जश्न-ए-रेख्ता में कट्टरपंथियों ने किया तारिक फ़तेह का विरोध, खामोश क्यों हैं सेकुलर ?

बीते रविवार तो दिल्ली में जश्न-ए-ऱेख्ता खत्म हुआ । उर्दू भाषा के इस उत्सव में काफी भीड़ इकट्ठा होती है । बॉलीवुड सितारों से लेकर मंच के कवियों की महफिल सजती है । प्रचारित तो यह भी किया जाता है कि ये तरक्कीपसंद और प्रोग्रेसिव लोगों का जलसा है । होगा । लेकिन इस बार जश्न-ए-रेख्ता में जो हुआ वह इस आयोजन को और इसके आयोजकों को सवालों के घेरे में खड़ा करता है और यह साबित भी करता है कि इस कथित प्रग्रोसिव जलसे में कट्टरपंथियों का भी जुटान होता है । क्या हमारे देश की यह तहजीब है कि सड़सठ साल के एक बुजुर्ग को चारो ओर से घेर कर हल्ला कर किसी समारोह से जाने के लिए मजबूर कर दिया जाए । जश्न-ए-रेख्ता में मौजूद लोगों ने पाकिस्तानी मूल के लेखक तारिक फ़तेह के खिलाफ नारेबाजी की और उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर अपशब्द भी कहे । इस बात की जानकारी खुद तारेक फ़तेह ने ट्वीट करके दी । आयोजकों की तरफ से बाद में जो सफाई आई, वो भी आपत्तिजनक है । इस घटना पर खेद प्रकट करने की बजाए उन्होंने साफ किया कि तारिक फतेह को किसी सेशन के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था । आयोजकों को कार्यक्रम के चलते रहने की फिक्र थी, लेकिन एक स्कॉलर के अपमान का अफसोस शायद उनको नहीं था । किसी भी कार्यक्रम के आयोजक की ये जिम्मेदारी बनती है कि वो अपने मेहमानों की सुरक्षा और उनके मान के लिए प्रयत्न करे । जश्न-ए-रेख्ता के आयोजकों की तरफ से ऐसा कोई संदेश सामने नहीं आया । इससे भी अफसोसनाक तो प्रगतिशील जमात का तारिक फतेह के समर्थन में नहीं उठना रहा । असहिष्णुता के विरोध में बवंडर खड़ा करनेवाले भी कमोबेश खामोश रहे ।  दरअसल तारेक फतह बलोचिस्तान की आजादी की वकालत करते हैं और इस्लाम के कट्टरपंथियों को तार्किक तरीके से एक्सपोज करते हैं । वो दक्षिण एशिया खासकर पाकिस्तान की करतूतों का हमलावर तरीके से विरोध करते हैं लिहाजा कट्टरपंथियों के निशाने पर रहते हैं । क्या किसी साहित्यक आयोजन में इस तरह का वाकया समाज में बढ़ती असहिष्णुता की ओर इशारा करता है ।

एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक होने के नाते हमें ये विचार करना होगा कि तस्लीमा या तारेक फतेह के खिलाफ हई घटना छोटी घटना नहीं है और इसको हल्के में नहीं लिया जा सकता है । अब इस बात पर विचार करना होगा कि धार्मिक कट्टरता के खिलाफ किस तरह की रणनीति बनाई जाए, क्योंकि कट्टरता ही आतंकवाद की नर्सरी है । कट्टरता के खात्मे के लिए आवश्यक है कि पूरी दुनिया के बौद्धिक इसके खिलाफ एकजुट हों और अपने-अपने देशों में आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा दें ।

इसी तरह का वाकया हाल ही में समाप्त हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में देखने को मिला था, जहां तस्लीमा नसरीन की मौजूदगी पर कुछ मुस्लिम संगठनों ने विरोध प्रकट किया था और नारेबाजी भी की थी । तस्लीमा का विरोध कर रहे चंद मुस्लिम संगठनों के दबाव में आयोजकों ने उनको भविष्य में जयपुर लिट फेस्ट में नहीं बुलाने का एलान किया ।  मुस्लिम संगठनों के दबाव में आयोजकों ने अगर तस्लीमा को नहीं बुलाने का फैसला बरकरार रखा तो तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा । तस्लीमा के विरोध और जयपुर लिट फेस्ट के आयोजकों की उनको भविष्य में नहीं बुलाने के आश्वासन पर भी हमारे बौद्धिक समाज में किसी तरह का कोई स्पंदन नहीं हुआ । यह भी एक किस्म की बौद्धिक बेइमानी है जब अभिव्यक्ति की आजादी पर चुनिंदा तरीके से अपनी प्रतिक्रिया देते हैं । जब बौद्धिक समाज या कोई विचारधारा अपने आंकलन में पक्षपात करने लगती है, तब यह मान लेना चाहिए कि उसका संक्रमण काल है और वाम विचारधारा के अनुयायी करीब-करीब हमेशा इस तरह की ही प्रतिक्रिया का प्रदर्शन करते हैं ।

एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक होने के नाते हमें ये विचार करना होगा कि तस्लीमा या तारेक फतेह के खिलाफ हई घटना छोटी घटना नहीं है और इसको हल्के में नहीं लिया जा सकता है । अब इस बात पर विचार करना होगा कि धार्मिक कट्टरता के खिलाफ किस तरह की रणनीति बनाई जाए, क्योंकि कट्टरता ही आतंकवाद की नर्सरी है । कट्टरता के खात्मे के लिए आवश्यक है कि पूरी दुनिया के बौद्धिक इसके खिलाफ एकजुट हों और अपने-अपने देशों में आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा दें । इस्लामिक बुद्धिजीवियों पर जिम्मेदारी ज्यादा है । उनको धर्म की आड़ में कट्टरता को पनपने से रोकने के लिए धर्म की गलत व्याख्या पर प्रहार करना होगा । धर्म के ठेकेदारों के खिलाफ बोलना शुरू करना होगा । हर विचारधारा और धर्म के लोगों को गलत को गलत कहने का साहस दिखाना होगा । हम किसी अन्य धर्म में बढ़ रही कट्टरता का विरोध करना इस तर्क के आधार पर नहीं छोड़ सकते हैं कि यह उनका आंतरिक मामला है । जब बात मानवता और इंसानियत की आती है तो फिर वो मामला किसी का भी आंतरिक नहीं रह जाता है, क्योंकि आतंक की तबाही ना तो धर्म देखती है और ना ही रंग; वो तो सिर्फ जान लेती है ।

हाल की आतंकवादी वारदातों, चाहे वो बांग्लादेश की आतंकवादी वारदात हो या फिर पेरिस में भीड़ पर आतंकवादी हमला या तुर्की में हुआ आतंकवादी हमला, इनपर नजर डालें तो खतरनाक प्रवृत्ति दिखती है । इन हमलावरों की प्रोफाइल देखने पर आतंकवाद को लेकर चिंता बढ़ जाती है । आश्चर्य तब होता है, जब एमबीएम और इंजीनियरिंग के छात्र भी आतंकवाद की ओर प्रवृत्त होने लगते हैं; हमले करने लगते हैं । रमजान के पाक महीने में बांग्लादेश, पेरिस और मक्का समेत कई जगहों पर आतंकवादी वारदातें हुईं थीं । ढाका पुलिस के मुताबिक बम धमाके के मुजरिम शहर के सबसे अच्छे विश्वविद्यालय में पढ़नेवाले छात्र थे । पूरी दुनिया में इस बात पर मंथन हो रहा है कि इस्लाम को मानने वाले पढ़े-लिखे युवकों का रैडिकलाइजेशन कैसे संभव हो पा रहा है । जबतक गलत को गलत कहने का साहस हम नहीं दिखा पाएंगे या फिर तस्लीमा और तारेक फतह के साथ हुई घटना का पुरजोर तरीके से विरोध नहीं करेंगे और उसको धर्म की आड़ देते रहेंगे तो कट्टरता को बढ़ावा मिलता रहेगा । यही कट्टरता कालांतर में मानवता की दुश्मन बनकर खड़ी हो जाती है । तब हम सिर्फ अफसोस कर सकते हैं ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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