भारत के आगे रणनीतिक और कूटनीतिक दोनों ही मोर्चों पर धराशायी हुआ पाक

श्रीनगर के उड़ी में भारतीय सेना के कैम्प पर पाक-प्रेरित आतंकियों द्वारा किए गए हमले और उसमें दो दर्जन जवानों के शहीद होने के बाद से ही देश में भीषण आक्रोश का माहौल व्याप्त था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस आतंकी हमले के बाद देश को आश्वस्त किया था कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन, इस देश में पिछली सरकारों के दौरान ऐसे बयानों के क्रियान्वयन के रूप में ‘कड़ी निंदा’ से लेकर पाकिस्तान से बातचीत बंद कर देने तक की जो परम्पराएं देश ने देखी थी, उस कारण प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान को भी उसी ढंग का समझा गया। लेकिन, ये वैसा नहीं था, यह पूरी तरह से सोच-समझकर और गंभीरता के साथ कही गई बात थी। यह चीज तब देश के सामने आई जब गत २९ सितम्बर को भारतीय सेना के डीजीएमओ ने प्रेसवार्ता में यह जानकारी दी कि भारतीय सेना ने पीओके में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक किया है, जिसमें कि तमाम आतंकी शिविर ध्वस्त हुए तथा पाक सेना के दो जवान भी मारे गए। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस कार्रवाई में ४० के आसपास आतंकी भी ढेर हुए हैं और सबसे अच्छी बात ये कि हमारे जवान यह कार्रवाई करके सकुशल वापस भी लौट आए। अब इस सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान सरकार की हालत एकदम असमंजस वाली हो गई है, उसके लिए भारत के इस अटैक को न तो स्वीकारते बन रहा है और न नकारते। क्योंकि, इसको स्वीकारने का अर्थ है कि अपने ही देश में उसकी भारी किरकिरी होगी और इसको नकारने का अर्थ है कि इसको चुपचाप सहन कर जाओ। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय जवानों की यह सर्जिकल स्ट्राइक पाकिस्तान के लिए एकदम गले की हड्डी की तरह हो गई है, जिसे न वो उगल पा रहा और न ही निगल पा रहा।

भारत सरकार के विदेश राज्य मंत्री और पूर्व जनरल वीके सिंह ने कहा है कि अगर राजनीतिक रूप से इच्छाशक्ति हो तो सेना तो हमेशा ही ऐसी कार्रवाई के लिए तैयार रहती है। गौर करें तो यही इच्छाशक्ति पिछले दस सालों की संप्रग सरकार के दौरान नहीं दिखी थी और २६/११ जैसे देश पर सबसे बड़े आतंकी हमले समेत अनेक आतंकी हमलों के बाद भी संप्रग सरकार ने कुछ नहीं किया, यही कारण है कि पाकिस्तान सिर पर चढ़ बैठा था। मगर, अब वह मजबूत राजनीतिक इच्छशक्ति दिखी है और पाकिस्तान को न केवल कूटनीतिक बल्कि रणनीतिक स्तर पर व्यावहारिकता पूर्ण जवाब दिया जाने लगा है। वो एकदम धराशायी अवस्था में है। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि देश ने  उड़ी हमले में शहीद अपने १८ जवानों का बदला ले लिया है और प्रधानमंत्री मोदी ने दोषियों को न बख्शने का अपना वादा भी शब्दशः निभाया है।

समस्या इतनी ही हो तो कहें भी, मगर पाकिस्तान के लिए दिक्कत यह भी है कि भारत की इस सर्जिकल स्ट्राइक पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की तरफ से भारत के खिलाफ या पाकिस्तान के समर्थन में कोई प्रतिक्रया नहीं आई है। अमेरिका से लेकर संयुक्त राष्ट्र और चीन ने तक  सिर्फ इतना ही कहा है कि दोनों पक्ष मामले को बातचीत से हल करें। बांग्लादेश ने तो कहा है कि वह भारत की इस सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन करता है। इससे पहले सार्क सम्मेलन के मसले पर हम यह देख चुके हैं कि कैसे इस सम्मेलन में जाने से भारत के इनकार के बाद नेपाल, बांग्लादेश, अफगानिस्तान आदि देश भी इससे किनारे हो गए थे और पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गया था। ठीक वैसे ही इस मामले में भी पाकिस्तान न केवल एशिया बल्कि समूचे विश्व में अलग-थलग पड़ा नज़र आ रहा है। यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि विपक्ष भी सरकार के इस आक्रामक रुख का समर्थन कर रहा है। 

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विचार करें तो भारत की इस सर्जिकल स्ट्राइक पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई कठोर प्रतिक्रिया न आना यूँ ही नहीं है, इसके पीछे निश्चित तौर पर भारत सरकार की पुख्ता रणनीति, वैश्विक सामंजस्य और सबको विश्वास में लेकर बढ़ने की कूटनीतिक सफलता का ही प्रभाव मौजूद है। उड़ी हमले के बाद प्रधानमंत्री ने जो कई उच्चस्तरीय बैठकें की थीं, वे यूँ ही नहीं थीं, उनमें जरूर ही इन सब बिन्दुओं पर विचार-विमर्श हुआ होगा। विश्व बिरादरी के सभी देशों को बातचीत के जरिये विश्वास में लिया गया होगा। पाकिस्तान आतंक का गढ़ है, ये बात तो गत दो वर्षों में भारत वैश्विक स्तर पर काफी हद तक स्थापित कर चुका है। अमेरिका आदि देश कई दफे इसके लिए पाकिस्तान को चेतावनी भी दे चुके हैं। ऐसे में पाक के कब्जे वाले कश्मीर में स्थित आतंकी शिविरों पर अटैक के लिए विश्व बिरादरी को राजी करने में भारत सरकार को बहुत कठिनता नहीं आई होगी। इन्हीं सब क्रियाकलापों में तो यह समय लगा होगा कि उड़ी हमले के दस दिन बाद यह सर्जिकल स्ट्राइक हुई। इस प्रकार स्पष्ट है कि यह सर्जिकल स्ट्राइक भी उसी तरह से पूरी योजना और ठोस रणनीति के साथ अंजाम दी गई है, जैसे कि गत वर्ष म्यामार में घुसकर सेना ने आतंकियों का सफाया किया था। निर्विवाद रूप से इस कार्रवाई का पहला श्रेय हमारे बहादुर जवानों को ही जाता है और देश उनपर हमेशा से गर्वित रहा है, लेकिन साथ ही इस हमले के लिए सभी परिस्थितियों को अनुकूल बनाने और दृढ इच्छाशक्ति का परिचय देने हेतु मोदी सरकार भी अत्यंत प्रशंसा की पात्र है।

भारत सरकार के विदेश राज्य मंत्री और पूर्व जनरल वीके सिंह ने कहा है कि अगर राजनीतिक रूप से इच्छाशक्ति हो तो सेना तो हमेशा ही ऐसी कार्रवाई के लिए तैयार रहती है। गौर करें तो यही इच्छाशक्ति पिछले दस सालों की संप्रग सरकार के दौरान नहीं दिखी थी और २६/११ जैसे देश पर सबसे बड़े आतंकी हमले समेत अनेक आतंकी हमलों के बाद भी संप्रग सरकार ने कुछ नहीं किया, यही कारण है कि पाकिस्तान सिर पर चढ़ बैठा था। मगर, अब वह मजबूत राजनीतिक इच्छशक्ति दिखी है और पाकिस्तान को न केवल कूटनीतिक बल्कि रणनीतिक स्तर पर व्यावहारिकता पूर्ण जवाब दिया जाने लगा है। वो एकदम धराशायी अवस्था में है। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि देश ने  उड़ी हमले में शहीद अपने १८ जवानों का बदला ले लिया है और प्रधानमंत्री मोदी ने दोषियों को न बख्शने का अपना वादा भी शब्दशः निभाया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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