यूपी चुनाव : भाजपा की परिवर्तन यात्रा के आगे हवा हो रहे विपक्षी दलों के सियासी समीकरण

उत्तर प्रदेश में चुनाव को अभी लगभग दो-तीन महीने का वक्त शेष है, लेकिन सूबे की सियासत में सियासी गर्माहट का माहौल देखने को लगातार मिल रहा है। सूबे में वोटबैंक की राजनीति साधने के लिए तमाम पार्टियॉं अपने सभी पैंतरें अपना रही है। बसपा एक ओर जहां दलित समुदाय को अपनी पैतृक संपत्ति मानते हुए ब्राहाण और राजपूतों को अपने पाले में खींचकर चुनावी वैतरणी को पार करने की फिराक में दिख रही है, वहीँ कांग्रेस और सूबे में सत्तारूढ़ सपा भी जातिगत राजनीति के भरोसे अपने चुनावी मुहिम में सफल होने की फिराक में दिख रही हैं। विकास का मुद्दा इन पार्टियों के एजेंडें से गायब दिख रहा है। अखिलेश सरकार ने सूबे की राजनीति में अपनी धाक जमाने के लिए कुछ हद तक विकास की दिशा में बढ़ने की कोशिश की, लेकिन विकास तो हुआ नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, दलितों पर अत्याचार और दंगे-फसाद से प्रदेश को मुक्त कराने में ये बुनियादी स्तर पर विफल साबित हुई। पिछले पांच वर्षों में उत्तर प्रदेश में देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा सबसे ज्यादा साम्प्रदायिक दंगे-फसाद हुए। भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र का तमगा भी इन वर्षों में सरकार के सियासी सफर में हावी  दिखा।

केन्द्र की मोदी सरकार के बीते ढाई वर्षों के कार्यकाल में लोगों में स्वच्छ और विकास की राजनीति को लेकर भाजपा के प्रति विश्वसनीयता और उम्मीद काफी बढ़ी है। भाजपा के प्रति सूबे की जनता के समर्थन का अंदाजा प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों में उमड़ने वाले विशाल जनसमूह के जरिये लगाया जा सकता है। भाजपा की परिवर्तन यात्रा प्रदेश की सियासत में अपनी पहुँच व्यापक रूप से बढ़ाती हुई दिख रही है, जिससे संभावना है कि वो उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के अपने प्रदर्शन को विधानसभा चुनाव में भी दोहरा सकती है।

बात चाहे मुजफ्फरनगर दंगे की हो या दलितों पर अत्याचार की, यूपी की अखिलेश सरकार इन पर लगाम लगाने में हर तरह से विफल साबित हुई है। प्रदेश में पिछले पांच वर्षों में शिक्षा और नौकरी के क्षेत्र में प्रदेश सरकार द्वारा कोई सकरात्मक कार्य नहीं हो सका। अभी हाल के कुछ समय पहले जारी की गई मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में प्रदेश में शिक्षकों की भारी कमी की बात कही गई। सूबे की सपा सरकार की पिछले कुछ महीनों से आपसी पारिवारिक लड़ाई भी किसी से छिपी नहीं  है, जो इस बात की द्योतक है कि प्रदेश की राजनीति में सत्तारूढ़ सपा के नेताओं के वर्चस्व की लड़ाई ही सर्वोपरि दिख रही है। जनता के सरोकार से जुड़े मुद्दे प्रदेश सरकार की फेहरिस्त से गुम से हो चुके हैं।

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गौर करें तो प्रदेश की सभी रैलियों में विपक्षी पार्टियों के शीर्ष नेताओं द्वारा केन्द्र सरकार पर खूब निशाना साधा जा रहा है। बसपा और सपा से लेकर कांग्रेस तक नोटबंदी के प्रति कड़ा रूख दिखाते हुए अपनी राजनीतिक बुद्विहीनता का प्रस्तुतिकरण कर रहे हैं। जब जनता नोटबंदी के मसले पर सरकार के साथ खड़ी है, फिर किसके लिए ये विपक्षी पार्टियॉ विरोध कर रही है, ये अपने आप सोचने वाली बात है। सूबे की सियासत का पारा ऐसा गर्म  दिख रहा है कि बसपा और सपा अपने राजनीति के सभी दांव-पेंच केवल भाजपा को रोकने के लिए लगाने में लगी  हैं। कांग्रेस भी अपने वजूद की लड़ाई के लिए नही, बल्कि भाजपा को सत्ता तक पहुंचने से रोकने के लिए अपनी ताकत लगाती नज़र आ रही है। मगर, इन पार्टियों के इन प्रयासों का जनता पर कोई विशेष प्रभाव पड़ता नहीं दिख रहा. क्योंकि इनके इन सब विरोधों के बावजूद सूबे की सियासत में सपा की विकास रथयात्रा पर भाजपा की परिवर्तन यात्रा हावी दिख रही है। समझा जा सकता है कि सूबे की आम जनता सपा सरकार के भ्रष्ट प्रशासनिक ढाँचे और गुंडाराज से छुटकारा चाहती है. दूसरी चीज कि केन्द्र की मोदी सरकार के बीते ढाई वर्षों के कार्यकाल में लोगों में स्वच्छ और विकास की राजनीति को लेकर भाजपा के प्रति विश्वसनीयता और उम्मीद काफी बढ़ी है। भाजपा के प्रति सूबे की जनता के समर्थन का अंदाजा प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों में उमड़ने वाले विशाल जनसमूह के जरिये लगाया जा सकता है। भाजपा की परिवर्तन यात्रा प्रदेश की सियासत में अपनी पहुँच व्यापक रूप से बढ़ाती हुई दिख रही है, जिससे संभावना है कि वो उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के अपने प्रदर्शन को विधानसभा चुनाव में भी दोहरा सकती है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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