यह सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, मोदी का ‘मास्टर स्ट्रोक’ है!

पिछले एक सप्ताह से तकरीबन हरेक जगह भारत के पाकिस्तान पर किए सर्जिकल स्ट्राइक की ही चर्चा है। और, यह न समझिए कि अपने एसी चेंबर में बैठकर केवल एंटरटेनमेंट चैनल के स्वयंभू विद्वान ही इस पर मशविरा कर रहे हैं। गुवाहाटी से गुड़गांव और दार्जिलिंग से दरभंगा तक, इसके चर्चे गरम हैं। बाल काटनेवाले नाई से लेकर कपड़े प्रेस करनेवाले भाई तक, हरेक आदमी की इस मुद्दे पर राय है और फैसला है।

सबसे बड़ी बात तो यह हुई है कि इस सर्जिकल स्ट्राइक (मैं उन वंचकों की बात नहीं कह रहा, जो अभी तक सर्जिकल स्ट्राइक को नकारने में पाकिस्तान का साथ दे रहे हैं) ने देशी-विदेशी सभी घातकों के चेहरों पर से नकाब हटा दिया है। इस पर बात अगले अनुछ्चेद में, फिलहाल तो मज़े की बात यह दिखती है कि जब तक यह हुआ नहीं था, तो सारे विपक्षी उन्हें अब तक का सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री और वर्तमान सरकार को सबसे नकारा सरकार बता रहे थे। मोदी की विदेश यात्राओं को निशाना बनाया जा रहा था, उनकी विदेश संबंधी नीतियों का मज़ाक बन रहा था और पाकिस्तान के संदर्भ में उनके बढ़ाए गए हाथ के बदले उड़ी हमला होना बताया जा रहा था।

सर्जिकल स्ट्राइक के साथ तीन काम हुए – देशवासियों की भावना का सम्मान, अपने खोए काडर को फिर से साथ लेना और दुनिया भर में पाकिस्तान को अलग-थलग करना। ध्यान रखिए, कि सर्जिकल स्ट्राइक पर जो प्रतिक्रिया दुनिया भर से आयी, उसमें दुनिया के किसी भी मुल्क ने कोई विपरीत प्रतिक्रिया नहीं दी थी। चीन ने भी मसूद अज़हर पर वीटो किया, तो दो दिनों बाद, पर बोला वह भी कुछ नहीं। भारत पर किसी तरह का कोई आरोप या सलाह नहीं थोपी गयी। हां, अमेरिका ने अपनी खैरात के बदले में पाकिस्तान को कड़वी सलाह जरूर दे डाली कि वह आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाए।

कोझीकोड के मोदी के भाषण को लोग रीढ़विहीन बता रहे थे। सबका साथ, सबका विकास के नारे को मज़ाक जैसा बनाकर आलोचक यह भी कह रहे थे कि मोदी को अब भारत के साथ पाकिस्तान का भी विकास करना चाहिए। निष्कर्ष के तौर पर कहें तो भारत के प्रधानमंत्री अपने राजनीतिक दौर में भरोसे के बड़े संकट से दो-चार थे। उनकी आज तक की राजनीतिक यात्रा दांव पर थी। कहें, तो एक बाज़ से यह सिद्ध करने को कहा जा रहा था कि वह बाज़ ही है, कबूतर नहीं।

इसके साथ ही यह भी याद करें कि पाकिस्तान बदली हुई विश्व परिस्थितियों में कोई भड़भूजा नहीं कि उसे जब चाहा, चबा लिया। वह अगर आतंक और शैतानों का अड्डा बना चुका है, तो ज़ाहिर तौर पर उसे दुनिया की बड़ी ताकतों की शह हासिल है। चीन का दो दिन पहले किया गया वीटो तो याद ही होगा। इसके साथ ही उस अस्थिर देश के पास न्यूक्लियर बटन भी है, जिस पर उसके इस्लामिक आका बैठे हैं।

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इन तमाम परिस्थितियों में अचानक से घोषणा होती है- हमने सर्जिकल स्ट्राइक किया और बाकायदा पाकिस्तानियों को इसकी सूचना भी दी। इससे एक साथ तीन काम हुए – देशवासियों की भावना का सम्मान, अपने खोए काडर को फिर से साथ लेना और दुनिया भर में पाकिस्तान को अलग-थलग करना। ध्यान रखिए, कि सर्जिकल स्ट्राइक पर जो प्रतिक्रिया दुनिया भर से आयी, उसमें दुनिया के किसी भी मुल्क ने कोई विपरीत प्रतिक्रिया नहीं दी थी। चीन ने भी मसूद अज़हर पर वीटो किया, तो दो दिनों बाद, पर बोला वह भी कुछ नहीं। भारत पर किसी तरह का कोई आरोप या सलाह नहीं थोपी गयी। हां, अमेरिका ने अपनी खैरात के बदले में पाकिस्तान को कड़वी सलाह जरूर दे डाली कि वह आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाए।

पिछले दो साल के नरेंद्र मोदी के वैश्विक दौरे को इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है। उन पर तंज़ कसने वाले यह ध्यान दें कि पाकिस्तान आज वैश्विक संदर्भ में अकेला है। चीन भी अपने स्वार्थ के लिए उसके साथ दिख रहा है, पर भारत के बाज़ार को खोने का ख़तरा वह भी नहीं उठाएगा। क्या इसके लिए पिछले दो साल से दुनिया भर के देशों के साथ सुधारे गए राजनयिक संबंध जिम्मेदार नहीं? एक गौरतलब बात यह भी है कि भारत के साथ ही ईरान ने भी अपने मोर्टार पाकिस्तान पर दे मारे।

पाकिस्तान बलूचिस्तान के नासूर से पीड़ित है, अफगानिस्तान ने उस पर नज़र टेढ़ी कर रखी है, कुल मिलाकर वह फंसा हुआ है और तिस पर यह स्ट्राइक। यह स्ट्राइक है या मास्टर-स्ट्रोक। इसके साथ ही, घरेलू स्तर पर नरेंद्र मोदी को राजनीतिक बढ़त तो हासिल हुई ही है। आखिर, अब अगर वह कहें कि जो कहा सो किया, तो उनका वह इंडिया टीवी पर दिया गया पुराना इंटरव्यू शेयर करनेवाले भी मानेंगे ही, जिसे काफी शेयर किया जा रहा था औऱ जिसमें मोदी पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने को कह रहे हैं।

इसके साथ ही मोदी के इस मास्टर-स्ट्रोक से वे पाकिस्तानी कलाकार भी बेनकाब हो गए, जिन्होंने उड़ी हमले का विरोध तो नहीं ही किया, वापस पाकिस्तान जाकर भारत के खिलाफ राग भी आलाप दिया। मोदी के बिना कुछ चाहे ही उनकी वापसी भी हो गयी। साथ ही, भारत के कई लोगों के चेहरे से भी नकाब उतरा। महेश भट्ट जहां अमन की आशा का राग अलापने लगे, तो सलमान खान और ओमपुरी जैसे तथाकथित कलाकारों ने आतंक और कला को अलग करने का घिसा-पिटा रिकॉर्ड बजा दिया। अब नरेंद्र मोदी के कुछ कहने की ज़रूरत भी नहीं है। सोशल मीडिया के इस युग में जनता खुद ही इनका फैसला करेगी।

बौद्धिक रूप से दोमुंहे और पाखण्डी वामपंथियों ने हमेशा की ही तरह निराश नहीं किया है। आंख मूंदकर उनकी बात सुनने पर यही आभास होता है कि पाकिस्तानी जनरल बोल रहा है। कोई वामपंथी चिंतक स्ट्राइक को झूठा ठहरा रहा था, तो कोई सबूत मांग रहा था। कोई वामपंथी  वीरांगना कह रही थी कि ऐसे स्ट्राइक तो मनमोहन सिंह के समय भी होते थे, तो कोई मार्क्सवादी वीर इसकी टाइमिंग पर सवाल उठा रहा था। बार-बार बेनकाब हुए ये वामपंथी इस वक्त भी देश को दोराहे पर लाकर खड़ा करना चाहते हैं। जो वक्त पूरे देश के सामने अपनी सेना के पीछे चट्टान बनकर खडे रहने के लिए प्रेरित करने का है, उसे ये अपनी बौद्धिक लफ्फाजी में जाया कर रहे हैं। यह इनसे अपेक्षित भी है, इसलिए इस पर पन्ने रंगने का फायदा नहीं। बस, इंतज़ार इस बात का है कि पाकिस्तान को घेरने की जो प्रक्रिया शुरू है, वह तेज़ हो और दुनिया के इस नासूर को सच्चा सबक मिले।

(लेखक पेशे से पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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