में शहाबुद्दीन पर हमला करने से बच जाते हैं। सवाल, उन बुद्धिजीवियों का भी है, जिन्होंने कोई अवॉर्ड वापसी अभियान नहीं चलाया। सवाल तो उन आलोक धन्वा और अरुण कमल जैसे बुद्धिजीवियों से भी है, जो गहन चुप्पी साधे बैठे हैं। सवाल तो हरिवंश नामक संपादक के उस ‘अख़बार नहीं, आंदोलन’ से भी है, जो जद-यू के कोटे से राज्य सभा में बैठे ज्ञान बांच रहे हैं। सवाल, उन अशोक वाजपेयी और सैबाल गुप्ता से भी है, जो नीतीश के बगलगीर हैं।

सवाल अंतहीन हैं, जवाब नदारद। सवाल उन सब से भी है, जो अनंत सिंह के ऊपर लगे सीसीए का बचाव कर रहे हैं, सवाल उनका भी है, जो इसी बहाने अमित शाह और मोदी तक पर लगाए गए आरोपों को याद कर शहाबुद्दीन के बचाव के लिए ज़मीन तैयार कर रहे हैं। सवाल तो यह भी है कि ‘मेरा अपराधी मसीहा, तुम्हारा अपराधी घृणित…’ का दांव चलनेवाले नेता कब तक बिहारी या किसी भी प्रदेश की जनता के भविष्य के साथ इसी तरह बलात्कार करते रहेंगे। शहाबुद्दीन की रिहाई को केवल नीतीश कुमार अदालती फैसला बता सकते हैं, राज्य की जनता सच जानती है। नीतीश कुमार ने बारूद के ढेर को तीली दिखा दी है। अब अनंत सिंह, सुनील पांडे, हुलास पांडे से लेकर तमाम अपराधी-गुंडों के गिर्द उनकी जात और जमात के लोग गोलबंद होंगे, उनका महिमामंडन होगा और यही लोग हैं, जिनकी वजह से हरेक जात और संप्रदाय का एक दो कौड़ी का नेता कुछ समय के बाद युवा-हृदय सम्राट और न जाने क्या-क्या बन जाता है? वहीं, शहाबुद्दीन को मुसलमानों का नेता साबित करने और मजलूमों का मसीहा बतानेवाले यह भूल जाते हैं कि यही अपराधी एक दिन उनके लिए भी काल साबित होगा। लालू यादव अब उनके जरिए मुसलमानों को गोलबंद करेंगे और कुल मिलाकर बिहार का दुर्भाग्य फिर कसकर फूटने को तैयार है, राज्य में जंगलराज फिर से अपने उरूज पर जा चुका है।

अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सनक में नहाए नीतीश बोलते हैं कि सरकार तो जनादेश का सम्मान करेगी, क्या बिहारी जनता ने उनको यह जनादेश इसी दिन के लिए दिया था? नीतीश शायद यह भूल गए हैं कि उन्होंने और लालू ने अपनी जुगलबंदी से बिहार को उस अंधेरे में धकेल दिया है, जहां से वापसी की राह नहीं। आप यह लेख पढ़ पा रहे हैं, तो अपनी संवेदना को कत्ल कर पढ़ें, क्योंकि आपको फिर से जात और धर्म के नाम पर लड़ना जो है। आपसे यही बुद्धिजीवी फिर से सवाल करने वाले हैं- शहाबुद्दीन के लिए तो तुम खूब बोल रहे हो, लेकिन अनंत सिंह के लिए क्यों नहीं बोले, फलाने के लिए क्यों नहीं बोले। मुसलमान युवकों को यही बुद्धिजीवी समझाएंगे कि शहाबुद्दीन उनका मसीहा है। यही बुद्धिजीवी ख़तरनाक चुप्पी साधे हुए काले को सफेद और सफेद को काला करने में लगे रहेंगे।

इसके अलावा दूसरा रास्ता भी है। इसे पढ़िए और खून के आंसू रोइए, क्योंकि कल को आप भी खून होनेवाले हैं, क्योंकि आपका खून पानी हो गया है, आपकी आंखों का पानी मर गया है। आप खुद को ज़िंदा कहते हैं, पर आप चलती-फिरती लाशें ही तो हैं। पढ़िए, और खून के आंसू रोइए, क्योंकि हमारी पहचान आज राष्ट्रकवि दिनकर से नहीं, पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से नहीं, बल्कि शहाबुद्दीन से है, उस खूंखार और दुर्दांत अपराधी से है, जो लोगों को तेज़ाब से नहलाता है, छात्रनेता को दिनदहाड़े मारता है और मूंछों पर ताव देता हुआ पूरी सत्ता को ठेंगे पर रखता हुआ पूरे निजाम को रौंद रहा है।

रोइए, खून के आंसू रोइए क्योंकि आपने खुद उसे अपना मसीहा, अपना नेता चुना है। रोइए, क्योंकि सज़ायाफ्ता लालू यादव को आपने सामाजिक न्याय के नाम पर अपने माथे पर बिठाया है, रोइए कि आपने उन्हीं के 9वीं फेल बेटे को उपमुख्यमंत्री बना दिया है। शहाबुद्दीन आखिर जो भी है, वह लालू प्रसाद के आशीर्वाद से ही तो है। रोइए, क्योंकि आपने सुशासन के नाम पर उस नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया, उफनता जनादेश दिया, जो अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और उन्माद के लिए उसी लालू यादव की गोद में जाकर बैठ जाते हैं, जो जंगल राज के प्रतीक पुरुष हैं। रोइए, ज़ार-ज़ार रोइए, क्योंकिः-  आप बिहारी हैं…आप कायर हैं….आप जातिवादी हैं…आप मनुष्य नहीं हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।

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