हिंदी साहित्य के प्रथम और अंतिम आलोचक नहीं हैं नामवर सिंह : रामदेव शुक्ल

प्रख्यात कथाकार,आलोचक एवं दीनदयाल उपाध्याय विश्विद्द्यालय गोरखपुर के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. रामदेव शुक्ल से हुई बात-चीत का कुछ अंश:

सवाल : नमस्कार। एक प्रसिद्ध कथाकार एवं उपन्यासकार के तौर पर साहित्य जगत में आपकी ख्याति रही है। गद्य लेखन की उपन्यास विधा को लेकर जब साहित्यकारों के बीच मतैक्य नहीं है ऐसे में लेखन की इस विधा पर आपका व्यक्तिगत नजरिया क्या है ?

प्रो. शुक्ल : जी नमस्कार,गद्य लेखन के क्षेत्र में उपन्यास विधा समाज के साथ सबसे करीब से जुड़ी हुई विधा है। उपन्यास को समाज का आइना कहा जाना गलत नहीं होगा। उपन्यास वो विधा है जो अपने दौर के सामाजिक परिस्थितियों का सजीव चित्रण कर पाने में साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा सर्वाधिक सफल रही है। अगर एक पंक्ति में कहा जाय तो विभिन्न कालखंडों की सामाजिक परिस्थितियों के तमाम पहलुओं को कथानक का रूप देते हुए उसे विस्तार से कागज़ पर उकेरना ही उपन्यास है। गद्य लेखन के उपन्यास विधा के माध्यम से ही लेखक द्वारा अपने दौर के तत्कालीन समाज का सबसे उत्कृष्ठ एवं व्यापक चित्रण संभव है।

सवाल : वैसे तो आपने संकल्पा,अगला कदम,बेघर बादशाह जैसे दर्जनों चर्चित उपन्यास लिखें हैं लेकिन आपके द्वारा लिखा गया उपन्यास ग्राम-देवता सर्वाधिक चर्चा में रहा है। ग्राम-देवता पर आप क्या टिप्पणी करना चाहेंगे ?

प्रो. शुक्ल : ग्राम-देवता उपन्यास साठ-सत्तर के दशक के दौरान भारत के गावों में व्याप्त सामाजिक विषमता,छुआ-छूत एवं भेद-भाव की कथानक के माध्यम से प्रस्तुति मात्र है। इस उपन्यास के माध्यम से तत्कालीन दौर में अभिजात्य वर्ग द्वारा शोषित समुदाय पर किये जाने वाले अत्याचारों को पात्रों के माध्यम से कथानक के रूप में दर्शाने का प्रयास किया गया है। दरसल,ग्राम-देवता एक व्यंगात्मक प्रहार है उस अभिजात्य वर्ग के पाखंडी समाज पर जो सभी तरह के गलत कर्म करने के बावजूद अपनी शुद्धता एवं सर्वोच्चता साबित करने का पाखंड रचते हैं। इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद साहित्य जगत द्वारा दी प्रतिक्रियाओं में कहा गया कि प्रेमचंद की कहानियां जहाँ खतम होती है ग्राम-देवता वहीँ से शुरू होता है। चुकि इस उपन्यास के कथा-वृतांत,पात्रों के चरित्र एवं भाषा आदि में पूर्वी संस्कृति का व्यापक हस्तक्षेप नजर आता है, अत: इसके भोजपुरी अनुवाद की मांग भी साहित्य जगत में विद्द्या निवास मिश्र जैसे प्रख्यात साहित्यकारों द्वारा की गयी थी। परिणामत: आगे चलकर कुछ नए खंडों के साथ ग्राम-देवता भोजपुरी में भी प्रकाशित हुआ।

सवाल : नाटककार प्रसाद,कबीर का सच,घनानंद का श्रृंगार काव्य,नाटककार लक्ष्मीनारायण मिश्र एवं निराला के उपन्यास सहित दर्जनों आलोचना साहित्य लिखने के बाद आपकी पहचान वर्तमान साहित्य जगत में कुशल कथाकार के अलावा एक समृद्ध आलोचक के रूप में भी स्थापित हुई। बतौर आलोचक आप वर्तमान साहित्यिक धारा में आलोचना विधा की स्थिति एवं वर्तमान आलोचकों द्वारा किये जा रहे आलोचना-कर्म के प्रति क्या दृष्टिकोण रखते हैं ?

प्रो. शुक्ल : साहित्य लेखन में आलोचना अथवा समालोचना का उद्देश्य सृजक द्वारा सृजित मूल सामग्री के तमाम सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं को दर्शाते हुए उसकी विस्तृत विवेचना करना होता है। अगर देखा जाय तो हिंदी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में आलोचना विधा की स्थिति लगातार कमजोर होती गयी है और आलोचना-कर्म में अनुशासन का छ्य होता गया है। साहित्य में आलोचना के अनुशासन की समझ लागातार कम होती जा रही है। वर्तमान साहित्य सृजन के संदर्भ में यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दी साहित्य की तमाम विधाओं में सबसे विपन्न स्थिति में आलोचना-कर्म ही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की श्रृंखला को चलाने वाले आलोचक ना के बराबर है और उस स्तर की आलोचना के दर्शन तो साहित्य के वर्तमान कालखंड में लगभग असंभव ही कहे जा सकते हैं।

सवाल : आप खुद एक बड़े आलोचक हैं ऐसे में आलोचना विधा पर आपकी यह टिप्पणी क्या नामवर सिंह सरीखे साहित्य जगत के प्रख्यात आलोचकों के लिए प्रश्नचिन्ह नहीं है ?

प्रो. शुक्ल : ऐसा बिलकुल नहीं है। नामवर सिंह अथवा कोई भी साहित्यकार एवं आलोचक ना तो हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रथम आलोचक है और ना ही अंतिम आलोचक होगा। मेरा सीधा तात्पर्य ये था कि आज का स्थापित आलोचक ही अगर किसी खास विचारधारा के आग्रह से ग्रसित होकर साहित्यिक समालोचना करने लगे तो उसके द्वारा किया गया आलोचना कर्म उसके विचारों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। साहित्य जगत में यह कोई नई बात नहीं कि मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित एक ख्यातिलब्ध आलोचक के लिए मार्क्सवादी लेखन को लेकर आलोचना का नजरिया अलग है जबकि अन्य कृतियों को लेकर आलोचना का नजरिया अलग। जब किसी आलोचक के अंदर किसी वाद का पूर्वाग्रह घर कर जाता है तो वो आलोचना के अनुशासन को कायम नहीं रख पाता। हलाकि इस मामले में कई आलोचक हुए हैं जो अपनी विचारधारा को अपने अलोचना-कर्म में आड़े नहीं आने दिये। उदाहरण के तौर पर अगर आप लीजिए तो राम बिलास शर्मा सरीखे लेखक नजीर के तौर पर हैं जो कि आजीवन मार्क्सवादी होते हुए भी आलोचना-कर्म के मामले में मार्क्सवाद की सीमाओं को तोड़कर आलोचना का अनुशासन कायम करने की मिसाल प्रस्तुत करते हैं।

सवाल : गद्य साहित्य की कहानी विधा में भी आपका व्यापक हस्तक्षेप रहा है और आपने मनदर्पण,विकल्प,गिद्धलोक सहित सैकड़ों चर्चित कहानियां एवं कई कहानी संग्रह लिखा हैं। आपके नजरिये से कहानी क्या है ?

प्रो. शुक्ल : जी, अगर मै अपने लिए कहानी को परिभाषित करूँ तो कहानी मेरी छणिक आक्रोश के अभिव्यक्ति का माध्यम रही हैं। साहित्य की इस विधा का सर्वाधिक प्रयोग मैंने समाज कि विषमताओं एवं शिक्षा आदि के बिगड़ते स्वरुप पर अपने मन में समय-समय पर उत्पन्न हुए आक्रोश भाव को अभिव्यक्त करने के लिए किया है। चाहें शिक्षकों द्वारा विद्द्यार्थियों के शोषण पर आधारित कहानी गिद्धलोक हो अथवा स्त्री-पुरुष संबंधो पर आधारित कहानी मन-दर्पण हो, ये सभी किसी विशेष घटनाक्रम को लेकर मेरे मन में उठे असंतोष एवं अकुलाहट की अभिव्यक्ति हैं।

सवाल : सृजन-कर्म में भाषा की शुचिता पर आपकी राय ?
प्रो. शुक्ल : कभी भी किसी अन्य भाषा के आने से मूल भाषा की शुचिता पर असर नहीं पड़ता है बल्कि वो भाषा और संपन्न ही होती है। बशर्ते यहाँ भी भाषा में शब्दों के प्रयोग में अनुशासन के दायरों को ना तोडा जाय तो।

सवाल : कोई अन्य कृति जो अभी लिखी जानी शेष हो आपके द्वारा ?
प्रो. शुक्ल : बिलकुल, भोजपुरी के साहित्यकार मोती बी.ए पर आधारित छ: खण्डों की पुस्तक पर अभी लेखन कार्य चल रहा है, संभवत: जल्द आये।

सवाल : अंतिम सवाल, आपके अनुसार साहित्य में रचना-कर्म का वास्तविक उद्देश्य क्या होना चाहिए ?
प्रो. शुक्ल : साहित्य एवं रचना-कर्म का वास्तविक उद्देश्य समाज को आइना दिखाना होता है। किसी भी साहित्यिक सृजन में अगर सामाजिक सरोकारों का सम्पूर्ण समावेश ना हो तो उस सृजन को कागज़ पर स्याही पोतने से ज्यादा कुछ भी नहीं कहा जाएगा।

इस साक्षात्कार का कुछ अंश दो वर्ष पूर्व राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित हो चुका है।

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