जनता के पैसे से अपनी छवि चमकाने के चक्कर में फँसे केजरीवाल, फिर खुली नयी राजनीति की पोल

अलग तरह की राजनीति का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में सत्तारूढ़ हुए दो वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। जनता के हित के बड़े-बड़े काम करने का वादा करके सत्ता में आने वाले केजरीवाल इस दौरान काम तो कुछ नहीं किए हैं; मगर अपने विभिन्न कारनामों के लिए खूब चर्चा में रहे हैं। कभी अपने मंत्रियों की गिरफ़्तारी तो कभी नजीब जंग से लेकर अनिल बैज़ल तक दिल्ली के उपराज्यपालों  से खींचतान को लेकर केजरीवाल विवादों में बने रहे हैं। अनेक प्रकार के आरोप भी लगे हैं, मगर क्या मज़ाल कि किसी आरोप के बाद केजरीवाल में कोई बदलाव आया हो और उन्होंने अपनी गलती के लिए माफ़ी मांगी हो! सरकार चलाने के अवैधानिक तौर-तरीकों व अपने बड़बोलेपन से केजरीवाल कई मर्तबा अपनी फ़जीहत  करा चुकें हैं। अब केजरीवाल सरकार पर एक और गंभीर आरोप लगा है। यह आरोप केजरीवाल के  सादगी और गरीबों, मज़लूमो की चिंता जैसे पाखंड को उजागर करता है। केजरीवाल पर आरोप है कि दिल्ली सरकार ने सरकारी विज्ञापन में भारी वित्तीय व संवैधानिक अनियमितता बरती है। इसके साथ ही केजरीवाल ने कोर्ट के आदेश को भी ताक पर रख विज्ञापनों में पानी की तरह पैसा बहाया है।

गौर करें तो सभी राज्य सरकारें अपने विज्ञापन अपने राज्य की सीमा में करती हैं; परन्तु, केजरीवाल सरकार इसके उलट अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को केंद्र में रखते हुए सरकार के पैसों से अपनी पार्टी का प्रचार–प्रसार करने के लिए देश के अन्य राज्यों में भी अपने विज्ञापन चलवाई है। विज्ञापन भी ऐसे जिनका कंटेंट सरकारी कार्यों की जानकारी देने वाला कम, आम आदमी पार्टी और केजरीवाल का प्रचार करने वाला अधिक है।

दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को आम आदमी पार्टी से 97 करोड़ रूपये वसूलने का आदेश दिया है। अपने आदेश में उपराज्यपाल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए केजरीवाल सरकार को फटकार लगाई है तथा तीस दिन के अंदर 97 करोड़ रूपये वसूल करने के निर्देश दियें हैं। उल्लेखनीय होगा कि विगत दस मार्च को कैग की रिपोर्ट दिल्ली विधानसभा में रखी गयी थी, जिसमें से ये बात सामने निकल कर आई कि केजरीवाल सरकार ने 29 करोड़ के विज्ञापन दिल्ली के बाहर दिए, जो उसकी सीमा में नहीं थे; जबकि 24 करोड़ का विज्ञापन दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को दरकिनार करते हुए दिया है।सवाल उठता है कि क्या यही केजरीवाल की वो नयी तरह की राजनीति जिसका दावा कर वे सत्ता में आए थे ?

गौरतलब है कि 2015  में ही दिल्ली सरकार पर आम जनता के पैसों के गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगा था। आरोप यह भी था कि सरकारी विज्ञापनों के जरिये केजरीवाल खुद को प्रोजेक्ट कर रहें हैं। सरकारी विज्ञापन में कंटेंट रेग्युलेशन के लिए गठित कमेटी ने जब इस मामले की जांच की, तो दिल्ली सरकार के विज्ञापन के असली एजेंडे का पता चला। कमेटी ने अपनी जाँच में पाया कि दिल्ली सरकार अपने विज्ञापन के लिए जिस कटेंट के इस्तेमाल कर रही है, वह पूरी तरह से सुप्रीमकोर्ट द्वारा सरकारी विज्ञापन के लिए निर्धारित दिशानिर्देशों  के प्रतिकूल है। कमेटी ने यह भी बताया कि इन विज्ञापनों के जरिये मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की छवि को प्रचारित किया जा रहा है। क्या यह जनता के पैसों का दुरूपयोग नहीं है ? यह सही है कि देश के लगभग सभी राज्यों की सरकारें अपने कार्यों तथा योजनाओं को जनता तक पहुँचाने के लिए कमोबेश विज्ञापन का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन, दिल्ली की स्थिति विचित्र है।

गौर करें तो सभी राज्य सरकारें सरकार के विज्ञापन अपने राज्य की सीमा में करती हैं; परन्तु, केजरीवाल सरकार इसके उलट अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को केंद्र में रखते हुए सरकार के पैसों से अपनी पार्टी का प्रचार–प्रसार करने के लिए देश के अन्य राज्यों में भी अपने विज्ञापन चलवाई है। विज्ञापन भी ऐसे जिनका कंटेंट सरकारी कार्यों की जानकारी देने वाला कम, आम आदमी पार्टी और केजरीवाल का प्रचार करने वाला अधिक है।

कहना न होगा कि इस मामले ने एकबार फिर अरविन्द केजरीवाल की नयी और साफ़-सुथरी राजनीति के दावे की कलई खोल के रख दी है। स्पष्ट हो गया है कि यही केजरीवाल और उनकी सरकार का असली चेहरा है और यही उनकी नयी तरह की राजनीति का असल चरित्र है। इस मामले पर भी केजरीवाल ने अपनी रटे-रटाए अंदाज़ में इस आरोप को राजनीति से प्रेरित बताया और कैग की रिपोर्ट को खरिज कर दिया है। लेकिन, ये दलील उनको बचाने वाली नहीं है, इसलिए उचित होगा कि आम जनता के पैसों को अपने प्रचार के लिए खर्च करने वाले केजरीवाल  जल्द से जल्द उपराज्यपाल के आदेश का पालन करते हुए न केवल ९७ करोड़ की राशि लौटा दें, बल्कि अपने इस कृत्य के लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी भी मांगें। रही छवि चमकाने की बात तो इसके लिए इधर-उधर के चुनावों और विवादों से ध्यान हटाकर दिल्ली की जनता से किए अपने वादों को पूरा करने पर ध्यान दें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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