कैराना प्रकरण में फिर बेनकाब हुए सेकुलर, खुली नकली सेकुलरिज्म की पोल!

गत जून महीने में उत्तर प्रदेश के कैराना कस्बे में तीन सौ से ऊपर हिन्दू परिवारों के पलायन की बात सामने आई थी। स्थानीय भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने दावा किया था कि कैराना में बहुसंख्यक हुए समुदाय विशेष के लोगों के खौफ के कारण हिन्दू परिवार वहाँ से पलायन को मजबूर हुए हैं। भाजपा सांसद के इस दावे का तब देश की तथाकथित सेकुलर बिरादरी जिसमें नेता से लेकर बुद्धिजीवी तक शामिल थे, ने खूब मखौल उड़ाया था। कहा गया कि कैराना में रोजगार आदि की समस्या के कारण लोग शहरों की तरफ गए हैं और किसीके खौफ से कोई पलायन नहीं हुआ है। खैर, तब यह मामला दब गया था और सेकुलर खेमे को लगा कि उनकी अफवाहबाजी चल गई। लेकिन, अभी विगत दिनों इस सम्बन्ध में एक वकील की शिकायत पर जांच कर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जब अपनी रिपोर्ट पेश की तो जो असलियत सामने आई, वो देश को झकझोर कर रख देने के लिए काफी है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कैराना से पलायन हुआ है और इसके पीछे वजह भी कहीं न कहीं समुदाय विशेष के आतंक को ही माना गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मुज़फ्फरनगर दंगे के बाद लगभग पच्चीस-तीस हजार मुस्लिमों का कैराना में पुनर्वास कराया गया था, जिसके कारण वहाँ की जनसांख्यिकीय स्थिति में बड़ा परिवर्तन आया। इसके आगे की स्थिति समझना मुश्किल नहीं है कि इस पुनर्वास के बाद वहाँ मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यक हो गया। दुर्दिन से उबार के लिए कैराना में बसाए गए इस समुदाय की स्थिति वहाँ सामजिक रूप से मजबूत हुई नहीं कि इसने अपनी दादागिरी शुरू कर दी, जिसके फलस्वरूप कैराना से हिन्दुओं के पलायन की कहानी शुरू हो गई। मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के ही मुताबिक़ लगभग दो दर्जन गवाहों ने यह माना है कि मुस्लिम युवा हिन्दुओं की लड़कियों को छेड़ते और मारपीट करते थे, जिसके कारण उन्हें पलायन करना पड़ा। सवाल यह है कि जब समुदाय विशेष के लोगों द्वारा हिन्दुओं पर जुल्म हो रहे थे, तो कैराना का पुलिस-प्रशासन क्या कर रहा था ?

ये कोई पहली बार नहीं है कि सेकुलर बिरादरी का ये दोहरा चरित्र सामने आया हो, अबसे पहले भी अनेक मौकों पर इनके नकली सेकुलरिज्म कलई खुल चुकी है और बुरी तरह से ये लोग बेनकाब हो चुके हैं। याद करें तो इस साल की शुरुआत में विहिप नेता कमलेश तिवारी ने मोहम्मद साहब पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी, जिसके बाद यूपी की सपा सरकार ने आनन्-फानन में उन्हें रासुका लगाकर गिरफ्तार कर लिया। लेकिन, इस कार्रवाई के बाद भी समुदाय विशेष के लोगों को संतुष्टि नहीं मिली और कमलेश तिवारी का सिर कलम करने का फतवा जारी होने लगा तथा देखते ही देखते पश्चिम बंगाल के मालदा की सड़कों पर बीस लाख मुसलमान हिंसक प्रदर्शन करने उतर पड़े थे। इस असहिष्णुता पर सेकुलर खेमा चूं तक नहीं किया। स्पष्ट है कि इनका सेकुलरिज्म सिर्फ एक समुदाय विशेष के लोगों के तुष्टिकरण और हिन्दू विरोध पर आकर ख़त्म हो जाता है।

इस सवाल का जवाब बड़ा ही सरल है कि यूपी में सत्तारूढ़ सरकार भी फर्जी सेकुलरिज्म की चासनी में लबालब डूबी समाजवादी पार्टी की है, जिसके मुखिया के सेकुलरिज्म का आलम यह है कि उन्हें बाबरी प्रकरण के दौरान कारसेवकों की जान लेने पर अफ़सोस नहीं, गर्व महसूस होता है। अब ऐसे सेकुलरिज्म वाली प्रदेश सरकार का पुलिस-प्रशासन कैराना में हिन्दू समुदाय की पीड़ा को क्योंकर सुनता और समझता ? उक्त रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर उल्लिखित है कि समुदाय विशेष के दो युवकों ने एक लड़की का अपहरण किया और जब उसके पति ने एफआईआर दर्ज करानी चाही तो पुलिस ने मना कर दिया। अगले दिन जब उस लड़की की लाश मिली तब जाके एफआईआर दर्ज हुई। हिन्दू समुदाय के लोगों को ऐसी सुरक्षा दी है कैराना की पुलिस, ऐसे में उनके पास पलायन के सिवा चारा ही क्या था ? यूपी पुलिस से सम्बंधित ऐसा ही मामला अभी कुछ दिन पहले तब सामने आया था, जब दादरी के मृत इखलाक के यहाँ गोमांस होने की पुष्टि हुई थी, तब एक व्यक्ति ने इखलाक तथा उसके परिवारजनों के खिलाफ गोहत्या की शिकायत दर्ज करवानी चाही, लेकिन पुलिस ने उसकी एफआईआर लिखने से इनकार कर दिया। फिर वो उच्च न्यायालय में गया और वहाँ से आदेश लेकर आया, तब जाके एफआईआर लिखी गई। कहने का तात्पर्य यह है कि समाजवादी पार्टी ने अपने समुदाय विशेष का तुष्टिकरण करने वाले सेकुलरिज्म का पूरा पाठ अपनी पुलिस को भी पढ़ा दिया है और कहीं न कहीं कैराना भी इसीका एक क्रूर परिणाम है। स्थिति ये है कि सैकड़ों हिन्दू परिवार वहाँ से मारे डर के अपना घर, जमीन छोड़कर पलायन करने को मजबूर हो गए और उनके घरों पर ताले लटके हैं।

इस मामले को जब भाजपा सांसद ने उठाया था तो तथाकथित सेकुलरिज्म में डूबी सपा सरकार ने ऐसा कुछ होने से इनकार किया था और कहा था कि ये सब भाजपा सांसद ध्रुवीकरण के लिए कर रहे हैं। लेकिन, अब जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के बाद सिद्ध हो गया कि पलायन हुआ है तो भी ये सरकार इसको सिर्फ कानून व्यवस्था की समस्या बता रही हैं और समुदाय विशेष के आतंक की बात को स्वीकारने से बच रही है। इसके अलावा कांग्रेस और वामपंथी आदि सभी तथाकथित सेकुलर पार्टियां भी इसपर जुबानी लकवे का शिकार नज़र आ रही हैं। धर्मनिरपेक्षता की बड़ी-बड़ी दुहाई देने वाले और बिना बात कभी असहिष्णुता का कोरा विलाप करने वाले सेकुलर बुद्धिजीवी भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के बाद कैराना पर बेशर्मी के साथ खामोशी की चादर ओढ़े गायब हैं।

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दरअसल ये कोई पहली बार नहीं है कि सेकुलर बिरादरी का ये दोहरा चरित्र सामने आया हो, अबसे पहले भी अनेक मौकों पर इनके नकली सेकुलरिज्म कलई खुल चुकी है और बुरी तरह से ये लोग बेनकाब हो चुके हैं। याद करें तो इस साल की शुरुआत में विहिप नेता कमलेश तिवारी ने मोहम्मद साहब पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी, जिसके बाद यूपी की सपा सरकार ने आनन्-फानन में उन्हें रासुका लगाकर गिरफ्तार कर लिया और वे तबके गए आज तक जेल में ही हैं। लेकिन, इस कार्रवाई के बाद भी समुदाय विशेष के लोगों को संतुष्टि नहीं मिली और कमलेश तिवारी का सिर कलम करने का फतवा जारी होने लगा तथा देखते ही देखते पश्चिम बंगाल के मालदा की सड़कों पर बीस लाख मुसलमान हिंसक प्रदर्शन करने उतर पड़े थे। इस असहिष्णुता पर सेकुलर खेमा पूरी तरह से मौन साधे रहा और चूं तक नहीं किया, जबकि इस मामले से ठीक पहले ही इन्हें सामान्य झड़प में हुई इखलाक की हत्या के कारण देश भर में असहिष्णुता नज़र आई थी। स्पष्ट है कि इनका सेकुलरिज्म सिर्फ एक समुदाय विशेष के लोगों के तुष्टिकरण और हिन्दू विरोध पर आकर ख़त्म हो जाता है। कैराना प्रकरण भी इसीका एक उदाहरण है और इसमें भी इनके तथाकथित सेकुलरिज्म असल चेहरा एकबार फिर बेनकाब हो रहा है।

बहरहाल, ये सेकुलर क्या करते हैं, ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया जाय। अब जब यूपी चुनाव सिर पर हैं तो सपा सरकार इस मामले की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों को सज़ा देने से रही। ऐसे में उचित होगा कि इस रिपोर्ट को आधार बनाकर इस मामले की सीबीआई अथवा किसी विशेष जांच दल के द्वारा पूरी तरह से निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। फिर उस जांच में जो तथ्य सामने आएं, उनके आधार पर कार्रवाई हो। अगर कानूनी ढंग से ऐसे मामलों को निष्पक्षता के साथ हल नहीं किया गया तो फिर इस देश में मोहन भागवत और प्रवीण तोगड़िया आदि हिन्दू हितचिन्तक लोगों को हिन्दू जनसँख्या वृद्धि की बात कहने के लिए दोष देना बंद करना होगा। क्योंकि, इस स्थिति के मद्देनज़र कि एक छोटे से इलाके कैराना में हिन्दू जनसँख्या कुछ कम क्या हुई उसे वहाँ से डरकर पलायन करना पड़ा, उक्त नेताओं की जनसँख्या वृद्धि की बातें अनुचित नहीं प्रतीत होतीं। अतः सही होगा कि इस मामले का यथाशीघ्र सही ढंग से निपटारा कर पीड़ित हिन्दू परिवारों को न्याय दिलाया जाय।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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