अपने पचास दिनों में हर तरह से लाभकारी रही है नोटबंदी

नोटबंदी के पचास दिन पूरे हो चुके हैं। बीते 8 नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन में पांच सौ और एक हजार के नोटों को चलन से बाहर करने का निर्णय सुनाया था। निश्चित रूप से यह फैसला देश में छुपे काले धन और नक़ली नोटों के कारोबार पर सर्जिकल स्ट्राइक की तरह था। अतः आम जनता द्वारा इसका खुलकर स्वागत किया गया और नोट बदलवाने के लिए कतारों की मुश्किल से दो-चार होने के बावजूद आम लोग इस निर्णय का समर्थन करते नज़र आए, जबकि विपक्ष सरकार के इस निर्णय के खिलाफ एकदम लामबंद दिखा। मगर, इससे जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उसका समर्थन समर्थन नोटबंदी के बाद हुए मध्य प्रदेश, असम, अरुणाचल प्रदेश आदि राज्यों की रिक्त सीटों पर हुए उपचुनावों और फिर गुजरात, महाराष्ट्र तथा चंडीगढ़ के निकाय चुनावों के परिणामों में स्पष्ट रूप से देखने को मिला। जनता ने सत्तारूढ़ भाजपा को इन सब चुनावों में विजयी बनाया। लेकिन, इतने के बाद भी विपक्ष का मन नहीं भरा और वो नोटबंदी के अतार्किक विरोध के अपने एजेंडे पर कायम रहा। संसद का पूरा शीतकालीन सत्र विपक्षी दलों ने नोटबंदी के विरोध में हंगामा करके बर्बाद कर दिया।

अब नोटबंदी के पचास दिन पूरे होने पर केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने तथ्यों के साथ नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था से लेकर कृषि तक की स्थिति को स्पष्ट कर दिया है। वित्तमंत्री ने बताया कि नोटबंदी के बाद प्रत्यक्ष कर-संग्रह में 14.4 प्रतिशत और अप्रत्यक्ष कर-संग्रह में 26.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अप्रत्यक्ष कर संग्रह की इस वृद्धि का सीधा अर्थ है कि नोटबंदी से बाज़ार पर कोई फर्क नहीं पड़ा है, वो अपनी लय में चलता रहा। कृषि क्षेत्र की बात करें तो वित्तमंत्री के अनुसार, रबी की फसल की बुवाई में गत वर्ष की अपेक्षा इस बार 6.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज़ की गयी है। बीजों की बिक्री में भी इजाफा हुआ है। इसके बाद ये मानने का कोई ठोस आधार नहीं दिखता कि नोटबंदी ने किसानों या कृषि पर कोई नकारात्मक प्रभाव डाला है, बल्कि यहाँ तो स्थिति सुधरी ही नज़र आ रही है।

विपक्षी दलों का कहनाम था और अब भी है कि नोटबंदी से आम आदमी को तकलीफ हो रही है और देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी। अपने शासन भर में किसानों की खैरो-खबर नहीं लेने वाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी को किसानों की चिंता सताने लगी। नोटबंदी से खेती के बर्बाद होने की बात भी कही गयी। हालांकि विपक्षियों के पास सिर्फ हवा-हवाई बातें थीं, उनके पक्ष में कोई तथ्य वे नहीं पेश कर सके। लेकिन, अब नोटबंदी के पचास दिन पूरे होने पर केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने तथ्यों के साथ नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था से लेकर कृषि तक की स्थिति को स्पष्ट कर दिया है।

वित्तमंत्री ने बताया कि नोटबंदी के बाद प्रत्यक्ष कर-संग्रह में 14.4 प्रतिशत और अप्रत्यक्ष कर-संग्रह में 26.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अप्रत्यक्ष कर संग्रह की इस वृद्धि का सीधा अर्थ है कि नोटबंदी से बाज़ार पर कोई फर्क नहीं पड़ा है, वो अपनी लय में चलता रहा।  साथ ही, कर संग्रह की इस वृद्धि से देश की राजकोषीय स्थिति में भी सुधार आने की संभावना है। बैंकों के पास पैसा जुटने से अब वे क़र्ज़ देने के लिए और अनुकूल स्थिति में आ चुके हैं। कृषि क्षेत्र की बात करें तो वित्तमंत्री के अनुसार, रबी की फसल की बुवाई में गत वर्ष की अपेक्षा इसबार 6.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज़ की गयी है। बीजों की बिक्री में भी इजाफा हुआ है। इसके बाद ये मानने का कोई ठोस आधार नहीं दिखता कि नोटबंदी ने किसानों या कृषि पर कोई नकारात्मक प्रभाव डाला है, बल्कि यहाँ तो स्थिति सुधरी ही नज़र आ रही है। इसके अलावा जीवन बीमा और पेट्रोलियम आदि के क्षेत्र में भी कारोबार में बढ़ोत्तरी ही हुई है। इस प्रकार स्पष्ट है कि नोटबंदी से देश के अर्थतंत्र पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है और विपक्ष के दावों की हवा निकल गयी है।

नोटबंदी से निश्चित रूप से काले धन पर अंकुश लगेगा। अभी जो पैसा बैंकिंग प्रणाली में आ गया है, अब वो घोषित संपत्ति है अर्थात देश की संपत्ति है। उसका देश के विकास में उपयोग किया जा सकता है। साथ ही, नकदी रहित अर्थव्यवस्था इस नोटबंदी का एक अतिरिक्त लाभ हो सकती है। इस दिशा में सरकार बहुत अधिक गंभीर दिख रही है, अतः उम्मीद की जानी चाहिए कि कुछ ही समय में नकदी रहित अर्थव्यवस्था की तरफ हमारे कदम  तेजी से बढ़ने लगेंगे।  देश में मौजूद सारा नकदी काला धन समाप्त हो चुका है, नये सिरे से काला धन एकत्रित करना अब आसान नहीं होगा, क्योंकि सरकार काला धन धारकों से एक कदम आगे चल रही है। नये नोटों का लगातार पकड़ा जाना यही दिखाता है।

इन सब बातों को देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि पचास दिन पूरे होने के बाद मोदी सरकार का नोटबंदी का निर्णय हर तरह से लाभकारी ही नज़र आ रहा है। ये देश, समाज और व्यवस्था सबके लिए आवश्यक हो चुका कदम था। सरकार यानी तंत्र ने साहस दिखाया और लोक ने उस साहस के महत्व को समझते हुए उसे अपना समर्थन दिया, इस तरह नोटबंदी के निर्णय में लोकतंत्र भी अपने वास्तविक अर्थों में चरितार्थ हुआ है। यह देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।  ये उनके निजी विचार हैं।)

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