यूपी चुनाव : भाजपा के अलावा सभी दल राजनीतिक अस्थिरता का शिकार

उत्तर प्रदेश चुनाव को देखते हुए सभी राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से सियासी समीकरण साधने में जुटे हुए हैं। प्रशांत किशोर की रणनीति भी कांग्रेस के लिए सफल नही हो पा रही है। जिस 27 साल के सूखे को खत्म करने के लिए प्रशांत किशोर ने दिल्ली से शीला दीक्षित को बुलाया, वह भी पार्टी के खिलाफ जा रहा है। पार्टी के मतभेद लगातार सामने आते जा रहे हैं। कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्षा रीता बहुगुणा जोशी ने जिस तरीके से युवराज की नीति और कार्य करने के फैसले पर सवाल उठाकर भाजपा का दामन पकड़ा है, उससे कांग्रेस के अन्दर नेतृत्व के अभाव की स्थिति एक बार पुनः जगजाहिर हो गई है। प्रदेश की सियासत में आए दिन परिवर्तन का दौर देखने को मिल रहा है।

राष्ट्रीय पार्टियों में कांग्रेस और भाजपा की बात आती है, लेकिन कांग्रेस की स्थिति तो और भी दयनीय साबित हो रही है। मजबूत और लोकप्रिय नेतृत्व के अभाव में कांग्रेस यूपी में पैराशूट उम्मीदवारों के भरोसे लड़ने जा रही है, जिस नाते यूपी के मतदाता उसपर भरोसा जताएंगे, इसकी संभावना न के बराबर है। रही भाजपा तो सही मायने में वही एक उचित विकल्प दिखती है, जिधर यूपी के मतदाता अपना रुख कर सकते हैं। भाजपा की केन्द्र सरकार जिस तरह से सबका साथ-सबका विकास की नीति पर कार्य कर रही है, उसे देखकर ऐसा कहा जा सकता है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में इस बार लोकसभा चुनाव – 2014 के इतिहास को दोहरा सकती है।

लम्बे अरसे से मुस्लिमों के तथाकथित मसीहा बने मुलायम सिंह यादव जिस तरीके से अपनी पार्टी और परिवार को ही नहीं संभाल पा रहे हैं, उसे देखते हुए कह सकते हैं कि इस समाजवादी कुनबे की अस्थिरता के कारण  इस बार सूबे की मुस्लिम जनता जिसका ज्यादातर वोट मुलायम को जाता था, वो भी अन्य पार्टियों की तरफ रूख कर सकती है। अन्य पार्टियों में बसपा की बात करें तो  लोकसभा चुनाव में हुई अपनी बुरी हालत से बसपा भी उभरती नहीं दिख रही है। बसपा सुप्रीमों केवल और केवल केन्द्र की मोदी सरकार की अंध-आलोचना के बल पर प्रदेश की सत्ता में काबिज होने का सपना पाले हुए नजर आ रही है। बसपा भी सपा की तर्ज पर ही अपने चुनावी विजन में लोगों को नकदी धन देने की बात के द्वारा अपने पक्ष में करने की जुगत में दिख रही है। राष्ट्रीय पार्टियों में कांग्रेस और भाजपा की बात आती है, लेकिन कांग्रेस की स्थिति तो और भी दयनीय साबित हो रही है। मजबूत और लोकप्रिय नेतृत्व के अभाव में कांग्रेस यूपी में पैराशूट उम्मीदवारों के भरोसे लड़ने जा रही है, जिस नाते यूपी के मतदाता उसपर भओरसा जताएंगे इसकी संभावना न के बराबर है। रही भाजपा तो सही मायने में वही एक उचित विकल्प दिखती है, जिधर यूपी के मुस्लिम समेत अधिकांश मतदाता अपना रुख कर सकते हैं। भाजपा की केन्द्र सरकार जिस तरह से सबका साथ-सबका विकास की नीति पर कार्य कर रही है, उसे देखकर ऐसा कहा जा सकता है कि भाजपा उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस बार लोकसभा 2014 के इतिहास को दोहरा सकती है।         

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प्रदेश की सियासत में भाजपा को छोड़कर कोई अन्य राजनीतिक दल विकास की बात करता नहीं नजर आ रहा है। बीजेपी के सर्जिकल स्ट्राइक की आलोचना चाहे जितनी किसी पार्टी द्वारा कर ली जाए, भाजपा को इसका फायदा भी उत्तर प्रदेश के चुनाव में उसे मिलने की संभावना है और अगेर ऐसा होता है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। रीता बहुगुणा ने जिस तरीके से मोदी सरकार की आलोचना करने वाले राहुल के ‘खून की दलाली’ बयान को माध्यम बनाया वह जाहिर करता है, कि कांग्रेस के युवराज का यह बयान भी गलत साबित हुआ, जिससे कांग्रेस की छवि को ही नुकसान पहुँचता नजर आ रहा है।

सपा में चाचा-भतीजावाद की राजनीति प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को बदलने में अच्छा प्रभाव डालने का कार्य कर रही है। आये दिनों से सपा में चल रही खींचतान से सपा का कुनबा और उसका वोट बैंक भी तितर-बितर हो रहा है। जिसका असर भी चुनाव में साफ-साफ प्रभाव डालता दिख रहा है। बीते कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश की राजनीति में जिस तरीके से उठा-पटक चल रही है, उसे देखकर यही अंदाजा लगाया जा सकता है, कि मोदी की छवि प्रदेश के लिए भी कारगर साबित हो रही है और भाजपा अपना वजूद बनाती हुई प्रदेश में दिख रही है।

(लेखक पत्रकारिता के छात्र हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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