मजदूरों के कष्टों को निकट से समझते थे दत्तोपंत ठेंगड़ी

भारतीय मजदूर संघ और स्वदेशी आंदोलन के अग्रदूत पूज्य दत्तोपंत ठेंगड़ी का नाम जेहन में आते ही एक महान सेनानी, राष्ट्रवादी संगठनों के जनक, विचारक तथा आचरण एवं संस्कारयुक्त जीवन जीने वाले एक सन्यासी की छवि उभरकर सामने आती है। उनका व्यक्तित्व अत्यंत ही सहज था, उन्होने गांव-गरीब और मजदूर वर्ग के अंतर्मन में सम्मान के साथ जीने की लालसा उत्पन्न की।

भारतीय मजदूर संघ की स्थापना करके वे देश और दुनिया के लाखों मजदूरों को जीवन जीने का एक नया उद्देश्य प्रदान किया। भारतीय मजदूर संघ जब अपने अस्तित्व में आ रहा था, उस समय का कालखंड काफी विषम परिस्थितियों वाला था। एक ओर देश को नयी-नयी आजादी मिली थी। देश अपनी भावी गतिविधियों का खाका तैयार कर रहा था। जन-मानस नई आशाओं और उमंगों से राष्ट्र नव-निर्माण के स्वप्न को साकार होते देखने के लिए आतुर हो रहा था। लेकिन भारतीय दासता के एक लंबे कालखंड की वजह से राष्ट्रीय मूल्यों, भारतीय सभ्यता, संस्कृति और विचारधारा को जिस अधर में लटका रखा था, उसी अधर से निकलना भारतीय जन मानस का उद्देश्य बन गया था। लोगों को सही दिशा नहीं मिल पा रही थी, कुछ संगठन और लोग अपने स्वार्थ के लिए लोगों को दिग्भ्रमित कर रहे थे।

भारतीय मजदूर संघ की स्थापना और मजदूर आंदोलन का कार्य दत्तोपंत ठेंगड़ी की दक्षता का प्रमाण था। भारतीय मजदूर संघ की स्थापना के पहले ठेंगड़ी जी ने साम्यवादियों के कुकृत्यों को बहुत करीब से देखा, मजदूर के कष्टों का संत्रास जिया और इसी से प्रेरणा लेकर भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की। वह इस कार्य को इश्वरीय कार्य मानते थे। उनका कहना था कि समरस समाज की रचना भारतीय अवधारणा को चरितार्थ करने का साधन है। भारतीय मजदूर संघ में कार्य करते हुए एक आम मजदूर से लेकर आम कार्यकर्ताओं तक का विश्वास हासिल किए।

यह वही दौर था, जब पूरी दुनिया में साम्यवाद अपने चरम पर था, इससे भारत भी अछूता नहीं था। यहां पर भी लाल किले पर लाल झंडा लहराने की वामपंथियों के मन की उत्कंठा हिलोरें ले रही थी। वामपंथी रणनीति में श्रमिक क्षेत्र युद्ध भूमि और श्रमिक संघ उनके अग्रिम पंक्ति की युद्धक वाहिनी माने जाते थे। सारे श्रमिक संगठनों और प्रकल्पों पर उनका एकछत्र अधिकार था। और इसी के सहारे वो भारत पर शासन करने का दिवास्वप्न देखने लगे थे। वर्ग-संघर्ष और मजदूर हित के नाम पर आए दिन मजदूरों का शोषण हो रहा था, अन्याय, शोषण और कम्यूनिस्टों के इसी कुकर्मों से परेशान श्रमिक वर्ग को एक ऐसे संगठन और नेतृत्व की तलाश थी, जो उनके सम्मान और अधिकारों की रक्षा कर सके। यह वह दौर था जब दैत्याकार स्वरूप धारण कर चुके साम्यवाद का पराभव प्रारंभ हो चुका था, वामपंथ से पूरे दुनिया के मजदूरों का मोहभंग होना प्रारंभ हो चुका था। ऐसे में, एक ऐसे संगठन की नितांत आवश्यकता थी, जो मजदूरों को ससम्मान उनका हक दिला सके तथा इन मजदूरों को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। इसी को ध्यान में रखकर 23 जुलाई 1955 को भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की।

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भारतीय मजदूर संघ की स्थापना और मजदूर आंदोलन का कार्य दत्तोपंत ठेंगड़ी की दक्षता का प्रमाण था। भारतीय मजदूर संघ की स्थापना के पहले ठेंगड़ी जी ने साम्यवादियों के कुकृत्यों को बहुत करीब से देखा, मजदूर के कष्टों का संत्रास जिया और इसी से प्रेरणा लेकर भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की। वह इस कार्य को इश्वरीय कार्य मानते थे। उनका कहना था कि समरस समाज की रचना भारतीय अवधारणा को चरितार्थ करने का साधन है। भारतीय मजदूर संघ में कार्य करते हुए एक आम मजदूर से लेकर आम कार्यकर्ताओं तक का विश्वास हासिल किए।

जिस क्षेत्र को ठेंगड़ी जी ने चुना उसे वहां परिस्थितियां इतनी आसान नहीं थी। उसके बाद भी पूर्व से स्थापित श्रम संघों से लोहा लेते हुए स्वयं का मार्ग बनाना और उस मार्ग पर चलते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करते रहे। इस चुनौती से पार पाने के लिए राष्ट्रवादी विचारधारा का पूरा सहयोग, समर्थन व आर्शिवाद श्री ठेंगड़ी जी को प्राप्त था, जिसके परिणाम स्वरूप इन कठिन राहों पर लगातार कर्तव्यों का निवर्हन करना उनके लिए आसान होता गया।

जिस समय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की उस वक्त संघ के पास ना तो कोई सुनियोजित इकाई थी, ना कोई कार्यकर्ता थे और ना ही उपयुक्त धन था। लेकिन, अपनी इच्छाशक्ति से इस दैव कार्य को प्रारंभ किया और पूरे समय नैतिक मूल्यों तथा भारतीय परंपराओं के संरक्षण पर ही बल दिया यही कारण था कि यह संगठन बहुत ही अल्प समय में ही जड़ से जहान तक का सफर तय कर लिया तथा विषम परिस्थितियों में भी अपने आप को संगठित किया तथा स्थापित किया। बहुत से कटाक्ष भी हुए अलोचनाएं भी हुई कई संगठनों के लोगों खासकर वापंथियों ने तो ठंगड़ी जी को पागल तक करार दे दिया। लेकिन इससे ना तो उनके सोच में किसी प्रकार का परिवर्तन हुआ और ना ही उसकी कार्यशैली में। वो अपने चिर-परिचित अंदाज में अपने कार्य को संपादित करते रहे तथा राष्ट्र पुनर्निर्माण को पूरे मनोयोग से पूरा करते रहे।

(लेखक श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च एसोसिएट हैं। स्रोतः- पांचजन्य, दत्तोपंत ठेंगड़ी समग्र।)

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