उड़ी आतंकी हमले के बाद फिर सामने आया वामपंथियों का राष्ट्रविरोधी चेहरा!

उड़ी में एक हमला होता है, हमारे दर्जन भर से अधिक जवान शहीद होते हैं। वहीं, यह हमला हमारे देश में ही रह रहे  वामपंथी चिंतकों का नंगापन एक बार फिर हमारे सामने साफ कर देता है। यह लेखक जेएनयू का उत्पाद है, इसलिए अच्छी तरह जानता है कि वामपंथ का दूसरा नाम ही दोमुहापन है। वामपंथियों के गढ़ जेएनयू के छात्र-संघ में वामपंथी वर्चस्व आज से नहीं, दशकों से कायम है। कहने की बात नहीं कि वहां कश्मीर का मसला हो या नक्सलियों का, हमेशा ही वहां के छात्र-संघ में जब भी राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रस्ताव आए, इन वामपंथियों ने उस पर समर्थन करना तो दूर, उसका कठोर विरोध करना ही उचित समझा। मुझे अच्छी तरह याद है कि जेएनयू के छात्रसंघ में पारित प्रस्ताव कई बार पाकिस्तान और दूसरे दुश्मन देशों की संसद में पारित प्रस्तावों की तर्ज पर ही होते थे। यही नहीं, नक्सलियों के हमले में हताहत जवानों को श्रद्धांजलि और याद करने तक से ये वामपंथी  इंकार करते रहे हैं। ताज़ा उड़ी हमले के बाद भी हैदराबाद यूनिवर्सिटी में इन वामपंथियों के छात्र संगठन एसएपआइ ने कश्मीर में शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि देने से इंकार कर दिया। जब हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के यूजीबीएम में महासचिव को उड़ी के शहीदों को श्रद्धांजलि देने और दो मिनट के मौन के लिए कहा गया, तो तथाकथित उदारवादी वामपंथी बौद्धिकों  ने वैसा नहीं किया।

विडंबनाओं की लड़ी देखिए। बिहार में ही 70 सैनिकों को जेल की हवा खिलायी जा रही है। इसलिए नहीं कि वे चोर या हत्यारे हैं, इसलिए कि उनके पास शराब थी- अपने कोटे की। नीतीश सरकार उन जवानों को 10 साल कैद दिलवाने पर आमादा है। वहीं, उड़ी हमले में शहीद बिहारी जवान की विधवा को 4 लाख रुपए मुआवजा देती है- वह कीमत जो गोपालगंज में अवैध शराब पीकर मरे लोगों की लगायी गयी थी। यह बात दीगर है कि शहीद की विधवा ने वह छीछड़े लेने से इंकार कर नीतीश सरकार के मुंह पर झन्नाटेदार तमाचा जड़ दिया है।

नक्सलियों के हमले में हताहत जवानों को श्रद्धांजलि और याद करने तक से ये वामपंथी  इंकार करते रहे हैं। ताज़ा उड़ी हमले के बाद भी हैदराबाद यूनिवर्सिटी में इन वामपंथियों के छात्र संगठन एसएपआइ ने कश्मीर में शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि देने से इंकार कर दिया। जब हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के यूजीबीएम में महासचिव को उड़ी के शहीदों को श्रद्धांजलि देने और दो मिनट के मौन के लिए कहा गया, तो तथाकथित उदारवादी वामपंथी बौद्धिकों  ने वैसा नहीं किया।

कुछ ही दिन पहले, यहां कॉमरेड अपूर्वानंद भी आए थे, कॉमरेड चंद्रशेखर की हत्या को बेचने। महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, वर्धा में अपूर्वानंद के खिलाए गुल अभी तक खिल ही रहे हैं।  यह वही पाखंडी कॉमरेड हैं, जो एक बलात्कारी खुर्शीद को बचाने के लिए कई सारे पन्ने काले करते हैं। इस बार वह अपने साथ कॉमरेड चंद्रशेखर के नाम पर होनेवाले व्याख्यान में एक अतिथि को भी लाए थे। यह अतिथि जेएनयू छात्रसंघ का पूर्व अध्यक्ष वही युवक  है, जिस पर लड़की छेड़ने का आरोप लगा है, जो इस संदर्भ में सज़ा भी भुगत चुका है और जो जेएनयू स्टूडेंट यूनियन का अध्यक्ष रहते हुए भारत के टुकड़े करनेवालों के साथ नारेबाज़ी भी कर चुका है। वही कॉमरेड इनका पोस्टर-ब्वॉय है। बहरहाल, कॉमरेड चंद्रशेखर के नाम पर व्याख्यान करानेवाले अपूर्वानंद की ख्याति ऐसे ही अतिथियों को बटोरने में है। हालांकि, शहाबुद्दीन के नाम पर दोनों ही के मुंह से एक शब्द तक नहीं निकला, लेकिन लड़की छेड़नेवाले युवा कॉमरेडने हमारे सैनिकों का अपमान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

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शहीदों को श्रद्धांजलि देने में भी हिचकते वामपंथी

यह भी बड़े मज़े की बात है कि ये वामपंथी जिस लड़की छेडनेवाले युवक को अपना पोस्टर-ब्वॉय बनाए हुए हैं, वह कुछ महीने पहले घोषित अपराधी लालू यादव के चरण-चुंबन कर रहा था। उसे अपने बीमार पिता से मिलने की फुरसत भले नहीं थी, पर वह सभी नेताओं के साथ मिलने और फोटो खिंचवाने में जरूर व्यस्त था। सीवान के जिस कॉमरेड चंद्रशेखर की पहचान से जेएनयू बिहार से जुड़ा था, इस पोस्टर-ब्वॉय ने पहली चोट उसी पर की। जो शहाबुद्दीन हाल ही में जेल से छूटा है, उसको भला कोई जेएनयू का छात्र कैसे भूल सकता है, जिस पर सीवान में सरेशाम कॉमरेड चंद्रशेखर को भरी सभा में गोलियों से भून देने का आरोप लगा हो और जिस जेएनयू ने लालू यादव के दौर में अपने सबसे बड़े नेता चंद्रशेखर को खोया हो। पर इस वामपंथी पोस्टर बॉय ने उस शहाबुद्दीन का नाम तक नहीं लिया। 

पर, बात उनकी होती है, जिनके पास नैतिकता के नाम पर कुछ बचा भी हो। वामपंथी चिंतकों का तो झूठ, फरेब और दोमुहेपन से पुराना नाता रहा है। यह युवक हों या अपूर्वानंद हों, ये सब बस अपनी विचारधारा को ही आगे बढ़ा रहे हैं। वरना, पोस्टर-ब्वॉय के साथ शराब-कारोबारी विनोद जायसवाल का दिखना हो, या उसकी पिछली पटना यात्रा के दौरान हुए तमाम खर्चे, वह इनके चरित्र को दिखाता है। ख़बर तो खैर यह भी है कि नीतीश कुमार ने भी पोस्टर-ब्वॉय के अकाउंट में पैसे भेजे हैं।

आप ज़रा समीकरणों को देखिए। अपूर्वानंद और अशोक वाजपेयी के साथ मिलकर तथाकथित साहित्यकारों, कलाकारों का एक समूह है, जिसका एकमात्र काम इस सरकार को अस्थिर करना है। ‘जला दो, मिटा दो’ का नारा बुलंद करनेवाले नक्सलियों के साथ ही इस देश के तथाकथित बौद्धिक वर्ग का एक तबका भारत-विरोध और उसे तोड़ने के काम पर ही खुद को पोषित करता है। वेटिकन से लेकर जेहादी आकाओं तक, इन देशद्रोहियों के तार न जाने कहां-कहां हैं? तो, पोस्टर-ब्वॉय के साथ चिंतक, चिंतकों में आलोक धन्वा भी, वे चिंतक नीतीश की बांह थामे और नीतीश हैं लालू यादव की गोद में, जिनके दाहिने हाथ शहाबुद्दीन हैं। अपूर्वानंद और अशोक वाजपेयी के साथ मिलकर तथाकथित साहित्यकारों, कलाकारों का यह एक समूह है, जिसका एकमात्र काम इस सरकार को अस्थिर करना है। 

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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