यूपी चुनाव : सभी दलों से अधिक मज़बूत नज़र आ रही भाजपा

यूपी चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है। आगामी ग्यारह फ़रवरी से सूबे में मतदान शुरू हो रहा है, जिसमें अब गिनती के दिन शेष हैं। इसलिए सूबे की लड़ाई में ताल ठोंक रहे सभी राजनीतिक दल अपने चुनावी व्यूह को मज़बूत बनाने और समीकरणों को पक्का करने की कोशिश में लग गए हैं। प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी सपा में महीनों से मचा पारिवारिक और राजनीतिक उठापटक का नाटक भी चुनाव की तारीख़ों के ऐलान के साथ ही एक मक़ाम पर पहुँचता नज़र आ रहा है। पार्टी और चुनाव-चिन्ह को चुनाव आयोग के जरिये अखिलेश के हवाले करवा मुलायम उन्हें सपा का सर्वेसर्वा बनवा दिए हैं। अब अखिलेश की सपा और राहुल की कांग्रेस के बीच गठबंधन की बातें भी चल रही हैं। हालांकि अभी तक तस्वीर साफ़ नहीं हुई है, मगर इतना ज़रूर समझा जा सकता है कि इस संभावित गठबंधन को लेकर कांग्रेस सपा से अधिक उतावली है। तभी तो सपा के अनमने रुख के बावज़ूद कांग्रेस तरफ से लगातार गठबंधन होने की बात कही जा रही है। ये दिखाता है कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी जिसने छः दशक से ऊपर समय तक देश पर और आज़ादी के शुरूआती कई दशकों तक यूपी में भी शासन किया, आज ऐसी राजनीतिक दुर्दशा के दौर में पहुँच चुकी है कि उसे एक क्षेत्रीय पार्टी से सौ सीटों पर गठबंधन करने के लिए भी उसकी मान-मनौव्वल करनी पड़ रही है।

भाजपा की राजनीति का मूल एजेंडा विकास है। केंद्र में भाजपा-नीत मोदी सरकार और देश के अन्य राज्यों की भाजपा सरकारों के विकास कार्यों को उत्तर प्रदेश की जनता के सामने रखते हुए भाजपा प्रदेश की सियासत में ताल ठोंक रही है। इस तरह, भाजपा की इस विकास की राजनीति के आगे फिलहाल प्रदेश का कोई अन्य दल टक्कर में नहीं नज़र आ रहा। अन्य दलों की जातिवादी, आरोप-प्रत्यारोप और बेमेल गठबंधन आधारित राजनीति की बजाय प्रदेश की जनता भाजपा की विकासवादी राजनीति का रुख करेगी, इसकी संभावना अधिक प्रतीत होती है।

हालत ये है कि उसके पाँच सालों के शासन के दौरान प्रदेश में अपराध, भ्रष्टाचार, गुंडाराज और दंगों का ग्राफ एकदम ऊंचाई पर रहा है, इस नाते आगामी विधानसभा चुनाव में उसके खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के चरम पर रहने की संभावना है। इस सत्ता विरोधी लहर के कारण उसे अपनी ज़मीन खिसकती महसूस हो रही है। इस कारण ही मुलायम सिंह यादव ने सपा में अंतर्कलह और अखिलेश की बगावत का पूरा नाटक रच के जनता का ध्यान सपा के कुशासन से हटाने तथा अखिलेश को एक नायक के रूप में पेश करने की कोशिश की है। मगर, लगता नहीं कि उनका यह समीकरण सध पाएगा, क्योंकि जनता में अब धीरे-धीरे चुनावी जागरूकता का विकास हो रहा है और जागरूक जनता ऐसे झांसों में नहीं आने वाली।

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बसपा की बात करें तो उसकी हालत का अंदाज़ा इस वक़्त लगाना मुश्किल है और उसे लेकर जनता का मिजाज़ क्या है, इस विषय में भी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। हालांकि जनता बसपा और सपा दोनों का शासन देख चुकी है। संभव है कि ऊब भी चुकी हो, क्योंकि पिछली बार बसपा के भ्रष्ट शासनतंत्र से सत्ता छिनकर जनता ने बदलाव की उम्मीद में सपा को पूर्ण बहुमत दे सत्तारूढ़ किया था। लेकिन नतीज़ा वही ‘ढाक के तीन पात’ ही रहा। ऐसे में जनता दूबारा बसपा को सत्ता देगी, इसकी उम्मीद बेहद कम है।

ऐसे में, प्रदेश में अब केवल एक दल भाजपा ही दिखती है, जिधर जनता का रुख हो सकता है। खबरियां चैनलों और विभिन्न एजेंसियों के हाल के सर्वेक्षणों में जो परिणाम आए हैं, उनके हिसाब से प्रदेश में भाजपा नंबर एक है। साथ ही, भाजपा द्वारा प्रदेश में की जा रही रैलियों को देखें तो उनमे उमड़ने वाला जनसैलाब भी भाजपा के ही पक्ष में रुझान होने का संकेत दे रहा  है। भाजपा की राजनीति का मूल एजेंडा विकास है। केंद्र में भाजपा-नीत मोदी सरकार और देश के अन्य राज्यों की भाजपा सरकारों के विकास कार्यों को उत्तर प्रदेश की जनता के सामने रखते हुए भाजपा प्रदेश की सियासत में ताल ठोंक रही है। इस तरह, भाजपा की इस विकास की राजनीति के आगे फिलहाल प्रदेश का कोई अन्य दल टक्कर में नहीं नज़र आ रहा। अन्य दलों की जातिवादी, बेमेल गठबंधन आधारित राजनीति की बजाय प्रदेश की जनता भाजपा की विकासवादी राजनीति का रुख करेगी, इसकी संभावना अधिक प्रतीत होती है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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