भाजपा के भय का परिणाम है कांग्रेस-सपा का गठबंधन

उत्तर प्रदेश के रण में भाजपा के खिलाफ महागठबंधन का चुनावी रथ तैयार हो चुका है। कल तक जो सपा और कांग्रेस इस चुनावी रण में एक दूसरे का विरोध कर रही थीं, आज हाथ मिलाकर भाईचारे का संदेश दे रही हैं। कितना विचित्र है न कि आज जो राहुल गांधी अखिलेश यादव को भाई बता रहे हैं, उन्हीं राहुल गांधी ने ‘27 साल, यूपी बेहाल’ का नारा देकर सपा के खिलाफ चुनावी बिगुल फूंका था। लेकिन, अब समीकरण और सुर दोनों बदल चुके हैं। आज ’27 साल, यूपी बेहाल’ का नारा नहीं, ‘यूपी को ये साथ पसंद है’ गाने के साथ राहुल-अखिलेश इस चुनाव में गलबहियां करते नज़र आ रहे हैं।

पांच सालों के शासन में अखिलेश से जनता का विश्वास उठ चुका है। इस नाते उन्हें अपनी ज़मीन खिसकती महसूस हो रही है। वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस अपने सबसे बुरे राजनीतिक दौर से गुज़र रही है। भाजपा के बढ़ते प्रभाव के आगे ये दोनों ही दल खुद को यूपी में बेहद बौना देख रहे हैं। इसी कारण भाजपा को रोकने के लिए इन्होने सभी आपसी विरोधों को ताक पर रखते हुए गठबंधन का रास्ता अख्तियार किया है। अब यह गठबंधन क्या रंग लाता है, यह तो देखने वाली बात होगी, लेकिन फिलहाल तो भाजपा ही सूबे में सबसे मज़बूत दिख रही है और यह गठबंधन भाजपा की इस मजबूती के ही भय का परिणाम है।

उत्तर प्रदेश में जो महागठबंधन बना है, वो सिर्फ एक पार्टी को हराने के लिए बना है, जो कि भाजपा है। केंद्र की सत्ता पर क़ायम भाजपा ने जो विकास किया है, वो यूपी की जनता को भी नज़र आने लगा है, जिससे प्रदेश में विकास और परिवर्तन की लहर चली है। ऐसे में, विरोधियों को डर है कि कहीं यूपी का रण भाजपा ना जीत जाए। विकास और परिवर्तन की हवा का रूख मोड़ने के लिए अखिलेश और राहुल ने यह अवसरवादी गठबंधन किया है।

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कहना गलत नहीं होगा कि सपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों की खुद की कोई अपनी विचारधारा नहीं है, इनकी विचारधारा सिर्फ एक है कि जैसे भी हो सके, सता तक पहुँचा जाए। तभी तो कभी एकदूसरे को कोसने वाले ये दल आज एक हुए पड़े हैं। अखिलेश यादव द्वारा खुद इस बात को स्पष्ट किया जा चुका है कि सपा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का एक साझा मकसद यह है कि भाजपा और संघ की विचारधारा को शिकस्त दी जाए।

कुल किस्सा यह है कि समाजवादी पार्टी अपने युवा चेहरे अखिलेश यादव के दम पर पिछला विधानसभा चुनाव जीती थी। जनता ने उनके युवा नेतृत्व पर विश्वास दिखाया था। लेकिन, पांच सालों के शासन में अखिलेश से जनता का विश्वास उठ चुका है। इस नाते उन्हें अपनी ज़मीन खिसकती महसूस हो रही है। वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस अपने सबसे बुरे राजनीतिक दौर से गुज़र रही है। भाजपा के बढ़ते प्रभाव के आगे ये दोनों ही दल खुद को यूपी में बेहद बौना देख रहे हैं। इसी कारण भाजपा को रोकने के लिए इन्होने सभी आपसी विरोधों को ताक पर रखते हुए गठबंधन का रास्ता अख्तियार किया है। अब यह गठबंधन क्या रंग लाता है, यह तो देखने वाली बात होगी, लेकिन फिलहाल तो भाजपा ही सूबे में सबसे मज़बूत दिख रही है और यह गठबंधन भाजपा की इस मजबूती के ही भय का परिणाम है।

(लेखिका पेशे से पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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