भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण दस्तावेज है अरुण जेटली की पुस्तक ‘अँधेरे से उजाले की ओर’

‘अँधेरे से उजाले की ओर’ पुस्तक, श्री अरुण जेटली जी के अंग्रेजी में लिखित लेखों का हिंदी अनुवाद है। ये अनुवाद श्री प्रणव सिरोही जी ने किया है। इस पुस्तक का लोकार्पण हाल ही में 21 अक्टूम्बर 2016 को, भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह के कर-कमलों से हुआ। यह पुस्तक प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुयी है। यह पुस्तक “श्री अरुण जेटली ने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष रहने के दौरान विभिन्न मुद्दों पर जो बातें कहीं, साथ ही कुछ महत्त्वपूर्ण अवसरों पर भाषण देते हुए जो बातें रखीं, उन सब बातों को जागरूक पाठकों के सामने लाने का यह विनम्र प्रयास है।” (‘अँधेरे से उजाले की ओर’ पुस्तक के प्रकाशकीय वक्तव्य से)। 240 पृष्ठ की इस पुस्तक में विविध विषयों से संबंधित कुल 50 लेखों या भाषणों को संकलित किया गया है। इन पचास लेखों को मोटे रूप से निम्नलिखित पांच प्रमुख क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जा सकता है- एक- राजनैतिक-भ्रष्टाचार से संबंधित लेख, दो- न्याय-व्यवस्था से संबंधित लेख, तीन- अपनी राजनैतिक परंपरा के मूल्यांकन से संबंधी लेख, चार- मीडिया की राजनीति से संबंधित लेख, पांच- जम्मू-कश्मीर और राष्ट्रीयता से संबंधित लेख।

‘2जी स्पेक्ट्रम घोटाला : अनोखी बंदरबाँट’, ‘राष्ट्रमंडल खेल घोटाले का सच’, ‘लालू पर आखिर साबित हुए दोष’, ‘कोयला ब्लॉक आवंटन की अहम फाइलें गायब’, ‘कोयला ब्लॉक आवंटन : सरकारी दखल का सिलसिला’, ‘2जी स्पेक्ट्रम घोटाला : किसकी उंगली किस ओर’, ‘कहानी दूरसंचार की’, ‘वैध खनन में जारी अवैध गोलमाल’, ‘2जी स्पेक्ट्रम आवंटम में घोटाला, पर दूरसंचार में क्रान्ति’, ‘मतदान के लिए नकदी लेनदेन का कलंक’, ‘बोफोर्स भ्रष्टाचार मामला’, ये ग्यारह लेख या भाषण ऐसे हैं, जिन्हें ‘राजनैतिक-भ्रष्टाचार से संबंधित लेखों’ की श्रेणी में रखा जा सकता है। इन भाषणों के शीर्षकों से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि ये भाषण राजनैतिक-भ्रष्टाचार से संबंधित भाषण हैं। भ्रष्टाचार से संबंधित इन भाषणों की विषय-वस्तु खेल, खनन, दूर-संचार, मतदान, रक्षा आदि विविध विषयों से संबंधित है। हालांकि इन भाषणों में यू.पी.ए. सरकार के भ्रष्टाचार से संबंधित कुछ बड़े-बड़े घोटालों को ही केंद्र में रखा गया है। फिर भी इन लेखों में यह साफ़ देखा जा सकता है कि कैसे यू.पी.ए. सरकार के नेता राष्ट्र की संपत्ति को अपनी निजी संपत्ति में बदलने में लगे हुए थे। चाहे दूर-संचार, खनन व खेल आदि राष्ट्र के विकास से संबंधित क्षेत्र हो या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा और मतदान जैसे लोकतंत्रीय प्रणाली से जुड़े हुए सवाल हों, सभी जगह यू.पी.ए. सरकार देश की जनता को लूटने में लगी हुयी थी।

इस पुस्तक के लेखों के बारे में श्री अमित शाह जी ने उचित ही कहा था कि श्री जेटली ने “विपक्ष में रहते हुए उन्होंने एक तरफ जहां पार्टी की लाइन तय की वहीं प्रवक्ता के रूप में भी जनता की आवाज बने।” श्री अमित शाह ने उचित ही “आशा जताई कि लेखों का यह संकलन देश को बताएगा कि किस तरह पिछले वर्षों में देश अंधकार से उजाले की ओर बढ़ा है।” निश्चित रूप से भारतीय राजनीति के जीवंत अनुभवों को हिंदी भाषा में प्रकाशित कराके श्री जेटली जी ने हिंदी के पाठको के लिए यह महत्त्वपूर्ण उपहार दिया है।

इस पुस्तक के दूसरे प्रकार के भाषणों में न्याय-व्यवस्था से संबंधित भाषणों को सम्मिलित किया जा सकता है, जो निम्नलिखित – ‘सीबीआई के संचालन पर मंत्री समूह की सिफारिशें- एक तमाशा’, ‘सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में सीबीआई का दुरुपयोग’, ‘राजनीतिक हथियार है सीबीआई ?’, ‘कैसे हो न्यायपालिका निर्भीक और गतिशील’, ‘कई-कई दबावों में निखरी है न्यायपालिका, सुधार जरूरी’, ‘अदालतों में मामलों के बढ़ते बोझ घटाने की कोशिश’, ‘गतिशील और सामाजिक स्तंभ रहा है उच्चतम न्यायालय’ एवं ‘मामलों की तादाद कम करने के लिए वैकल्पिक विवाद निस्तारण तंत्र’। इन लेखों में यू.पी.ए. सरकार के द्वारा सीबीआई और सर्वोच्च न्यायालय के दुरुपयोग के गैर-लोकतांत्रिक रवैये को स्पष्ट देखा जा सकता है। इस संबंध में इस पुस्तक के प्रकाशकीय वक्तव्य में उचित ही लिखा गया है, “यू.पी.ए. सरकार ने जिस तरह अपने हितों की रक्षा के लिए, विपक्ष को घेरने के लिए, उसे फँसाने के लिए सी.बी.आई. जैसी स्वायत्त संस्थाओं का दुरुपयोग किया, वह पहले कभी नहीं हुआ। उसके खिलाफ श्री अरुण जेटली ने मुखरता से आवाज उठाई।” इसी तरह “स्वयं एक वकील होने के नाते जेटली जी ने न्यायपालिका की समस्याओं, उनके निदान और उसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए जो व्यावहारिक सुझाव दिए, वे सबने मुक्त कंठ से सराहे।” (‘अँधेरे से उजाले की ओर’ पुस्तक के प्रकाशकीय वक्तव्य से)।  

लेखक ने इस पुस्तक में अपनी राजनीतिक विरासत से संबंधित कुछ उम्दा लेखों को भी सम्मिलित किया है। ‘आपातकाल के वे काले दिन’, ‘हिन्द दा नेता जयप्रकाश’, ‘देश हित में आवाज उठानेवाले नानाजी’, ‘आर्थिक सुधारों के प्रति सचेत अटलजी’, ‘भारतीय संविधान के पचास साल- समाज करे आत्मविश्लेषण’ एवं ‘मजबूती क्यों न हो निर्वाचन आयोग की आजादी में’ आदि ऐसे ही लेख हैं जिनमें लेखक ने अपनी राजनैतिक विरासत के साथ-साथ सम्पूर्ण भारतीय राजनीति की विरासत के मूल्यांकन करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। इंदिरा गांधी द्वारा स्वतंत्र भारत में फिर से तानाशाही शासन स्थापित किया गया। लेखक ने इसे भारतीय राजनीति में काले दिनों के रूप में याद किया है। स्वयं भुक्त-भोगी होने के कारण जेटली जी के इन लेखों में यह अनुभव प्रमाणिकता के साथ अभिव्यक्त हुआ है। कारण यह कि “जेटली उन लोगों में से हैं जो आपातकाल के पूरे समय जेल में बंद रहे।” (दैनिक जागरण, 21 अक्टूम्बर, पृष्ठ संख्या-3, नई दिल्ली संस्करण से) जेटली जी ने इन लेखों में इस काले दौर से सामना करने वाले अपने प्रमुख नेताओं को भी उसी प्रमाणिकता से याद किया है, जिसके वे स्वयं भुक्त-भोगी थे। इनमें जयप्रकाश नारायण, नानाजी देशमुख और अटल बिहारी वाजपेयी जी के योगदान को एक मझे  हुए दार्शनिक की तरह और एकदम सरल लहजे में स्पष्ट किया गया है। इसी तरह भारत के संविधान और निर्वाचन आयोग की सीमाओं को भी अन्य लेखों में स्पष्ट किया है।

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इस पुस्तक के चौथे प्रकार के लेख वे हैं जो ‘मीडिया की राजनीति’ पर केन्द्रित हैं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाने वाले मीडिया के दुरुपयोग से संबंधित मूलभूत समस्याओं को इन लेखों में विस्तार के साथ रेखांकित किया गया है। इस विषय से संबंधित लेख निम्नलिखित हैं- ‘किराए पर कैमरों के बहाने काली कमाई का शोर’, ‘ध्वनि तरंगों पर हक़ सबका, सावधानी फिर भी जरूरी’, ‘सोशल मीडिया की आजादी, इंटरनेट की चुनौती’, ‘बदलते आर्थिक हालात में प्रिंट मीडिया का दमकता चेहरा’, ‘मीडिया की आजादी पर कानूनी नजर क्यों जरूरी’, ‘सूचना के बढ़ते माध्यम और कानूनी शिकंजों की बेबसी’, ‘मीडिया और विकास’, ‘सामाजिक बदलाव, क़ानून और मीडिया के अंतर्संबंध’, ‘पाठकों के ही पास है मीडिया का रिमोट कंट्रोल’, ‘पेड-न्यूज’ वाक् स्वातंत्र्य नहीं, इलाज संभव’, एवं ‘मीडिया माध्यमों के नए रूप’। जेटली जी मीडिया के राजनैतिक दुरुपयोग से मुक्ति के साथ ही उसकी अनियंत्रित और अराजक स्वतंत्रता पर भी उचित नियंत्रण की भी आवश्यता पर जोर देते हैं। कारण “कई बार निरंकुश हो रहे मीडिया पर नकेल कसने की भी आवश्यता रहती है। सूचना-क्रान्ति के युग में प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लिए एक समुचित व संतुलित नीति-रीति बने, यह अरुण जी की सदा प्रबल आकांक्षा रही, ताकि यह लोकतंत्र का सजग प्रहरी बन सके।” (‘अँधेरे से उजाले की ओर’ पुस्तक के प्रकाशकीय वक्तव्य से) मीडिया से संबंधित इन लेखों और भाषणों में जेटली जी के इस नजरिया को बखूबी देखा जा सकता है।

इस पुस्तक के अंतिम 14 लेख जम्मू-कश्मीर और राष्ट्रीयता से संबंधित है, जो इस प्रकार है- ‘अनुच्छेद 370 और धर्मनिरपेक्षता अलग-अलग मुद्दे’, ‘जम्मू-कश्मीर में बेटी विरोधी स्थिति’, ‘भारतीय संघ और कश्मीरी संबंधों पर नाकाम कार्य-समूह’, ‘जम्मू-कश्मीर पर प्रधानमंत्री को पत्र’, ‘कश्मीर में कब्जे के पाक इरादों का मुकाबला’, ‘जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों ने नाकाम किए आतंकी मंसूबे’, ‘ऐतिहासिक भूलों से बढ़ी जम्मू-कश्मीर में अशांति’, ‘जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के नए इरादे’, ‘भारतीय आन-बान-शान का प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज’, ‘राष्ट्रीय एकता यात्रा बनाम राष्ट्रीय भावना का प्रचार’, ‘कश्मीर में अफस्फा जरूरी क्यों’, ‘अमरनाथ यात्रा का ऐतिहासिक गौरव’, ‘कार्यसमूह को अरुण जेटली का पत्र’ एवं ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता और आतंक का जोर’। इन लेखों में हम जम्मू-कश्मीर और संविधान की धारा 370 पर श्री अरुण जेटली जी के नजरिये को विस्तार के साथ देख सकते हैं। इन लेखों और भाषणों में लेखक की जम्मू-कश्मीर के विकास के साथ-साथ राष्ट्र की एकता और अखंडता के प्रति प्रतिबद्धता को विस्तार के साथ देखा जा सकता है। लेखक ने जम्मू-कश्मीर और धारा 370 की स्थिति पर बड़े ही तार्किक और मानवीय ढंग से विचार किया है।  

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि संख्या में कम और मात्रा में संक्षिप्त इन भाषणों में यू.पी.ए. सरकार के समय के घने अंधकार को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। इतना ही नहीं इन भाषणों में इस अंधकार से भारतीय राजनीति को उजाले की ओर बढ़ने के लिए किये गए लेखक और उनकी परंपरा के अन्य लोगों के संघर्ष को भी देखा जा सकता है। इस पुस्तक के लेखों के बारे में श्री अमित शाह जी ने उचित ही कहा था कि श्री जेटली ने “विपक्ष में रहते हुए उन्होंने एक तरफ जहां पार्टी की लाइन तय की वहीं प्रवक्ता के रूप में भी जनता की आवाज बने।” (दैनिक जागरण, 21 अक्टूम्बर, पृष्ठ संख्या-3, नई दिल्ली संस्करण से) श्री अमित शाह ने उचित ही “आशा जताई कि लेखों का यह संकलन देश को बताएगा कि किस तरह पिछले वर्षों में देश अंधकार से उजाले की ओर बढ़ा है।” (दैनिक जागरण, 21 अक्टूम्बर, पृष्ठ संख्या-3, नई दिल्ली संस्करण से) निश्चित रूप से भारतीय राजनीति के जीवंत अनुभवों को हिंदी भाषा में प्रकाशित कराके श्री जेटली जी ने हिंदी के पाठको के लिए यह महत्त्वपूर्ण उपहार दिया है। इतना ही नहीं मेरा मानना है कि हिंदी भाषा में प्रकाशित श्री अरुण जेटली जी की यह पुस्तक भारतीय राजनीति का एक महत्त्वपूर्ण दस्ताबेज सिद्ध होगा।

(लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च एसोसिएट हैं।)

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