भारतीय राजनीति के ‘राजर्षि’ हैं अटल बिहारी वाजपेयी

आपने वर्णमाला भी अभी पूरी तरह से सीखी नहीं हो और कहा जाय कि निराला के अवदान पर कोई निबंध लिखें; ‘दिनकर’ पर टिप्पणी आपको तब लिखने को कहा जाय जब आपने विद्यालय जाना शुरू ही किया हो; इतना ही कठिन है राजनीति के अपने जैसे किसी शिशु अध्येता के लिए अटल जी पर कुछ लिखना। और अगर साहित्य के साधक ऋषि का ‘राजर्षि’ में रूपांतरण या साहित्य और राजनीति दोनों को दूध और शक्कर की तरह मिला देने वाले अटल जी के इस विशेष रूप के मूल्यांकन की बात हो, तो यही कहा जा सकता है कि सूरज को दीया दिखाने का कार्य चलो कर ही लिया जाय। अटल जी ने ही तो कहा भी है कि आओ फिर से दीया जलाएं।

क्या लिखा या कहा जाय अटल जी के बारे में ? क्या ये कि राजनीति के क्षितिज पर साहित्य के एकमात्र और वर्तमान के अंतिम सूरज हैं अटल जी, या यह कि इस संवेदनहीन समय में, सत्ता प्राप्ति की लिप्सा को एकमात्र साध्य मान लेने को ‘राजनीति’ कहे जाने वाले वक्त में ‘न भीतो मरणादस्मि, केवलम दूषितो यशः (मृत्यु से नहीं, अपयश से डरता हूं)’ कहते हुए इस्तीफा हाथ में लेकर राष्ट्रपति भवन पहुँच जाने वाले अकेले उदाहरण अटल जी हैं। यह उस योद्धा की बात है, जिसने सत्ता में रहकर भी स्थितिप्रज्ञ हो जाने, उस कीचड़ में भी कमल के सदृश खिले रहने को कभी केवल चुनाव निशान मात्र नहीं समझा।

युगपुरुष, राजनेता, लोकनायक, राजर्षि, स्टेट्समैन, पत्रकार, लेखक, कवि, प्रेरक, भारत का पहरुआ, विश्व में भारत का प्रसारक, संस्कृति का अग्रदूत और इनसे भी बढ़कर रग-रग में भरे हिंदुत्व के अपने परिचय को तमगे की तरह पहने, मुकुट की तरह सजाए, उन्नत मस्तक और उभरे सीने के साथ पीड़ाओं में पलने, तूफानों से टकराने का साहस संचार करते हुए, कदम मिलाकर चलने का आह्वान करने वाले अटल जी लोकतांत्रिक भारत के इतिहास को एक अनोखा और अद्भुत उपहार हैं।

बताइये भला, राजनीति में रचा-बसा-पगा रग-रग समर्पित किया हुआ कोई युगपुरुष इस बाल-सुलभ डर के साथ प्रभु से कभी ज्यादा ऊंचाई नहीं दे देने की मांग करता हुआ नज़र आये कि फिर वो अपनों को गले नहीं लगा पायेगा, मानो कंधे पर झोला लटकाए कोई बच्चा बार-बार पिता की साइकिल से कूद कर उतर जाना चाहता हो कि वो स्कूल नहीं जाएगा, अपनी मां का आंचल छोड़ कर। ऐसी संवेदना, ‘अपनों’ के लिए इतना अगाध प्यार, ‘अपनापन’ की इतनी व्यापक परिभाषा, वसुधा को ही कुटुंब समझ लेने की भारतीय संस्कृति से होली के रंगों की तरह सराबोर, उस वाजपेयी जी का जिक्र हम कर रहे हैं, जिन्हें राजनीति की रपटीली राहें कभी डिगा नहीं पायी कर्तव्यपथ से। तारीख का हर इम्तहान जिन्हें कुंदन ही बनाता रहा।

अपने-आपमें यह अजूबा ही है कि राजनीति के जिस डगर पर लोग चलते ही इसलिए हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा ‘ऊंचाई’ हासिल कर जल्द से जल्द अपनों के ही गले में फंदा डाल सकें, वहां कोई एक कवि-ह्रदय राजनेता अपने इश्वर से यह प्रार्थना करता है कि उसे ज़मीन पर ही रहने देना, नहीं करना है परवाज़ उसे किसी महत्वाकांक्षा के आसमान में। और ज़ाहिर है, ऐसे ही विरले लोग जब तक किसी ऊंचाई पर पहुंचते हैं, तबतक उनका कद उनके द्वारा धारित किसी भी पद से इतना ज्यादा बड़ा हो जाता है, कि फिर प्रभुता कभी उन्हें मदांध नहीं कर पाती।

atal-bihari-vajpayee

कहते हैं, कोई व्यक्ति महान तभी हो सकता है, जब उससे मिलने वालों को कभी अपनी कमतरी का अहसास नहीं हो। अटल जी जैसे राजनेता की महानता इसी बात में छिपी है कि उनसे मिलने वाले किसी भी इंसान को कभी नहीं लगा होगा कि वह कहीं से भी कम महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ के मख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जी के कक्ष में लिखा वाक्य ‘आप मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं’ की प्रेरणा भी निस्संदेह अटल जी के व्यक्तित्व से ही ली गयी होगी। बहरहाल।

अटल जी के अन्य अवदान को छोड़कर अगर केवल साहित्य के उनके योगदान का ही जिक्र किया जाय तो यह कहा जा सकता है कि अगर राजनीति जैसे संवेदनहीन क्षेत्र में चुटकी भर भी ‘साहित्य’ मिला दिया जाय, तो वह कितना खुबसूरत हो सकता है, अटल जी का कृतित्व इसका जीता-जागता उदाहरण है। इसके उलट साहित्य में ‘राजनीति’ की घुसपैठ समाज को कितना ज्यादा ‘असहिष्णु’ बना सकती है, वर्तमान इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। जिस तरह से आज के कथित साहित्यकार खुद को लांछित-अपमानित-कलंकित कर (यानी सम्मान वापस कर) भी अपनी खुन्नस निकालने से बाज़ नहीं आ रहे, विपरीत विचारों के प्रति इस हद तक असहिष्णु हैं कि उसके खिलाफ खुद का ही खंभा, खिसियानी बिल्ली की तरह नोचने को तत्पर हों, थोक के भाव में भरे पड़े ऐसे साहित्यकारों के बरक्स, मौलिक रूप से राजनीति के अटल धुरंधर लगभग जीवन भर विपक्ष की राजनीति करते हुए भी, एक से एक आक्षेप झेलते हुए भी हमेशा असहमति का मुस्कान के साथ स्वागत करते रहे। ऐसी कठिन साधना के बाद ही किसी युग को एक ऐसा नायक मिलता है, जिसे अटल बिहारी वाजपेयी कहा जाता है।

युगपुरुष, राजनेता, लोकनायक, राजर्षि, स्टेट्समैन, पत्रकार, लेखक, कवि, प्रेरक, भारत का पहरुआ, विश्व में भारत का प्रसारक, संस्कृति का अग्रदूत और इनसे भी बढ़कर रग-रग में भरे हिंदुत्व के अपने परिचय को तमगे की तरह पहने, मुकुट की तरह सजाए, उन्नत मस्तक और उभरे सीने के साथ पीड़ाओं में पलने, तूफानों से टकराने का साहस संचार करते हुए, कदम मिलाकर चलने का आह्वान करने वाले अटल जी लोकतांत्रिक भारत के इतिहास को एक अनोखा और अद्भुत उपहार हैं।

राजनीति में साहित्य का चितेरा, विचारधारा में असहमति का रखवाला, संगठन में अपनेपन का झंडाबरदार, दल में दिल की बात करने वाला हीरो, साहित्य में सहिष्णुता का राजदूत… ऐसे तमाम विशेषण इस महानायक के लिए ज़रा कम ही साबित हो रहे हैं। साहित्य के नाम पर राजनीति करने वाले आज के अधिकांश कुंठित बुद्धिजीवियों के लिए राजनीति के क्षेत्र इस देदीप्यमान नक्षत्र का जीवन सन्देश की तरह ही है, बशर्ते अपने ज्ञान का अभिमान ताक पर रखकर इस सन्देश को ग्रहण करने की पात्रता अपने भीतर ले आयी जाय।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

 

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