दीनदयाल उपाध्याय के विराट व्यक्तित्व का साक्षात्कार कराती पुस्तक

लगभग तीन सौ पृष्ठ वाली ‘एकात्म मानववाद के प्रणेता : दीनदयाल उपाध्याय’ नामक इस पुस्तक में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के जीवन से जुड़े तमाम पहलुओं को शामिल किया गया है। पुस्तक में वस्तुतः पंडित जी के बाल्यकाल से लेकर उनकी हत्या तक की सारी घटनाओं को समाहित किया गया है। चार खंडो में विभाजित इस पुस्तक में 36 अध्याय है। प्रथम खंड ‘जीवनकाल’ में बाल्यकाल से लेकर उनके प्राणोत्सर्ग तक की घटनाओं पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें बाल्यकाल मे डाकुओं से संवाद, शिक्षा-दीक्षा से जुड़ी घटनाओ को समाहित किया गया है।

एक निःस्वार्थ राजनीति में किन-किन शर्तों की आवश्यकता होती है, पंडित जी इस बात से बाखूबी वाकिफ थे और वे अक्सर कहा करते थे कि ‘‘एक कार्यकर्ता के रूप में मैं देश की जितनी सेवा कर सकता हूं उतना अतिविशिष्ट व्यक्ति होकर नहीं कर सकता हूं’’। राजनीति उनके लिए साध्य था, साधन नहीं, वो राजनीति को सेवा का विषय मानते थे, भोग का नहीं। ‘निःस्वार्थ राजनीति’ अध्याय में उनके राजनीतिक जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंगों पर ही प्रकाश डाला गया है।

पंडित जी ब्रम्हचर्य व्रत और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए खुद को समर्पित कर देने के उनके निणर्य का भी जिक्र किया गया है। उनके द्वारा लिखित उपन्यास ‘शकराचार्य’ में ब्रम्हचर्य और सन्यास की व्याख्या अपने शब्दों में आदि शकराचार्य से कराते है “हे मां पितृऋण है और उसी को चुकाने के लिए मैं संन्यास ग्रहण करना चाहता हूं। पिताजी ने जिस धर्म को जीवन भर निभाया, यदि वह धर्म नष्ट हो गया तो बताओ मां! क्या उन्हें दुख नहीं होगा उस धर्म की रक्षा से ही उन्हें शांति मिल सकती है और फिर अपने बाबा, उनके बाबा और उनके भी बाबा की ओर देखो। हजारों वर्ष का चित्र आंखों के समक्ष उपस्थित हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिए स्वयं के जीवन को दांव पर लगा दिया व कौरव-पांडवों में युद्ध करवाया। अपने जीवन में वे धर्म की स्थापना कर गए, पर लोग धीरे-धीरे भूलने लगे। शाक्यमुनि के काल तक फिर धर्म में बुराईयां आ गईं। उन्होंने भी बुराईयों को दूर करने का प्रयत्न किया, पर अब आज उनके सच्चे अभिप्राय को भी लोग भूल गए हैं। मां! इन सब पूर्वजों का हम सब पर ऋण है अथवा नहीं, यदि हिन्दू समाज नष्ट हो गया, हिन्दू धर्म नष्ट हो गया तो फिर तू ही बता मां, कोई दो हाथ-दो पैर वाला तेरे वश में हुआ तो क्या तुझे पानी देगा और कभी तेरा नाम लेगा’’ दरअसल धर्म और संसकृति को लेकर उनके मन में जो उद्गार है, उसे वो अपने उपन्यास ‘शकराचार्य’ के मुख्य पात्र बालक शंकर के माध्यम से व्यक्त करते है।

पुस्तक में उनकी लेखनी पर भी बृहत रूप से प्रकाश डाला गया है। पंडित जी द्वारा लिखित लेखों और उन लेखों में झलकती राष्ट्र-चेतना के पुंज को भी दर्शाया गया है। एक निःस्वार्थ राजनीति में किन-किन शर्तों की आवश्यकता होती है, पंडित जी इस बात से बाखूबी वाकिफ थे और वे अक्सर कहा करते थे कि ‘‘एक कार्यकर्ता के रूप में मैं देश की जितनी सेवा कर सकता हूं उतना अतिविशिष्ट व्यक्ति होकर नहीं कर सकता हूं’’। राजनीति उनके लिए साध्य था, साधन नहीं, वो राजनीति को सेवा का विषय मानते थे, भोग का नहीं। ‘निःस्वार्थ राजनीति’ अध्याय में उनके राजनीतिक जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंगों पर ही प्रकाश डाला गया है।

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उनके जीवन के ऐसे कई पहलु थे जिस पर बृहद शोध कार्य किया जा सकता है। वे समाज के हर क्षेत्र में और विधा में पारंगत थे हर घटनाओं पर उनकी पैनी नजर रहती थी तथा हर खामियों पर वह मुखर होकर विरोध दर्ज कराते थे। वे देश की गरीबी और जालालत तथा तत्कालीन सरकार और वामपंथियों की विघटनकारी रवैया से अक्सर व्यथित रहते थे। उनके व्यक्तित्व की इसी विशेषता की व्याख्या करते हुए पुस्तक के प्राक्कथन में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध अधिष्ठान के निदेशक डॉ. अनिर्बान गांगुली लिखते  हैं कि ‘‘दीनदयाल जी के लिए लिए सामान्य मानव का सुख ही सच्चा आर्थिक विकास था। दीनदयाल जी के लिए गरीबी को दूर करने का चिंतन केवल किताबी नहीं था वरन वे उससे एकात्म स्थापित कर लेते थे। वो कहते थे कि ‘जो कमाएगा वो खाएगा, यह ठीक नहीं, जो कमाएगा वो खिलाएगा’ निःसंदेह यह बात केलव संसार के दुःखों से संपृक्त एक संत ही कह सकता है। वे संत तो नहीं, पर राजनीति में रहते हुए भी संत हृदय अवश्य थे।’’।

यह पुस्तक पंडित जी के वृहद् व्यक्तित्व को करीब से जानने और समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है। उनके बारे में उनके समकक्ष और उनके सहयोगियों का अनुभव उनकी प्रतिभा का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कराता है। उनकी  रचनाओं के बारे में चर्चा करके लेखक ने उनकी साहित्य-सृजन की अप्रतिम कला और प्रतिभा का चित्रण भी बहुत अनोखे रूप में किया है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘शंकराचार्य’ और ‘चंद्रगुप्त’ जैसे उपन्यास और नाट्य विधा पर विशेष प्रकाश डाला गया है।

पुस्तक में 1965 के भारत-पाक युद्धोपरांत हुए समझौते में भारत की नैतिक हार पर पंडित जी ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, उसका भी बखूबी वर्णन किया गया है। एकात्म मानववाद, राष्ट्र चिंतन और पोलिटिकल डायरी जैसी कृतियों पर भी चर्चा की गयी है। पुस्तक में उनकी मृत्यू के उपरांत हुई घटनाओं का भी वर्णन किया गया है।

(लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च एसोसिएट हैं।)

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