संसद सत्र को हंगामे की भेंट चढ़ाने वाले विपक्षी दलों का जनता करेगी हिसाब

लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद का का काम जनता की भलाई करना होता है, लेकिन शीतकालीन सत्र में जो स्थिति नजर आई, उसे देखकर इस सम्बन्ध में निराशा ही होती है। जिस नोटबंदी पर विपक्ष ने इस पूरे संसद सत्र को हंगामे की भेंट चढ़ा दिया, उसपर भारतीय जनता सरकार के साथ खड़ी है। क्योंकि लोगों को समझ आ रहा है कि इसका दूरगामी असर देश के लिए सुखद साबित होगा। फिर किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए लगभग पूरा विपक्ष लामबंद नजर आया, वह भी जनता की दुहाई के साथ और संसद को सड़क तक किस मकसद के लिए घसीटा, यह एक सोचनीय पहलू है।

संसद का उत्तरदायित्व है, जनसमस्याओं को आवाज देना, फिर अगर संसद की दहलीज तक उसकी पुकार नहीं पहुँच रही फिर संसद के क्या मायने, सड़क पर विरोध प्रदर्शन से स्थिति नहीं बदलने वाली, उसके लिए संसद में चर्चा की जरूरत होती हैं, लेकिन पूरे सत्र में वो चर्चा गायब रही। केवल विपक्ष का हंगामा हुआ। सरकार ने अपनी तरफ से सत्र चलाने की भरसक कोशिश की, विपक्ष की हर उचित मांग मानी, लेकिन विपक्ष को तो जैसे संसद चलने ही नहीं देना था, इसलिए उसके मांगों की फेहरिश्त लगातार बढ़ती ही गयी। विपक्षी दलों का यह रुख न केवल भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के लिये अहितकर है, बल्कि जनता के हित को अभी अवरोधित करने वाला है।  ये कृत्य जनता देख रही है, उसकी अदालत में विपक्ष के इस रवैये का हिसाब जरूर किया जाएगा।

हाल के दो-ढाई वर्षों के संसदीय इतिहास के पन्ने पलटकर देखें, तो  मिलेगा कि संसद में सरकार की नीतियों का विरोध करना ही विपक्ष का फैशन हो गया है। जनता के नाम पर बिना किस आधार के विपक्ष हंगामे के जरिये संसद को ठप्प करने में लगा रहा है। हालांकि इस शीतकालीन सत्र में विपक्ष का उत्पात कुछ अधिक ही उग्र दिखा और इसी कारण ये पिछले दशक भर से ऊपर का सबसे कम कामकाजी संसद सत्र रहा है। एक महीने का शीतकालीन सत्र बमुश्किल 18 घण्टे लोकसभा में चल सका और वही रवायत उच्चस्तरीय सदन की रही, जहाँ लगभग 22 घण्टे ही कामकाज हुआ। जिस संसद की कार्यवाही और उसके प्रतिनिधियों पर खर्च स्वरूप देश की जनता के लाखों-करोंड़ो रुपये पानी की तरह बहाये जा रहे हों, वहाँ जनता की भलाई का कोई काम होने की बजाय ऐसे हंगामे होना निराश करने वाला और चिंताजनक है।

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संसद का उत्तरदायित्व है, जनसमस्याओं को आवाज देना, अब अगर संसद की दहलीज तक जनता की पुकार नहीं पहुँच रही, फिर संसद के क्या मायने ? सड़क पर विरोध प्रदर्शन से स्थिति नहीं बदलने वाली, उसके लिए संसद में चर्चा की जरूरत होती हैं, लेकिन विपक्षी हंगामे के कारण इस पूरे सत्र में वो चर्चा गायब रही। केवल विपक्ष का हंगामा हुआ। सरकार ने अपनी तरफ से सत्र चलाने की भरसक कोशिश की, विपक्ष की हर उचित मांग मानी, लेकिन विपक्ष को तो जैसे संसद चलने ही नहीं देना था, इसलिए उसके मांगों की फेहरिश्त लगातार बढ़ती ही गयी।

विपक्ष का हक बनता है, विरोध करना, लेकिन अंधविरोध नहीं होना चाहिए। भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी के दुःख व्यक्त करने के बावजूद कोई असर  संसद की कार्यवाही पर नहीं हुआ, इसके साथ महामहिम राष्ट्रपति की टिप्पणी से भी विपक्ष के रवैये में कोई फ़र्क नहीं दिखा और संसद का शीतकालीन सत्र  में केवल दिव्यांगो का बिल बिना चर्चा के पास हो सका और संसद का सत्र समाप्त हो गया। जिस सत्र में लगभग दस बिलों के प्रस्तावों पर चर्चा होनी थी, वह राजनीति के आखाड़े में तब्दील हो कर रह गई। पिछले एक या दो वर्षों की बात की जाए, तो संसद कभी जीएसटी बिल तो कभी अन्य कारणों से प्रभावित ही रही है। जनता के मुद्वे पर चर्चा का दौर ही नहीं शुरू हो पाता है। विपक्षी दलों का यह रुख न केवल भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के लिये अहितकर है, बल्कि जनता के हित को अभी अवरोधित करने वाला है।  ये कृत्य जनता देख रही है, उसकी अदालत में विपक्ष के इस रवैये का हिसाब जरूर किया जाएगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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