शुंगलू समिति की रिपोर्ट से बेनकाब हुआ केजरीवाल की ईमानदारी का असल चेहरा

अगर देश की जनता को हाल के दौर में किसी एक नेता ने  सर्वाधिक छला और निराश किया है, तो वो अरविंद केजरीवाल हैं। अपने आप को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाला बताने वाला यह शख्स भ्रष्टाचार और नियमों की अवहेलना करने में सबसे आगे रहा है। केजरीवाल के ईमानदार और पारदर्शी सरकार देने के तमाम दावों को तार-तार कर दिया है शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट ने। दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल नजीब जंग ने केजरीवाल सरकार के फैसलों की समीक्षा के लिए  शुंगलू समिति गठित की थी। पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) वीके शुंगलू की अध्यक्षता में बनी समिति  ने केजरीवाल सरकार के फैसलों से जुड़ी 404 फाइलों की जांच कर इनमें संवैधानिक प्रावधानों के अलावा नियुक्ति, अलॉटमेंट, प्रशासनिक प्रक्रिया संबंधी नियमों की अनदेखी किए जाने की बात कही है।

खोखली नैतिकता

नैतिकता के बड़े-बड़े दावे करने वाले केजरीवाल अपनों को दोनों हाथों से रेवड़ियां बांटते रहे। उन्होंने अपने स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन की बेटी सौम्या जैन को मोहल्ला क्लीनिक प्रॉजेक्ट में मिशन डायरेक्टर सलाहकार का पद दे दिया। जरा बताएंगे केजरीवाल कि किन नियमों के तहत उन्होंने सौम्या को उपकृत किया ? जब हंगामा हुआ, तो उन्होंने सौम्या को पद से हटा दिया। अगर वे सच्चे थे, तो उन्हें सौम्या को उनके पद से बाहर नहीं करना चाहिए था। एक दौर में केजरीवाल कहते थे कि वे सरकारी आवास नहीं लेंगे। उन्होंने बंगला लिया। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए तो उन्होंने दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल तथा आप विधायक अखिलेश त्रिपाठी को अनुचित ढंग से टाइप-5 बंगला दिलवा दिया। बेशक, इन गड़बड़ियों का पता ही नहीं चल पाता, यदि शुंगलु कमेटी ने केजरीवाल सरकार के कामकाज की कलई नहीं खोली होती।

केजरीवाल के पास अपने दायित्वों का निर्वाह करने के अलावा सब कुछ करने का वक्त है। हालिया उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड विजय के लिए वे ईवीएम में गड़बड़ी को जिम्मेदार मान रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखे अपने एक गंभीर लेख में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एम.एस.गिल ने उन सभी को कसा है, जो अब ईवीएम में मीन-मेख निकाल रहे हैं। उनका इशारा केजरीवाल की तरफ भी है। लेकिन, अरविंद केजरीवाल सुधरने वाले नहीं हैं। पर मानकर चलिए कि आगामी दिल्ली नगर निगम चुनाव में जनता उनकी लुटिया डुबोने जा रही है। इसलिए वे अनाप-शनाप वादे जनता से कर रहे हैं और कहीं न कहीं इस कारण भी ईवीएम पर भी अभी से सवाल उठा रहे हैं।

रामलीला मैदान में तिरंगे को हाथ में लेकर चलने वाले केजरीवाल द्वारा अधिकारियों के तबादले, तैनाती और अपने करीबियों की कई पदों पर नियुक्ति करने में नियमों को ताक पर रखा गया। दरअसल वीके शुंगलू की अध्यक्षता वाली समिति ने केजरीवाल सरकार के फैसलों से जुड़ी 404 फाइलों की जांचकर इनमें संवैधानिक प्रावधानों के अलावा प्रशासनिक प्रक्रिया संबंधी नियमों की अनदेखी किए जाने का खुलासा किया। बड़ा सवाल यह है कि केजरीवाल किस तरह से सरकार चला रहे हैं? क्या उनकी कोई जवाबदेही भी है या नहीं है?

राष्ट्रीय पर्व का अपमान करने वाला

आपको याद होगा कि अपनी पहली सरकार के कार्यकाल के दौरान उनके एक मंत्री सोमनाथ भारती के युंगाडा की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के मामले ने जब तुल पकड़ा, तो वे मुख्यमंत्री होते हुए भी सरदार पटेल मार्ग पर धरने पर बैठ गए। तब केन्द्र सरकार को चेतावनी देने लगे कि वे गणतंत्र दिवस परेड नहीं निकलने देंगे। यानी राष्ट्रीय पर्वों और प्रतीकों के साथ संवैधानिक पद पर बैठा इंसान खिलवाड़ कर रहा है। यही केजरीवाल आजादी के नारे लगाने वाले कन्हैया कुमार से लेकर उमर खालिद के साथ भी खड़े होते हैं। अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता की आड़ में वे देश विरोधी ताकतों का साथ देने में भी लज्जित महसूस नहीं करते।

एक्सपोज हो गए केजरीवाल

बात सिर्फ शुंगलू कमेटी की ही नहीं है। दरअसल केजरीवाल पूरी तरह से एक्सपोज होते जा रहे हैं। उन्हें मुंह दिखाने की जगह नहीं मिल रही। आपको मालूम है कि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा दायर मानहानि मामले में अरविंद केजरीवाल के वकील राम जेठमलानी को सरकारी खजाने से 3.42 करोड़ रुपये भुगतान करने की सिफारिश पर वे फंस चुके हैं। ये भ्रष्टाचार और दिल्ली की जनता के साथ धोखा है।  इस केस में केजरीवाल नेखुद हलफनामा देकर कोर्ट में कहा था कि यह निजी मामला है। जब केस निजी है, तो उनके वकील का खर्चा दिल्ली सरकार क्यों दे? सीधी सी बात यह है कि केजरीवाल पहले बिना किसी सुबूत के बड़ी हस्तियों पर अपमानजनक बयान देकर उनकी मानहानि करते हैं। मामला जब अदालत में चला जाता है, तो स्वयं को जेल जाने से बचने के लिए दिल्लीवासियों के टैक्स का पैसा मुकदमा लड़ने पर खर्च करने की कोशिश करते हैं।

कुल मिलाकर आप देखेंगे कि केजरीवाल को अपने दायित्वों का निर्वाह करने के अलावा सब कुछ करने का वक्त है। हालिया उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड विजय के लिए वे ईवीएम में गड़बड़ी को जिम्मेदार मान रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखे अपने एक गंभीर लेख में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एम.एस.गिल ने उन सभी को कसा है, जो अब ईवीएम में मीन-मेख निकाल रहे हैं। उनका इशारा केजरीवाल की तरफ भी है। लेकिन, अरविंद केजरीवाल सुधरने वाले नहीं हैं। पर मानकर चलिए कि आगामी दिल्ली नगर निगम चुनाव में जनता उनकी लुटिया डुबोने जा रही है। इसलिए वे अनाप-शनाप वादे जनता से कर रहे हैं और कहीं न कहीं इस कारण भी ईवीएम पर भी अभी से सवाल उठा रहे हैं। अब उनकी कलई पूरी तरह से जनता के सामने खुल चुकी है। जल्दी ही उन्हें ये हकीकत समझ आ जाएगी।

(लेखक यूएई दूतावास में सूचनाधिकारी रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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