यूपी चुनाव : सोशल इंजीनियरिंग के नए समीकरण

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अपने अंतिम चरण में है। सियासी समीकरण कयासों की कसौटी पर अलग-अलग ढंग से कसे जा रहे हैं। यूपी का ताज किसके सर बंधेगा और कौन इस इस जंग में मुंह की खायेगा, इस सवाल पर सियासी पंडित अलग-अलग आकलन कर रहे हैं। हालांकि अलग-अलग जानकारों का अलग-अलग आकलन होने के बावजूद एक बात पर सभी सहमत नजर आ रहे हैं कि लड़ाई के केंद्र में भाजपा है। कहीं भाजपा से बसपा लड़ रही है, तो कहीं भाजपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन की लड़ाई है। २०१२ के विधानसभा चुनाव में भाजपा बहुत अच्छा नहीं कर पाई थी और सपा को पूर्ण बहुमत मिला था। लेकिन अब पांच साल बाद सियासत के पैमाने बदल चुके हैं। २०१२ का दौर मोदी का दौर नहीं था, जबकि आज भारतीय राजनीति में ‘मोदी इज मुद्दा, मुद्दा इज मोदी’ जैसी स्थिति है। पार्टी की कमान अब अमित शाह के हाथ में है, जो २०१४ में यूपी में भाजपा को ८० में से ७३ लोकसभा सीट दिला चुके हैं। ऐसे में सवाल है कि इस विधानसभा चुनाव में भी भाजपा सरकार बनाने में कामयाब हो पाएगी ?

अगर भाजपा के दलित वोट में इजाफा होता है, तो इसका बड़ा कारण उज्ज्वला योजना होगी। नरेंद्र मोदी ने खुद को जनता से संवाद करने वाला प्रधानमंत्री साबित किया है, यह भी उनके प्रति जनता के मन विश्वास बढ़ने की बड़ी वजह है। जिन्होंने लोकसभा चुनाव में मोदी को अपना वोट दिया है, वो अब विधानसभा चुनाव में क्यों नहीं देंगे, इसका ठीकठाक जवाब कोई नहीं दे पा रहा है। विपक्ष के सारे आकलन निर्मूल साबित हो रहे हैं। नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था के संकट की सारी आशंकाएं महज एक कोरी कल्पना साबित होती नजर आ रही हैं। पिछले कुछ चुनावों में नोटबंदी पर जनता की एकतरफा मुहर लगी है, जो यह बताने के लिए काफी है कि जनता ने इस निर्णय का स्वागत किया है।

इसमें कोई शक नहीं कि २०१२ की तुलना में आज भाजपा बहुत अधिक मजबूत हुई है। भाजपा की मजबूती का आकलन सपा को हो गया था, इसी वजह से अखिलेश ने १०५ सीटें उत्तर प्रदेश में मृतप्राय हो चुकी कांग्रेस को देने का निर्णय किया। दरअसल अखिलेश की चिंता ये नहीं रही होगी कि कांग्रेस के आने से उन्हें कांग्रेस के वोट २९८ सीटों पर स्थानांतरित  होंगे। उनकी चिंता ये होगी कि इस गठबंधन के आधार भाजपा विरोधी कट्टर वोटों को बिखरने न दिया जाए। लेकिन, शायद अखिलेश को इस बात का भान नहीं होगा कि अब उत्तर प्रदेश की सोशल इंजीनियरिंग में नए समीकरण वाले रसायन घुल रहे हैं। आज अगर भाजपा लड़ाई के केंद्र में है, तो इसकी मूल वजह ये है कि भाजपा हर वर्ग, हर समुदाय के बीच अपनी पैठ स्थापित करने में कामयाबी हासिल कर पाई है। सवर्ण एकजुटता इसबार २००७ और २०१२ के विधानसभा चुनाव की तुलना में भाजपा के पक्ष में ज्यादा तो दिख ही रही है साथ ही ओबीसी का एक बड़ा तबका भी भाजपा में भरोसा जताता नजर आ रहा है। भाजपा के सोशल इंजीनियरिंग में सवर्ण, पिछड़ा और दलित समाज का एक वर्ग जुड़ता नजर आ रहा है, जिसका भरोसा नरेंद्र मोदी में काफी ज्यादा है। लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा के ७३ सीटें हासिल करने के पीछे यही समीकरण काम किया था। नरेंद्र मोदी को हर वर्ग का समर्थन मिला था, जिसकी बदौलत भाजपा प्रदेश में ४२ फीसद वोट पा सकी थी। ऐसा माना जा रहा है कि लोकसभा में अगर भाजपा को ४२ फीसद वोट मिला था, तो वह विधानसभा में कम होगा। लेकिन, कितना कम होगा, इसका ठीक-ठाक आकलन लोग नहीं कर पा रहे है। लोकसभा चुनाव की तुलना में वर्तमान चुनाव में मत फीसद में होने वाली जिस कमी के कयास लगाए जा रहे हैं, वो कुछ हद तक सही ज़रूर हो सकते हैं, लेकिन उसके पीछे स्थानीय कारण हो सकते हैं न कि मोदी से नाराजगी कोई वजह है। लेकिन यह कमी या तो बिलकुल नहीं होगी अथवा होगी भी तो इतनी होगी कि उससे भाजपा को चुनाव में सीटों पर अधिक नुकसान नहीं पहुंचेगा।  

गत दिनों पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में जाना हुआ। बातचीत के आधार पर मै कह सकता हूँ कि मोदी को लेकर किसी के मन में कोई संशय है, ऐसा बिलकुल नहीं है। यह जरुर है कि सांसदों के प्रति असंतोष भाव हो सकता है। लेकिन यह असंतोष केवल भाजपा सांसदों के प्रति है, ऐसा समझना कोरी भूल होगी। ऐसा असंतोष सभी दलों के विधायकों के प्रति भी है। ऐसे में सर्वाधिक विधायक सत्ताधारी दल यानी समाजवादी पार्टी के ही हैं, लिहाजा सर्वाधिक क्षेत्रों में असंतोष का भाव समाजवादी पार्टी के प्रति ही होगा। गैर-यादव ओबीसी जो कभी सपा, बसपा और भाजपा में बिखरता था, उसे अब भाजपा के रूप में एक पार्टी विकल्प नजर आ रही है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई विधानसभाओं में यह वर्ग निर्णायक भूमिका में है। भाजपा की मजबूती यह है कि वह इस सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी और दलितों के एक ख़ास वर्ग की अपनी पार्टी के रूप में खुद को स्थापित करती जा रही है। जातिगत समीकरण के लिहाज से यह भाजपा की मजबूती का प्रमुख कारण है। हालांकि यह समीकरण बना कैसे और कितना टिकाऊ है, इसपर भी चर्चा की जानी जरुरी है। दरअसल यह समीकरण अंदरखाने ही मोदी लहर में स्वाभाविक रूप से तैयार हो गया था। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपनी लोक कल्याणकारी नीतियों के केंद्र में इसको साधने का काम किया। अगर भाजपा के दलित वोट में इजाफा होता है, तो इसका बड़ा कारण उज्ज्वला योजना होगी। नरेंद्र मोदी ने खुद को जनता से संवाद करने वाला प्रधानमंत्री साबित किया है, यह भी उनके प्रति जनता के मन विश्वास बढ़ने की बड़ी वजह है। जिन्होंने लोकसभा चुनाव में मोदी को अपना वोट दिया है, वो अब विधानसभा चुनाव में क्यों नहीं देंगे इसका ठीकठाक जवाब कोई नहीं दे पा रहा है। विपक्ष के सारे आकलन निर्मूल साबित हो रहे हैं। नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था के संकट की सारी आशंकाएं महज एक कोरी कल्पना साबित होती नजर आ रही हैं। पिछले कुछ चुनावों में नोटबंदी पर जनता की एकतरफा मुहर लगी है, जो यह बताने के लिए काफी है कि जनता ने इस निर्णय का स्वागत किया है। ऐसे में कोई ऐसा कारण नहीं नजर आता जिसके आधार पर कहा जाए कि लोकसभा चुनाव की तुलना में इसबार भाजपा के वोट में कमी आने वाली है।

(लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध अधिष्ठान में रिसर्च फेलो हैं एवं नेशनलिस्ट ऑनलाइन डॉट कॉम के संपादक हैं।)

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