चन्द्रगुप्त : पंडित दीनदयाल उपाध्याय कृत एक नाटक जो राष्ट्रवाद को परिभाषित करता है

भारत के राजनीतिक इतिहास के पितृ पुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक राजनेता के साथ-साथ कुशल संगठक तथा मूर्धन्य साहित्यकार भी थे। साहित्य की हर विधा पर उनकी समान पकड़ थी। कहानी, नाटक, रिपोर्ताज, कविता और यात्रा वृतांत में उनको महारत हासिल था। ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाएंगे जो उक्त बातों की पुष्टि करते हैं। उनके साहित्य-सृजन की कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण स्थान ‘चंद्रगुप्त’ का है। नाट्य विधा में लिखित यह पुस्तक हिंदी साहित्य की उत्कृष्ट धरोहर है। पंडित जी ने इस नाटक के माध्यम से चंद्रगुप्त को केन्द्र में रखकर राष्ट्रपे्रम को रेखांकित किया। चंद्रगुप्त के रूप में एक ऐसे नायक को गढ़ा जो राष्ट्रवाद का पर्याय था। पंडित जी की इस कृति को रचने के पीछे एक प्रेरणा थी।

बात उन दिनों की है जब पंडित जी उत्तर प्रदेश के सह प्रांत प्रचारक थे। एक दिन बैठक के दौरान तत्कालीन प्रांत प्रचारक पुज्य श्री भाऊराव  देवरस ने चिंता व्यक्त की कि शाखाओं में बाल स्वयंसेवक तो आते हैं, लेकिन हमारे विचार बाल-सुलभ भाषा में उपलब्ध नहीं हैं। वास्तव में बाल-साहित्य की बहुत आवश्यकता है। पंडित जी ने इस बात को बहुत गंभीरता से लिया और पूरी रात जागकर लिखते रहे, अगले दिन सुबह पुज्य भाऊराव देवरस को अपनी कृति सौंपते हुए बोले देखिए बाल स्वयंसेवकों के लिए यह पुस्तक कैसी रहेगी?। यह उनकी पहली पुस्तक थी जो 1946 में प्रकाशित हुई थी।

दरअसल इस पुस्तक की रचना का उद्देश्य बाल स्वयंसेवकों में राष्ट्र की भावना को जागृत करना था। पंडित जी ने इस नाटक के माध्यम से कई लक्ष्यों को साधने की कोशिश की। एक तो बाल स्वयंसेवकों को पढ़ने के प्रति ललक पैदा हो, और जब वो पढ़ने के लायक हो जाएं तो उनको अपनी जिम्मेदारियों को भान हो।  इस उपन्यास के माध्यम से कुशल मार्गदर्शन की बुनियाद भी गढ़ी गयी थी और जीवन में योग्य व्यक्ति का मार्ग दर्शन करने के लिए प्रेरित भी किया गया था।

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इस नाटक का सारा तथ्य ऐतिहासिक और प्रमाणिक है, पंडित जी ने बस उसमें भाषा की संजीवनी डालने का काम किया है। उन्होंने चंद्रगुप्त के चरित्र में राष्ट्रवाद का रंग भरके एक ऐसा नायक तैयार करने की कोशिश की जो आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनने का काम करे। इस नाटक में कहीं दरबारी भाषा का उपयोग नहीं किया गया है, जैसा कि कालांतर में अपने सामंतो को खुश करने के लिए कवियों और लेखकों द्वारा किया जाता रहा है। पंडित जी इस विधा के माध्यम से राष्ट्रवाद को उकेरने की कोशिश किए हैं। एक सैनिक जो अपने राज्य के प्रति सोचता था, उसके मन में राष्ट्रप्रेम की भावना कहां से जागृत हुई, इसी तथ्य को उकेरने की कोशिश की गयी है। क्योंकि, पंडित जी का भी कहना था कि सच्चा सामर्थ्य राज्य में नहीं राष्ट्र में ही रहता है। वे अक्सर कहा करते थे कि ‘‘राष्ट्रीय समाज राज्य से बढ़कर है, इसलिए हमारे लिए राष्ट्र आराध्य होना चाहिए। सच्चा सामर्थ्य राज्य में नहीं राष्ट्र में ही रहता है, इसलिए जो राष्ट्र के प्रेमी हैं, वे राजनीति के उपर राष्ट्रभाव की आराधना करते हैं। राष्ट्र ही एकमेव सत्य है।’ इस सत्य की उपासना करना सांस्कृतिक कार्य कहलाता है। राजनीतिक कार्य भी तभी सफल हो सकते हैं, जब इस प्रकार के प्रखर राष्ट्रवाद से युक्त सांस्कृतिक कार्य की शक्ति उसके पीछे सदैव विद्यमान रहे।’’

इस कृति में उक्त बातें पंडित जी ने अपने अन्य पात्र चाणक्य के माध्यम से कहलवाने की कामयाब कोशिश की है। नाटक के प्रारंभ में पडित जी भारत के संपन्नता का वर्णन करते हुए वर्तमान से तुलना करते हैं। नाटक के अनुसार उस समय अकेले मगध साम्राज्य के पास इतना धन था कि अगर पूरी दुनिया में बांटा जाता तो हर व्यक्ति के हिस्से 50 लाख आते और केवल भारत में इसको बांटा जाता तो हर व्यक्ति के हिस्से ढाई करोड़ रुपया आता।

भारतीय इतिहास में चंद्रगुप्त एक ऐसा पात्र था जो एक साधारण सैनिक से मगध का राजा बना और एक आदर्श राजा का प्रतिमान स्थापित किया। एक ऐसे राज्य को अपने रणकौशल से डूबने से बचाया जो अपने राजा के  ऐयाशियों की वजह से गर्त में जा रहा था। पंडित जी चंद्रगुप्त की व्याख्या करते हुए लिखते हैं, ‘‘वह ऐसा समय था जब अत्मसम्मान की रक्षा करने वाले और उसको मिटाने वालों में स्वाभाविक ही संघर्ष छिड़ गया। जगह-जगह आकाश की ओर उठने वाले धुएं ने बताया कि अंदर आग सुलग रही है। लोगों ने इसी धूम्रपुंज में उठते हुए एक भव्य मुर्ति को देखा। यही है हमारा शासक चंद्रगुप्त मौर्य।’’। नाटक के दूसरे खंड में पंडित जी ने चंद्रगुप्त के गुरु चाणक्य और शीलभद्र के बीच हुए वार्तालाप के माध्यम से राष्ट्रवाद की जो परिभाषा दी है, वह अनुकरणीय है। शीलभद्र कहते हैं, ‘यह असत्य भाषण मैं कैसे करूंगा आर्य’’ उस पर जो चाणक्य ने कहा वह प्रखर राष्ट्रवाद का सबसे जीवंत उदाहरण है, उन्होंने कहा ‘यह समय सत्य और असत्य विचारने का नहीं है, वत्स! आज अगर तुम इस असत्य को लेकर बैठ जाओगे तो कल पूरे मगध पर यवनों का अधिपत्य हो जाएगा’’ राष्ट्रवाद की इससे जीवंत परिभाषा कुछ हो ही नहीं सकती, जो पंडित जी ने अपने पात्र चाणक्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है।

यह केवल नाटक नहीं बल्कि राष्ट्रवाद की वह प्राथमिक पाठशाला है, जिससे होकर गुजरने वाले हर विद्यार्थी के मन में राष्ट्रवाद प्रबल हो जाएगा तथा वह हर समय राष्ट्र की रक्षा और समाज के उन्नयन के बारे में ही विचार करेगा।

(स्त्रोतः-दीनदयालय संपूर्ण वाड्मय,राष्ट्र जीवन की दिशा, राष्ट्र चिंतनःपंडित दीनदयाल उपाध्याय)

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