परिवारवादी राजनीति के दौर में जनहितकारी राजनीति की उम्मीद जगाती भाजपा

जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी को समान अधिकार, अवसर की समानता जैसी बातें संविधान में वर्णित की गई हो, ऐसे देश में अगर राजनीति के क्षेत्र में परिवारवाद की जड़ें इतनी गहरे तक जम जाएं कि राष्ट्रीय राजनीति से लेकर क्षेत्रीय राजनीति तक इसकी विषबेल पसरने लगे तो इससे बड़ी विडाबंना कोई और नहीं हो सकती। ऐसे में, समान अधिकार दिलाने वाला संवैधानिक ढ़ांचा ही कही न कही कमजोर पड़ जाता है या फिर उसे अपनी सहूलियत के अनुसार परिवारवादी राजनीति करने वाली पार्टियॉ ढाल लेती हैं, जिसमें उनके लिए अपने पारिवारिक हितों और उद्देश्यों की पूर्ति ही एकमात्र लक्ष्य रह जाता है।

कांग्रेस आदि परिवारवादी राजनीति करने वाली पार्टियों से ऊब चुकी जनता अब भाजपा की स्वच्छ और वंशवादिता से मुक्त राजनीती को पसंद कर रही है। लोकसभा चुनाव तथा उसके बाद हुए अधिकांश विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिलने वाली विजयश्री कहीं न कहीं इसी जनसमर्थन की द्योतक है। इसके अलावा आगामी यूपी विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को भरपूर समर्थन मिलता दिख रहा है, जिसकी बानगी उसकी परिवर्तन रैलियों में उमड़ने वाले जनसैलाब के रूप में देखी जा सकती है कहने का आशय ये है कि परिवारवादी राजनीति से त्रस्त जनता को भाजपा में उम्मीद दिख रही है और कहीं न कहीं भाजपा इस उम्मीद पर खरी भी उतरी है, तभी तो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात  आदि राज्यों में उसकी सरकारों की  बार-बार वापसी होती रही है।

बात चाहे उत्तरप्रदेश के समाजवादी कुनबे की हो, या पंजाब के अकाली दल और बिहार के लालू यादव खेमे की हो अथवा राष्ट्रीय पार्टी के तमगे से सुशोभित कांग्रेस पार्टी की, हर तरफ परिवारवादी राजनीति की विषबेल लोकतान्त्रिक व्यवस्था को दूषित करने में लगी है। चुनावी एजेंडे में बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, मगर फिर ये राजनीतिक दल यह कहां से भूल जाते है, कि जब उनके दल में ही सामान्य लोगों को आगे बढ़ने के लिए स्थान नहीं है, वो अपने शासन में कैसे सबको समान रूप से अवसर देंगे।

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कांग्रेस की परिवारवादी राजनीति

लोकतंत्र में व्यवस्था की गई है, कि सबको स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ने का मौका मिला चाहिए, फिर वह चाहे राजनीति हो, या कोई दूसरा क्षेत्र, लेकिन भारतीय लोकत्रंत्र की परिपाटी में  कांग्रेस जैसी पार्टी जिसका उदय एक दबाव समूह के रूप में 1885 के दौर में हुआ, देश की आजादी के बाद से एक परिवार-विशेष की थाती बनकर रह गई है। फिर भारतीय संविधान और लोकतंत्र की व्यवस्था दमघोंटू बीमारियों से ग्रसित नजर आता है, जिसके शासन व्यवस्था में संविधान का निर्माण किया गया, वही आगे चलकर देश को पारिवारिक राजनीति साधने का गुर सिखाती मालूम होती है। देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है।

पिछले दो दशक से क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर पारिवारिक छवि को राजनीति में बढ़ावा देने का चलन काफी तेजी से बढ़ रहा है। उत्तरप्रदेश में सपा, बिहार में राजद, हरियाणा में भजनलाल परिवार, जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार ऐसे कुछ नाम है, जो परिवारवादी राजनीति से ग्रस्त नज़र आते हैं। ऐसे ही और भी कई दल हैं। इन राज्यों में समस्याओं और मुसीबतों की एक बानगी खड़ी प्रतीत होती है, लेकिन इन पार्टियों का एक निश्चित उद्देश्य अपने परिवार को अपनी सियासी विरासत देकर अपना हित साधना है। कहने का अर्थ यह है, कि किसी भी तरीके से सत्ता की साधना ही इनका परमोद्देश्य है।

परिवारवादी राजनीति से ग्रस्त प्रदेशों की स्थिति का अवलोकन किया जाय, तो ज्यादातर राज्यों में बेरोजगारी, भुखमरी, चिकित्सा सुविधाओं का अभाव व्यापक पैमाने पर व्याप्त है, लेकिन वहाँ की सरकारें न तो राजनीति में सामान्य लोगों को आगे बढ़ने का मौका दे पाती हैं और न ही प्रदेश की दुविधाओं से जनता को निजात दिलाने में सफल होती दिखती  है।

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समाजवादी खेमे का परिवारवाद

उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों पर  आजादी के शुरूआती समय से ही बीमारू राज्य होने का तमगा चस्पा होता आ रहा है और आज भी स्थितियॉ सामान्य नहीं कही जा सकती हैं। उत्तरप्रदेश में शिक्षा का स्तर और शिक्षकों की भारी कमी है, लोकतंत्र पर राजशाही हावी दिखाई पड़ती है। लोगों के लिए समुचित विकास की सुविधा न के बराबर दिखाई पड़ती है। राजनीतिक दलों की नीतियॉ और सिद्वांत सभी कोरे कागज ही साबित होते है, क्योंकि कोई समाजवाद की सियासत करता है, तो कोई लोकतंत्र के अनुरूप अपनी सियासी पार्टियों को चलाता है, लेकिन वास्ताविकता में ये सारी बातों और तथ्यों का कोई आधार मिलता नहीं दिखता है। वर्तमान में उत्तरप्रदेश में संघर्ष पारिवारिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर ही व्याप्त है। सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में मौजूद परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी ढपली पीटते हुए नजर आ रहें हैं। परिवारवाद की सियासी कड़ी खुद में ही उलझती नजर आ रही है, राजनीतिक महत्वाकांक्षा इस क़दर हावी है कि इनमें आपस में ही दो फाड़ होता नज़र आ रहा है।

वैसे, उपर्युक्त परिवारवादी राजनीति की घोर समस्या के बावजूद केंद्र व देश के कई राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है, जो परिवारवादी राजनीति के कुचक्र से पूर्णतः मुक्त है। यह एक बड़ा कारण है कि कांग्रेस आदि परिवारवादी राजनीति करने वाली पार्टियों से ऊब चुकी जनता अब भाजपा की स्वच्छ और वंशवादिता से मुक्त राजनीती को पसंद कर रही है। लोकसभा चुनाव तथा उसके बाद हुए अधिकांश विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिलने वाली विजयश्री कहीं न कहीं इसी जनसमर्थन की द्योतक है। इसके अलावा आगामी यूपी विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को भरपूर समर्थन मिलता दिख रहा है, जिसकी बानगी उसकी परिवर्तन रैलियों में उमड़ने वाले जनसैलाब के रूप में देखी जा सकती है कहने का आशय ये है कि परिवारवादी राजनीति से ऊबी जनता को भाजपा में उम्मीद दिख रही है और कहीं न कहीं भाजपा इस उम्मीद पर खरी भी उतरी है, तभी तो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात  आदि राज्यों में उसकी सरकारों की  बार-बार वापसी होती रही है। यह परिवारवादी राजनीति में पिसते भारतीय लोकतंत्र के लिए आशा और संतोष की बात है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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