अपने रहनुमाओं से अब मुस्लिम पूछ रहे हैं कि भाजपा क्यों नहीं ?

भाजपा की जीत के पीछे जो कारण रहे, उनमें से पहला कारण है मोदी पर जनता का विश्वास । जो इस बात से  प्रकट होता है कि उन पर लगभग 3 साल की सरकार में एक भी आरोप नहीं है । दूसरा कारण है, सरकार की निर्णय लेने की इच्छाशक्ति । यह बिलकुल सच बात है कि कोई भी व्यक्ति कोई भी काम कर सकता है; परंतु उसके लिए इच्छाशक्ति एक जरुरी योग्यता है, जो कि मोदी और उनकी पार्टी के अंदर है ।

हाल ही में हुए 5 राज्यों के चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बहुत ही बेहतर रहा है । निश्चित रूप से यह पार्टी समर्थकों और कार्यकर्ताओं के लिए  हर्ष का विषय है कि भाजपा को इतना प्रचंड बहुमत मिला है । परंतु, जहाँ एक तरफ भाजपा के ख़ेमे में जश्न का माहौल है, वहीं दूसरी तरफ विरोधियों के मुँह एकदम लटके हुए हैं । दोष के लिए कोई जायज़ कारण न मिल पाने से कई लोग तो ऐसे-ऐसे बयान दे रहे हैं कि उनके मानसिक संतुलन तक पर सवाल उठाये जाने लगे हैं । परन्तु, वास्तव में तो यह समय विपक्षी पार्टियों के लिए दोषारोपण का समय न होकर अपने गिरेबान में झांकने का है।

भाजपा की जीत के पीछे जो कारण रहे, उनमें से पहला कारण है मोदी पर जनता का विश्वास । जो इस बात से  प्रकट होता है कि उन पर लगभग 3 साल की सरकार में एक भी आरोप नहीं है । दूसरा कारण है, सरकार की निर्णय लेने की इच्छाशक्ति । यह बिलकुल सच बात है कि कोई भी व्यक्ति कोई भी काम कर सकता है; परंतु उसके लिए इच्छाशक्ति एक जरुरी योग्यता है, जो कि मोदी और उनकी पार्टी के अंदर है। इसी बात पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने संसद में दुर्योधन का उदाहरण भी दिया था – “जानामि धर्म न च मे प्रवृतिः” अर्थात दुर्योधन यह जानता था कि धर्म क्या है, परन्तु उसकी धर्म में प्रवृत्ति नहीं थी ।

इसी संदर्भ में भाजपा की जीत का जो एक बड़ा कारण माना जा रहा है, वह है अब तक उसके साथ राजनीतिक अछूत जैसा व्यवहार करता आ रहा मुस्लिम वोटर । उसमे भी महिला मुस्लिम वोटर, जिसने मोदी को मुस्लिम समाज में व्याप्त तमाम बुराइयों को समाप्त करने के आश्वासन के बदले में अपना वोट दिया है । अब वह समय लद गया है, जब लोग धर्म के बारे में कुछ भी सुन लेते थे और कुछ भी मान लेते थे । आज का आधुनिक समाज हर चीज का तार्किक हल चाहता है । यह दीगर बात है कि जब धर्म व्यक्ति का निजी मामला है, तो उसमें दूसरा व्यक्ति हमें सही और गलत बताने वाला कौन होता है ?

अभी दो चार दिन पहले की ही बात है एक रियल्टी शो में गाने वाली भोली सी लड़की ‘आफ़रीन’ के खिलाफ इसी देश में जो कि संविधान के हिसाब से चलता है, 45 फतवे एक दिन में जारी किए गए। बावजूद इसके वह लड़की डरी नहीं और उसने अपना मंतव्य नहीं बदला । इसी तरह की घटनाएं आये दिन हम समाज में सुनते और देखते रहते हैं । कई मुस्लिम लड़कियां अपने धार्मिक जकड़नों के कारण बहुत सारे क्षेत्रों में कारोबार और करियर से वंचित हैं । उदाहरण के लिए खेल को ही लें तो वहां कई ऐसे खेल हैं जहां “ड्रेस” ही धर्म के लिए खतरा हो जाता है । कई जगह एक्टिंग से धर्म खतरे में पड़ जाता है । इसी प्रकार से गाने, बजाने, लिखने, बोलने, हक़ मांगने, जैसे साधारण विषयों पर भी धर्म को खतरा हो जाता है ।

जैसा कि विदित है कि मौका सबको मिलता है, तो कांग्रेस को भी उसके शासनकाल में यह मौका मिला था । वह मुसलामान औरतों के लिए एक हितकारी कदम उठा सकती थी । वह अपनी इच्छाशक्ति का परिचय दे सकती थी । शाहबानों केस में यह अवसर था उसके पास । लेकिन कांग्रेस ने अपनी राजनैतिक भीरूता का परिचय देते हुए महज मुट्ठी भर लोगों के दबाव में माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद में क़ानून लाकर बदल दिया । उस समय के कैबिनेट मिनिस्टर श्री आरिफ़ मोहम्मद खान साहब ने राजीव गांधी के इस फैसले को मुसलमानों को पीछे धकेलने वाला बताते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

अतः लोगो को यह जान लेना चाहिए कि प्रस्तुत जनादेश, बुर्के के अंदर कैद खामोश गुर्राहट का जनादेश है । यह जनादेश उन ठेकेदारों के लिए सबक है, जो आज तक यह नहीं तय कर पाए कि हमें  कैसे नेता की जरूरत है ! हमारा उद्धार किस तरह से होगा ? क्या हम किताबी बातों में ही उलझ कर रह जाएंगे ? यह उन लोगों के खिलाफ जनादेश है जो यह मान के चल रहे थे कि बीजेपी को तो मुसलमान वोट दे ही नही सकते । यह उन लोगों का जनादेश है जिन्हें संविधान पर भरोसा है । यह सच नहीं है कि ज्यादा मुसलमानों ने बीजेपी को वोट दिया है ।  लेकिन इतना जरूर है कि आज की तारीख में मुस्लिम एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ रहा है कि भाजपा क्यों नहीं ? और आज वह वक्त भी आ गया जब मुस्लिम औरतें अपने मसीहाओं से यह कहने की हिम्मत कर रही हैं :

जमीं नहीं तो फलकदार कर दिया जाये;

हमें कहीं का तो हकदार कर दिया जाये ।

तुम्हारे जैसे मसीहा की देखरेख में तो

मरीज़ चाहेगा कि बीमार कर दिया जाये ।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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