कश्मीर में उखड़ने लगे अलगाववादियों के पाँव

जम्मू-कश्मीर  की कहानी किसी से छुपी नहीं है, मगर बदलते दौर में सुधार की गुंजाईश भी इस राज्य में बढ़ी है, जिसकी बानगी हमे अलगाववादी खेमों के घटते जनसमर्थन के रूप में देखने को मिल रही है। हाल ही में अलगाववादियों ने अपना हड़ताली कैलेंडर जारी किया जिसमे उन्होंने २६ जनवरी को कश्मीर में यौम-ए-स्याह के तहत सिविल कर्फ्यू लागू करने की बात की, जिससे गणतंत्र दिवस को काले दिन के रूप में प्रदर्शित किया जा सके। इसके साथ ही ३१ जनवरी तक हर शुक्रवार को कश्मीर-बंद करने की अपील जनता से की। लेकिन, यह कैलंडर उनके पिछले हड़ताली कैलेंडरों की तुलना में काफी संक्षिप्त है और  सुरक्षा विशेषज्ञों की मानें तो इसकी संक्षिप्तता दिखाती है कि सूबे में अलगाववादियों का समर्थन घट रहा है।

अलगाववादियों ने राज्य में स्कूलों को  जलाने और हिंसा फ़ैलाने के अलावा कोई काम कश्मीर के लोगो के लिए नही किया है और यह बात अब कश्मीर के लोगो के ज़हन में उतर चुकी है, जिस कारण वे अब २ दिन का बंद भी स्वीकारने को तैयार नही हैं। इस कारण अब अलगाववादियों ने अपने हड़ताली कैलेण्डर को अत्यंत सीमित रखा है। उम्मीद तो यह जताई जा रही है कि लोगो के विरोध के चलते वे २ दिन का बंद भी वापस ले सकते है, क्योंकि सूबे में अपनी भरभरा चुकी बुनियाद का एहसास उन्हें जरूर होगा।

दरअसल गत वर्ष जुलाई २०१६ में आतंकी बुरहान वानी भारतीय सुरक्षा बलों के हाथो मारा गया था जिसके बाद से ही विभिन्न अलगाववादी गुटों के नेताओं यथा मीरवाइज मौलवी, उम्र फारूख, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के अध्यक्ष मुहम्मद यासीन मालिक और कट्टरपंथी नेता सईद अली शाह गिलानी समेत अन्य अलगाववादी समूहों ने भारत विरोधी प्रदर्शन कर कश्मीर में अशांति का माहौल बनाने की कोशिश की, लेकिन वे सरकार ने उनके इस वितंडे के प्रति अत्यंत कड़ा रुख अख्तियार करते हुए सेना को उन्हें रोकने की पूरी छूट दे दी। सरकार का यह कठोर रुख कामयाब रहा और अलगाववादियों के दुर्भावनापूर्ण विरोध की कमर टूट गयी।

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जाहिर है की कश्मीर में युवा सहित अन्य वर्ग विकास की मुख्य धारा से जुड़ना चाहते है और एक बेहतर भविष्य की और अपने कदम बढ़ाना चाहते है। इस दिशा में सरकार द्वारा भी कई अच्छे प्रयास किये गये हैं, जैसे कि घाटी में बोर्ड-परीक्षा करवाना और विद्यालयों को पुनः स्थापित करना एवं सुरक्षा देना। अलगाववादियों ने राज्य में स्कूलों को  जलाने और हिंसा फ़ैलाने के अलावा कोई काम कश्मीर के लोगो के लिए नही किया है और यह बात अब कश्मीर के लोगो के जहन में उतर चुकी है, जिस कारण वे अब २ दिन का बंद भी स्वीकारने को तैयार नही हैं। इसलिए अब अलगाववादियों ने अपने हडताली कैलंडर को अत्यंत सीमित रखा है। उम्मीद तो यह जताई जा रही है कि लोगो के विरोध के चलते वे २ दिन का बंद भी वापस ले सकते है, क्योंकि सूबे में अपनी भरभरा चुकी बुनियाद का एहसास उन्हें जरूर होगा।

सीधे शब्दों में कहें तो जम्मू-कश्मीर में लोग अब यह बात समझ चुके है कि अलगाववादी नेता कट्टरपंथियों के साथ मिलकर उन्हें समाज की मुख्यधारा से विमुख करने का प्रयास क्र रहे है जो लम्बे अंतराल में उनकी जीविका एवं भविष्य के लिए घातक है और यही वजह है कि लोगो का समर्थन अब इन नेताओ की तरफ से हटने लगा है। यह एक अच्छा संकेत है। इसे जम्मू-कश्मीर मामले पर मोदी सरकार की कामयाब नीति का उदाहरण कह सकते हैं।

(लेखिका पत्रकारिता की छात्रा हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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