मोदी सरकार के नेतृत्व में परिवर्तन की ओर अग्रसर भारत

उत्तर प्रदेश के नतीजों के तुरंत बाद उमर अब्दुल्लाह ने कहा था कि “विपक्ष को अब 2024 की तैयारी करनी चाहिए; 2019 में उसके लिए खास उम्मीद नहीं है”। उमर अब्दुल्ला ने संभवत: वर्तमान राजनीति की उस हक़ीकत को स्वीकारने का प्रयास किया, जिसे पूरा विपक्ष कहीं न कहीं समझ तो रहा है, मगर स्वीकार नहीं रहा। यद्यपि 2019 अभी दूर है; परंतु जमीनी हकीकत और तमाम समीकरणों को देखते हुए पूरी संभावना है कि 2019 में मोदी की लहर, 2014 और 17 से भी वृहदाकार रूप में उभरकर सामने सकती है। अगर ऐसा होता है, तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए। नरेंद्र मोदी के मुखर आलोचक अथवा निंदक कहूं तो ज्यादा उचित होगा, भी दबी जुबान से यह स्वीकार करते हैं कि मोदी ने शासन प्रणाली में, अफसरशाही में आमूलचूल परिवर्तन किये हैं।

जहां मोदी जनता की नब्ज टटोलते हुए शासन कर रहे हैं, वही विपक्ष जनता के मिजाज़ को जरा भी नहीं समझ पा रहा। संप्रग के समय जिस जनता का सरकार से विश्वास उठ चुका था, वही जनता अब मोदी के एक आह्वान पर अपनी गैस सब्सिडी खुशी-खुशी छोड़ रही है। जो लोग भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में इस घटना के मायने नहीं पढ़ पाए, निश्चित ही अब उन्हें पछतावा हो रहा होगा। अभिप्राय यह है कि मोदी ने सबसे बड़ा काम नेतृत्व के प्रति जनता के विश्वास की बहाली करने का किया है, जो कि किसी भी लोकतंत्र के लिए एक आवश्यक आयाम है और लोकतंत्र की समृद्धि का सोपान भी है।

2014 से पहले केंद्र स्तर का भ्रष्टाचार देश के लिए बड़ा मुद्दा था; लेकिन मोदी के सत्ता संभालने के बाद तमाम कुटिल प्रयासों के बावजूद भी विपक्ष इस सरकार को घेरने के लिए एक भी ठोस मुद्दा नही खोज पाया। नोटबंदी को लेकर केजरीवाल, ममता और कांग्रेस के नेताओं ने फ़िज़ूल का बवाल खड़ा करने का प्रयास किया, परंतु न तो उनके पास ठोस तर्क थे और न ही जनता का उन्हें समर्थन मिला; उल्टे उत्तर प्रदेश समेत तमाम चुनाव नतीजों ने नोटबंदी पर जनता के समर्थन की मोहर लगा दी। विडंबना यह रही कि विपक्ष यह समझने में कतई नाकाम रहा कि जनता इस कदम को काले धन पर कठोर प्रहार मानकर चल रही है, इसीलिए पूरे देश में मुद्रा परिवर्तन के इतने बड़े महाभियान में असुविधाओं के बावजूद कोई भी बड़ा विरोध या आंदोलन सामने नहीं आया ।

स्पष्ट है कि जहां मोदी जनता की नब्ज टटोलते हुए शासन कर रहे हैं, वही विपक्ष जनता के मिजाज़ को जरा भी नहीं समझ पा रहा। संप्रग के समय जिस जनता का सरकार से विश्वास उठ चुका था, वही जनता अब मोदी के एक आह्वान पर अपनी गैस सब्सिडी खुशी-खुशी छोड़ रही है। जो लोग भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में इस घटना के मायने नहीं पढ़ पाए, निश्चित ही अब उन्हें पछतावा हो रहा होगा । अभिप्राय यह है कि मोदी ने सबसे बड़ा काम नेतृत्व के प्रति जनता के विश्वास की बहाली करने का किया है, जो कि किसी भी लोकतंत्र के लिए एक आवश्यक आयाम है और लोकतंत्र की समृद्धि का सोपान भी है।

दरअसल नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद जब चीजों को नजदीक से समझना शुरु किया, तो  उन्हें एहसास हुआ कि सत्तासीन लोगों की उदासीनता और अफसरशाही की जड़ता तमाम चीजों में अवरोधक बन कर खड़ी है। इसके लिए मोदी ने लक्ष्यबद्ध योजनाएँ आरंभ की। राज्यो के साथ मिलकर मासिक “प्रगति “समीक्षा बैठक शुरू की, जिसका असर अब जमीन पर भी दिखने लगा है।

रेलवे कायाकल्प होने की ओर अग्रसर है। अंत्योदय जैसी ट्रेनों का विस्तार, विद्युतीकरण, दोहरीकरण आदि जिस गति से चल रहा है, निश्चित रूप से 2019 तक जनता को सकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा। हाईवे के क्षेत्र में जो पहले 2 किलोमीटर प्रतिदिन सड़क बन रही थी,अब 20 किलोमीटर से भी ज्यादा सड़क बनायी जा रही है, जिसे बढ़ाकर इस वित्त वर्ष में 40 किमी का लक्ष्य तय किया गया है। कांग्रेस के समय में ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ बिल्कुल बंद पड़ चुकी थी। अब इसके तहत 144 किलोमीटर प्रतिदिन सड़क दिन बन रही है, जिससे गावों में रोजगार का सृजन भी हो रहा है और सहूलियत भी पैदा हो रही है। इस मामले में भी मोदी सरकार ने 2022 के बजाए 2019 से पहले सभी बस्तियों तक पक्की सड़क पहुंचने का लक्ष्य तय कर रखा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने गरीब जनता के आर्थिक समायोजन के लिए जन-धन योजना के तहत शून्य राशि पर बैंक में खाते खुलवाने का लक्ष्य रखा, इसके तहत 25 करोड़ से ज्यादा खाते खुले और उनमें हजारों करोड़ रुपए जमा भी हो गए। उन खातों तथा आधार के जरिये सरकार ने डीबीटी योजना को बखूबी अंजाम दिया है। आज लगभग मनरेगा जैसी 74 योजनाओं में हजारो करोड़ की राशि डायरेक्ट ट्रांसफर की जा रही है। इस डायरेक्ट ट्रांसफर को अप्रैल 2017 से पहले 144 योजनाओं तक बढ़ाने का लक्ष्य है। प्रधानमंत्री की प्राथमिकता में किसान, गरीब, मजदूर, बेरोजगार, युवा और महिला सबसे ऊपर है। यह मोदी की योजनाओं में स्पष्ट रुप से उभर कर भी सामने आ रहा है।

‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ आपदा पीड़ित किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आई है। इतने कम प्रीमियम पर कभी भी फसल बीमा लागू नहीं हुआ। सरकार का लक्ष्य कम से कम 50% किसानों को इस योजना के तहत लाने का है। 2019 तक यह संख्या काफी हद तक बढ़ेगी। सरकार सभी घरों में विद्युतीकरण एवं 24 घंटे बिजली देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। जिन 18000 से अधिक गांवों में आजादी के बाद से आज तक बिजली नहीं पहुंची थी, उनमें भी 1000 दिन के अंदर बिजली पहुंचाने का लक्ष्य पूरा होता दिख रहा है। उदय योजना को ज्यादातर प्रदेशों ने स्वीकार किया है, जिसका लाभ भी आगामी दिनों में दिखेगा। 22 करोड़ से ज्यादा  एलईडी बल्ब वितरण से बिजली की बचत सालाना 11532 करोड़ रूपये पहुंच चुकी है। नीम कोटेड यूरिया नीति का सीधा लाभ किसानों को मिला है। हाल ही में सरकार ने 101 फूड प्रोसेसिंग पार्कों की अनुमति दी है। खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल का कहना है कि अगले साल के अंत तक इन में काम आरंभ हो जाएगा। बता दें कि अभी तक देश में इतने ही मेगा मेगा फूड पार्क थे,  जितने की अनुमति दी गई है। इससे किसानों को अपने सामान को उचित दाम मे बेचने में काफी सुविधा मिलेगी। स्वरोजगार के लिए सरकार द्वारा चलाई गई मुद्रा योजना भी काफी प्रभावशाली रही है; अभी तक आनुमानिक तौर पर इससे एक करोड़ रोजगारों का सृजन हुआ है।

हाल ही में सरकार ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है, जिसे विशेषज्ञ सही क्रियान्वयन  होने पर गेम चेंजर के रूप में देख रहे हैं। वह है नयी स्वास्थ्य नीति, जिसके अंतर्गत सभी के लिए निशुल्क/सस्ती चिकित्सा और टेस्ट की व्यवस्था सुनिश्चित करने का प्रावधान है। यद्यपि मीडिया ने इसे ज्यादा महत्व नहीं दिया, परंतु यह सत्य है कि अगर इस योजना का क्रियान्वयन सही तरह से जमीन पर हुआ, तो फिर आम लोगों की आमदनी और स्वास्थ्य दोनों पर इसका बेहद अच्छा गुणात्मक परिवर्तन दिखाई देगा। इस तरह की तमाम योजनाएं लक्ष्यबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही हैं, जो कि मोदी सरकार के लोक-कल्याण और सुशासन के संकल्प के प्रति प्रतिबद्धता को दिखाता है।

भले ही राजनीतिक पंडित, राजनेता, विश्लेषक और संपादक इस हकीकत को स्वीकार करें या ना करें, परंतु जिस तरह से मोदी सरकार अपनी नीतियों को समयबद्ध तरीके से अमलीजामा पहनाने की कोशिश कर रही है, उसे देखते हुए कह सकते हैं कि कमजोर और मुद्दा हीन हो चुके विपक्ष के लिए उसे रोक पाना बेहद कठिन होगा। इसके परिणामस्वरूप हमें 2019 में और भी बड़ी मोदी-लहर या सुनामी देखने को मिल सकती है।

(लेखक पेशे से प्राध्यापक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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