बरकती के फतवे से सवालों के घेरे में ममता सरकार और वामपंथी बुद्धिजीवी

कोलकाता के एक मस्जिद के कथित शाही इमाम बरकती ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ फतवा जारी किया । बरकती ने बकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस में अपमानजनक फतवा जारी किया जिसके पीछे बैनर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बड़ी-सी तस्वीर लगी थी । बरकती ने हिंदी और अंग्रेजी में अपमानजनक फतवा जारी किया । यह मानना मेरे लिए मुमकिन नहीं है कि इस मसले की जानकारी पुलिस को नहीं होगी या जिस वक्त देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ फतवा जारी किया जा रहा था, उस वक्त वहां पुलिस मौजूद नहीं रही होगी । अगर ऐसा था तो पुलिस ने उसी वक्त बरकती के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की । अगर किसी कारणवश उस वक्त कार्रवाई नहीं हो पाई तो क्या बाद में कोई कार्रवाई की गई । अबतक तो ज्ञात नहीं है । तो क्या ये मान लिया जाए कि बरकती ने वो फतवा राज्याश्रय के तहत किया । प्रत्यक्ष ना सही परोक्ष रूप से बरकती के उस कदम को सूबे की सरकार का समर्थन हासिल था । बरकती और ममता बनर्जी की सियासी नजदीकियां जगजाहिर हैं और अपने इस राजनीतिक संबध को बरकती सार्वजनिक रूप से जाहिर भी कर चुके हैं । इससे इस बात का अंदेशा तो बढ़ता ही है कि ममता बनर्जी के इशारे पर बरकती ने ये काम किया है । अगर उनके इशारे पर नहीं भी किया तो जिस तरह से पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की उससे तो ये साफ पता चलता है कि कहीं ना कहीं से बरकती इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि प्रधानमंत्री के खिलाफ फतवा देने के बाद भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी ।

बरकती के इस फतवे से कई सवाल खड़े होते हैं । पहला सवाल तो राज्य सरकार पर ही खड़ा होता है । दूसरा सवाल खड़ा होता है कि इस तरह के धर्मगुरुओं को सियासत में सीधे तौर पर उतरना चाहिए ? किसी मस्जिद के सदर को प्रधानमंत्री के खिलाफ उकसाने का हक किसने दिया । तीसरा सवाल उठता है उन बुद्धिजीवियों पर जो हर बात पर छाती कूटते रहते हैं । उन बुद्धिजीवियों पर जो भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महाराज जैसे लोगों के बयान पर तो शोर-शराबा करते हैं, लेकिन बरकती जैसों की इन हरकतों पर खामोश रह जाते हैं ।

इस्लाम में किसी फैसले या फरमान को  फतवा कहते हैं । इसकी एक प्रक्रिया होती है कि कोई भी मुसलमान अपने मजहबी मसले को लेकर हाकिम के सामने पेश होता है और वो मजहबी हाकिम उसपर अपना फैसला सुनाता है । बरकती के फतवे के मसले में भी ये जानना दिलचस्प होगा कि प्रधानमंत्री मोदी को लेकर क्या मजहबी विवाद था या फिर किसने फतवे की अर्जी दी थी । शाही इमाम बरकती को इस मसले को साफ करना चाहिए । इस मसले की मांग तो मुस्लिम बुद्धिजीवी की तरफ से भी की जानी चाहिए कि बरकती ने किस मजहबी विवाद को सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ फतवा जारी किया क्योंकि इस्लाम में फतवे की बड़ी भूमिका है । वो संचित होते रहते हैं ताकि भविष्य में इस तरह के मसलों पर राय दी जा सके । फतवे जो हैं वो मुस्लिम उम्मते के लिए लिटरेचर बन जाते हैं जिसका उपयोग स्थानीय स्तर तक किया जाता है । जब भी मुस्लिम समुदाय के बीच किसी तरह का विवाद होता है तो लोग स्थानीय मौलवी के पास जाते हैं, इस वक्त वो मौलवी मजहबी हाकिम के फतवों का सहारा लेकर विवाद सुलझाने की कोशिश करता है । इस संदर्भ में यह जानना और जरूरी है कि बरकती ने किसकी शंका पर फतवा जारी किया । तीन तलाक के मुद्दों पर जिस तरह से कुछ मुस्लिम संगठन विरोध कर रहे हैं उनका आधार ये फतवे ही हैं । तीन तलाक को लेकर तरह तरह के फतवे दिए गए हैं जो विरोधाभसी हैं ।

ममता बनर्जी और बरक़ती

बरकती के इस फतवे से कई सवाल खड़े होते हैं । पहला सवाल तो राज्य सरकार पर ही खड़ा होता है जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है । दूसरा सवाल खड़ा होता है कि इस तरह के धर्मगुरुओं को सियासत में सीधे उतरना चाहिए । किसी मस्जिद के सदर को प्रधानमंत्री के खिलाफ उकसाने का हक किसने दिया । तीसरा सवाल उठता है उन बुद्धिजीवियों पर जो हर बात पर छाती कूटते रहते हैं । उन बुद्धिजीवियों पर जो भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महाराज जैसे लोगों के बयान पर तो शोर शराबा करते हैं, लेकिन बरकती जैसों की इन हरकतों पर खामोश रह जाते हैं । जिन बुद्धिजीवियों को तमिलनाडू से लेकर केरल तक, महाराष्ट्र से लेकर गुजरात तक ये लगता है कि लेखकों की अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरा लगा दिया गया है, वो बुद्धिजीवि बरकती के फतवे पर खामोश हैं । साध्वी प्राची जैसी महिला जो भारतीय जनता पार्टी से नहीं जुड़ी है, उसके बयान के आधार पर प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा लोग इस वक्त खामोश क्यों हैं, असहिष्णुता के मुद्दे पर डंडा-झंडा लेकर शोरगुल करनेवाले लोग इस वक्त कहां हैं ।

अब अगर हम सवाल दर सवाल इनके जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं तो चौंकानेवाली तस्वीर सामने आती है । अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने धर्म के आधार पर वोट मांगने को लेकर सख्त निर्णय दिया है । बरकती के इस फतवे के बाद सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले को व्याख्यायित करने की जरूरत है । क्या धर्म के नाम पर प्रत्यक्ष रूप से वोट मांगना ही गलत है या फिर परोक्ष रूप से भी सियासी फायदा लेना गलत है । पश्चिम बंगाल में करीब अट्ठाइस फीसदी मुसलमानों के वोट हैं । इन्हीं वोटों के चक्कर में पश्चिम बंगाल में बरकती जैसी शख्सियतों को बढ़ावा दिया जाता है । इन्हीं मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में वामपंथी सरकारों से लेकर ममता बनर्जी सरकार तक तस्लीमा नसरीन को कोलकाता से निर्वासित कर देती है । तुष्टिकरण की इस नीति के खिलाफ भी कभी सहिष्णु बुद्धिजीवियों ने कुछ बोला, लिखा हो, ऐसा ज्ञात नहीं है । वामपंथ में आस्था रखनेवाले बौद्धिकों का ये दोहरा चरित्र बेहद खतरनाक है क्योंकि इसका असर सियासत पर तो पड़ता ही है, साहित्य को भी ये गहरे तक प्रभावित करता है । पाठकों को लगता है कि उसका नायक, जो लेखक होता है, ईमानदार नहीं है । जब पाठक इस तरह की प्रवृत्ति को लक्षित करता है तो उसका भरोसा लेखकों से उठने लगता है जो आगे चलकर साहित्य को भी प्रभावित करता है ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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