यूपी चुनाव : भाजपा को रोकने की बेबसी का नाम ‘महागठबंधन’

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अब बमुश्किल दो-तीन महीने शेष हैं, ऐसे में सूबे के सभी राजनीतिक दलों द्वारा अपनी-अपनी राजनीतिक बिसात बिछाकर चालें चली जाने लगी हैं। सत्तारूढ़ सपा जहाँ अपने अंदरूनी कलह के बावजूद अखिलेश को विकास पुरुष के रूप में पेश करने में लगी है, वहीं बसपा सपा शासन की खामियाँ गिनवाने और बड़े-बड़े वादे करने में मशगूल है। कांग्रेस दिल्ली से शीला दीक्षित जैसे बड़े चेहरे को प्रदेश की राजनीति में पहले से ही उतार चुकी है। लेकिन, इन सभी दलों पर भाजपा की परिवर्तन यात्रा भारी पड़ती दिख रही है। भाजपा-नीत केंद्र की मोदी सरकार द्वारा पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर काले धन पर नोटबंदी के रूप में की गयी सर्जिकल स्ट्राइक तक के निर्णयों से जनता का रुख भाजपा की तरफ दिख रहा है। इसका सबूत परिवर्तन यात्रा की रैलियों में उमड़ने वाले भारी जनसमूह के रूप में देखा जा सकता है। प्रदेश में भाजपा की इस लहर से भयभीत सपा, कांग्रेस और रालोद ने अब महागठबंधन का शिगूफा छेड़ दिया है। हालांकि अभी इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि तो नहीं हुई है, मगर खबर है कि इस महागठबंधन में कांग्रेस और रालोद को सौ-सौ तथा शेष सीटें समाजवादी पार्टी को मिलने की संभावना है। अभी ये सिर्फ खबर है, लेकिन निश्चित रूप से अगर महागठबंधन हुआ तो उसका स्वरूप इससे अधिक भिन्न नहीं होगा। ज्यादा से ज्यादा सीटें सपा के पास ही रहेंगी, जबकि कम से कम सीटें कांग्रेस को दी जाएंगी।

कांग्रेस उम्मीद कर रही होगी कि ये महागठबंधन भी बिहार जैसा असर करेगा, लेकिन लगता नहीं कि ये उम्मीद पूरी होगी। क्योंकि, एक तो यहाँ भाजपा की रैलियों में उमड़ने वाला जनसमर्थन अपने पूरे शबाब पर है, वहीं बसपा जैसा एक और खिलाड़ी मैदान में है, इसलिए महागठबंधन के लिए लड़ाई आसान नहीं होगी। और आखिर में, महागठबंधन की ताकत जातिगत समीकरण हैं, जो कि एक तुक्के की तरह है और तुक्का हर बार नहीं लगता। वैसे भी, सपा-बसपा के शासन से यूपी की जनता ऊब ही चुकी होगी, इसलिए पूरी संभावना है कि वो नये विकल्प का रुख करेगी, जो कि सिर्फ और सिर्फ भाजपा ही दिखती है। इसलिए ये महागठबंधन अगर बनता है, तो भी भाजपा को रोकने का बूता इसमें नज़र नहीं आता।

विचार करें तो महागठबंधन की बात चलना दिखाता है कि प्रदेश के इन दलों को इसबार विधानसभा चुनाव में अपनी हैसियत का अंदाज़ा लग गया है। वर्ना जिस सपा को पिछले चुनाव में जनता ने पूर्ण बहुमत दिया था, वो अबकी आधी सीटें दो अन्य दलों में बांटने के लिए चर्चा क्यों करती ? इसका सिर्फ एक ही अर्थ है कि मुलायम यादव को ज़मीन का खिसकाना महसूस होने लगा है। उन्हें दिखने लगा होगा कि कैसे एक तरफ मुज़फ्फरनगर के पीड़ित ठंढ में बदहाल हो रहे थे और दूसरी तरफ उनकी सरकार सैफई में महोत्सव रचाए बैठी थी। उन्हें यह भी याद आ रहा होगा कि कैसे एक इखलाक के मरने पर उनकी सरकार ने बिना बात मुआवजों की बरसात कर दी थी, वहीं एक शहीद जवान के परिवार को मुआवज़े की रक़म में थोड़ा इजाफा करवाने के लिए सपा सरकार के सामने धरना देना पड़ा था। प्रदेश में अपराध का तांडव तो खैर उनकी नज़रों के सामने ही है। तो मुलायम यादव समझ रहे होंगे कि पांच साल के इस कुशासन का प्रतिफल चुनाव में मिलना तय है, जो कि उनकी भयानक पराजय के रूप में होगा। इसीलिए वे महागठबंधन जैसी कवायदों से उस हार को टालने की कोशिशों में लगे हैं। हालांकि ये कोशिशें कामयाब होंगी या नहीं, ये वक़्त ही बताएगा, मगर जनता का मिजाज़ तो सपा सरकार के खिलाफ और मोदी लहर के साथ ही नज़र आ रहा है।

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बहरहाल, सबसे अधिक दुर्दशा तो कांग्रेस की है। एक ऐसी पार्टी जिसने देश पर लगभग छः दशक से अधिक समय तक शासन किया और प्रदेश में भी लम्बे समय तक शासन में रही, उस कांग्रेस की आज यह हालत हो गई है कि सपा जैसी एक क्षेत्रीय पार्टी से ऐसा गठबंधन करने को मजबूर हो रही, जिसमें कि उसे सौ सीटें देने को भी कोई तैयार नहीं है। लेकिन फिर भी कांग्रेस मान-मनौव्वल में लगी है कि महागठबंधन हो जाए। स्पष्ट है कि कांग्रेस आज अपने बेहद बुरे दौर में पहुँच चुकी है। कांग्रेस को उम्मीद होगी कि ये महागठबंधन भी बिहार जैसा असर करेगा, लेकिन लगता नहीं कि ये उम्मीद पूरी होगी। क्योंकि, एक तो यहाँ भाजपा की रैलियों में उमड़ने वाला जनसमर्थन अपने पूरे शबाब पर है, वहीं बसपा जैसा एक और खिलाड़ी मैदान में है, इसलिए महागठबंधन के लिए लड़ाई आसान नहीं होगी। और आखिर में, महागठबंधन की ताकत जातिगत समीकरण हैं, जो कि एक तुक्के की तरह है और तुक्का हर बार नहीं लगता। वैसे भी, सपा-बसपा के शासन से यूपी की जनता ऊब ही चुकी होगी, इसलिए पूरी संभावना है कि वो नये विकल्प का रुख करेगी, जो कि सिर्फ और सिर्फ भाजपा ही दिखती है। इसलिए ये महागठबंधन अगर बनता है, और उम्मीद है कि बन जाएगा, तो भी भाजपा को रोकने का बूता इसमें नज़र नहीं आता। इस बार यूपी की जनता का मिजाज़ बड़े ‘परिवर्तन’ का दिख रहा है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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