सरकार की नीतियों में दीन दयाल जी के विचारों का प्रभाव

मानव की बुनियादी जरूरतों का सीधा जुड़ाव सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक विषयों से होता है। एक आम मनुष्य का निजी एवं सार्वजनिक जीवन इन तीनों कारकों से प्रभावित होता है। कभी उसे राजनीति प्रभावित करती है तो कभी समाज की रीती-नीति तो कभी अर्थनीति का प्रभाव होता है। लेकिन सही मायने में अगर देखें तो मानव मात्र के लिए ये तीनों ही परस्पर जुड़े हुए कारक हैं। एक आम मनुष्य की मूल जरूरतों की पूर्ति को ध्यान में रखते हुए इतिहास में अनेक विद्वानों द्वारा अनेक विचार दिए गये हैं। अनेक विद्वानों ने अपने-अपने तरीके से यह बताने की कोशिश की है कि मानव मात्र की बेहतरी के लिए समाज का स्वरुप क्या हो, राजनीति कैसी हो और अर्थनीति किस ढंग से संचालित की जाय। इसी श्रृंखला में एक बड़ा नाम जनसंघ के नेता, महान विचारक एवं चिंतक पंडित दीन दयाल उपाध्याय का भी है। राजनीति, समाज और अर्थ को मानव मात्र के कल्याण से जोड़ने का जो एक सूत्र पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने दिया है, वो एकात्म मानववाद के दर्शन के रूप में विख्यात है।

आज देश पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी को याद करते हुए उनकी जन्म शताब्दी वर्ष मना रहा है। उनके विचारों का सरकार की नीतियों का आधार बनना बेहद ही उपयोगी साबित होगा। दीन दयाल जी ने अपने चिन्तन में आम मानव से जुड़ी जिन चिंताओं और समाधानों को समझाने का प्रयास आज से दशकों पहले किया था, आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा उन्हीं बातों को केंद्र में रखकर सरकार की नीतियों का निर्माण किया जा रहा है। भारत और भारतीयता के संवाहक एवं संचारक के रूप दीन दयाल उपाध्याय के विचार किसी आदर्शलोक का दर्शन होने की बजाय व्यवहारिकता के धरातल पर बेहद मजबूती से टिकते नजर आते हैं।

पंडित दीन दयाल उपाध्याय द्वारा एकात्म मानववाद का विकल्प उस कालखंड में दिया गया जब देश में समाजवाद, साम्यवाद जैसी आयातित विचारधाराओं का बोलबाला था। भारत में भारतीयता को पुनर्जीवित करने वाली विचारधारा की बजाय समाजवाद एवं साम्यवाद जैसी आयातित विचारधाराओं का बोलबाला होना भारतीयता के लिए अनुकूल नहीं था। पंडित जी ने भारत की समस्या को भारत के सन्दर्भों में समझकर उसका भारतीयता के अनुकूल समाधान देने की दिशा में एक युगानुकुल प्रयास किया। चूँकि, पंडित दीन दयाल उपाध्याय इस बात को लेकर गम्भीर थे कि आजादी से पूर्व का जो संघर्ष था, वो स्वराज का संघर्ष था। लेकिन, आजादी के बाद का जो संघर्ष है, वो ‘स्व’ की अवधारणा को मजबूत करने का संघर्ष है। पंडित जी मानते थे कि राष्ट्र के निर्माण और उसकी मजबूती में उसकी विरासत के मूल्यों का बड़ा योगदान होता है। देश के आम जन जीवन की बेहतरी, आम जन-जीवन की सुरक्षा, आम जनता को न्याय आदि के संबंध में एक समग्र चिन्तन अगर किसी एक विचारधारा में मिलता है तो वो एकात्म मानववाद का विराट दर्शन है। पंडित जी द्वारा प्रदिपादित इस विचार दर्शन में ‘एकात्म’ का आशय अविभाज्य अथवा एकीकृत अवधारणा से है। वहीँ मानववाद से आशय यह है कि सबकुछ मानव मात्र के कल्याण हेतु संचालित हो।

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हालांकि यह जरूरत थी कि पंडित दीन दयाल जी द्वारा देश के राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक विकास की दिशा में दिए गये विचार दर्शन को सरकार की नीतियों में प्रमुखता से शामिल किया जाय। मेरा निजी मत है कि जब पंडित जी ‘स्व’ की बात कर रहे थे तो उनका स्पष्ट दृष्टिकोण राष्ट्र की बहुमुखी आत्मनिर्भरता को स्थापित करना रहा होगा। तत्कालीन दौर बेशक तकनीक के दौर वाले आधुनिक भारत से बेहद अलग था, मगर उनके ‘स्व’ की अवधारणा का अगर मूल्यांकन करें तो उनकी दृष्टि में एक सक्षम भारत का भावी चित्र रहा होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काम कर रही भारत सरकार उस ‘स्व’ की दृष्टि को अपनी नीतियों में प्रमुखता से लागू कर रही है। आत्मनिर्भरता से अन्त्योदय की राह निकालने की दृष्टि के साथ काम कर रही भाजपा-नीत केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं में अंतिम कतार के व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प और प्रतिबद्धता साफ़ दिखती है।

अगर हम केंद्र सरकार के एक कार्यक्रम ‘मेक इन इण्डिया’ को ही उदाहरण के तौर पर लें तो यह कार्यक्रम वैश्वीकरण के इस दौर में भारत को निर्माण एवं रोजगार के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होने वाला कार्यक्रम है। बेशक इस कार्यक्रम का लक्ष्य दूरगामी है और इसका मूल्यांकन तुरंत अथवा बहुत जल्दीबाजी में नहीं किया जा सकता है, लेकिन अपने लक्ष्य तक पहुँचते-पहुँचते यह कार्यक्रम एक आत्मनिर्भर भारत की स्थापना में महत्वपूर्ण कारक साबित होगा। पंडित जी अन्त्योदय की बात करते थे। उनके मन में कतार के अंतिम व्यक्ति तक खुशहाली और समृद्धि का प्रकाश पहुँचाने की चिंता सदैव रही है। उनके वैचारिक दृष्टिकोण में जिस अन्त्योदय की अवधारणा का जिक्र आता है, यह समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को सक्षम, सबल और स्वालम्बी बनाने की उनकी चिंता का ही प्रतिफल था। वर्तमान में जब केंद्र में उसी दल की सरकार है जिसकी नींव की पहली ईंट रखने में दीन दयाल उपाध्याय जी का महती योगदान था तो उनके विचारों का सरकार की नीतियों में व्यापक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। स्टार्ट-अप, स्टैंड-अप जैसी योजनाओं के माध्यम से सरकार ने अंतिम व्यक्ति को सबल, सक्षम और स्वालम्बी बनाने की दिशा में कार्य को आगे बढ़ाया है। इन योजनाओं को लेकर सरकार का दृष्टिकोण साफ़ है कि आम जन महज नौकरी की निर्भरता से ऊपर उठकर मुख्यधारा से जुड़े एवं आर्थिक रूप से न सिर्फ खुद स्वालम्बी बने बल्कि औरों के लिए अवसर पैदा करें। स्टैंडअप जैसी योजना के माध्यम से समाज के उस वर्ग को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की गयी है जो लंबे समय से हाशिये पर है। आज अगर केंद्र सरकार की विकास यात्रा के केंद्र में ‘सबका साथ सबका विकास’ की मूल भावना नजर आती है तो इसके प्रेरणास्त्रोत के रूप में दीन दयाल जी के विचार ही नजर आते हैं। पंडित जी का स्पष्ट मानना था कि जो व्यक्ति आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं होता है वह राजनीतिक रूप से भी स्वतंत्र नहीं होता है। आज सरकार आम जन को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और स्वालम्बी बनाने की दिशा में जिन प्रयासों पर सतत काम कर रही है, वो वाकई इन्हीं विचारों से ओत-प्रोत नजर आते हैं। चूँकि भारत की अर्थव्यवस्था के मूल में कृषि है लिहाजा पंडित दीन दयाल उपाध्याय कृषि सुधारों पर ख़ास जोर देने की बात करते थे। वे कृषि में भारतीय कृषि के अनुरूप आधुनिकता का प्रवेश भी चाहते थे। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा कृषि सुधारों की दिशा में सॉयल हेल्थ कार्ड जैसी योजना को लाना यह प्रमाणित करता है कि सरकार कृषि सुधार को आधुनिक तकनीक के माध्यम से करने की दिशा में लगातार नवाचार कर रही है।

आज देश पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी को याद करते हुए उनकी जन्म शताब्दी वर्ष मना रहा है। उनके विचारों का सरकार की नीतियों का आधार बनना बेहद ही उपयोगी साबित होगा। दीन दयाल जी ने अपने चिन्तन में आम मानव से जुड़ी जिन चिंताओं और समाधानों को समझाने का प्रयास आज से दशकों पहले किया था, आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा उन्हीं बातों को केंद्र में रखकर सरकार की नीतियों का निर्माण किया जा रहा है। भारत और भारतीयता के संवाहक एवं संचारक के रूप दीन दयाल उपाध्याय के विचार किसी आदर्शलोक का दर्शन होने की बजाय व्यवहारिकता के धरातल पर बेहद मजबूती से टिकते नजर आते हैं। 

(लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं एवं नेशनलिस्ट ऑनलाइन के संपादक हैं।)

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