यदि पत्थरबाज कश्मीर की आज़ादी के लिए लड़ रहे तो आप भी पत्थर उठा लीजिये, अब्दुल्ला साहब !

फारुक अब्दुल्ला ने कश्मीरी पत्थरबाजों को सही बताते हुए कहा है कि वे अपने मुल्क की आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं, इसमें कुछ भी गलत नहीं है। अब्दुल्ला से पूछा जाना चाहिए कि यदि इन कश्मीरी युवाओं का शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं को छोड़ पत्थर उठाकर अपने ही देश के जवानों से लड़ना उनको जायज लग रहा, तो वे खुद और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला पढ़-लिखकर राजनीति में क्यों हैं; क्यों नहीं पत्थर उठाकर कश्मीर की तथाकथित आज़ादी के नेक काम में लग जाते हैं ?

जम्मू-कश्मीर के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके फारुक अब्दुल्ला ने श्रीनगर में उपचुनाव के दौरान मतदान से पहले और बाद में एक अंग्रेजी अखबार को साक्षात्कार दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि भाजपा के नेतृत्व में सांप्रदायिक ताकतें प्रबल हो रही हैं और इसका नुकसान कश्मीरी मुसलमानों को भी झेलना पड़ रहा है, जिनके स्वभाव में सांप्रदायिकता नहीं है और जो आपसी भाईचारे में विश्वास रखते हैं। हालांकि वे इसपर खामोश ही रह गए कि कश्मीरी पंडितों को जब घाटी से खदेड़ा गया था, तब उनके मुस्लिमों की सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता कहाँ गयी थी? विकास, बिजली, सुदृढ़ अर्थव्यवस्था की बजाय उन्होंने मुसलमानों  के हितों को तवज्जों देना वक़्त की मांग बताई। इसे ऐसे कहें तो गलत नहीं होगा कि वे अप्रत्यक्ष रूप से मुस्लिम तुष्टिकरण की वकालत कर रहे थे।

गौरतलब है कि 9 अप्रैल को श्रीनगर में उपचुनाव होने थे, जिसका अलगाववादियों ने विरोध किया। इस दौरान हिंसा भड़क गयी और कुछ मतदान केन्द्रों पर आग लगा दी गयी। हालांकि सुरक्षा बालों ने उचित कदम उठाते हुए स्थिति को काबू में कर लिया। श्रीनगर से खुद फारुक अब्दुल्ला चुनाव लड़ रहे थे और उन्होंने अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा तथाकथित ‘कश्मीरियत’ को संरक्षित करना बताया था, जिसमें उन्होंने मुस्लिम बहुल राज्यों के लिए मौजूदा हालत में अपना दर्जा इसी रूप में कायम रखने को एक चुनौती माना था। खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने वाले अब्दुल्ला इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि उनके जीत हासिल करने में जमात-ए-इस्लामी का सहयोग अहम भूमिका निभाएगा। अब यह किस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता है, इसे वे ही समझा पाएंगे।

अब्दुल्ला ने कश्मीरी पत्थरबाजों को सही बताते हुए कहा कि वे अपने मुल्क की आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं, इसमें कुछ भी गलत नहीं है। अब्दुल्ला से पूछा जाना चाहिए कि यदि इन कश्मीरी युवाओं का शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं को छोड़ पत्थर उठाकर अपने ही देश के जवानों से लड़ना उनको जायज लग रहा, तो वे क्यों नहीं खुद अपने बेटे समेत इस हुजूम का नेतृत्व करने उतर जाते हैं ? वे खुद और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला पढ़-लिखकर राजनीति में क्यों हैं; क्यों नहीं पत्थर उठाकर कश्मीर की तथाकथित आज़ादी के नेक काम में लग जाते हैं ?

दरअसल एमबीबीएस कर चुके फारुक अब्दुल्ला भी उन अलगाववादी नेताओं जैसे दोहरे चरित्र का प्रदर्शन कर रहे हैं, जो कश्मीर की तथाकथित आज़ादी के नाम पर आम कश्मीरियों के बच्चों को तो शिक्षा प्राप्त करने से रोकते हैं, वहीं अपने बच्चों को बेहतरीन शिक्षा के लिए विदेश तक भेजने से नहीं हिचकते। अभी कुछ दिन पहले ऐसे ही अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी का दोहरा चरित्र तब सामने आया था, जब एक तरफ तो उनकी हुर्रियत कश्मीर में स्कूलों को बंद करवा रही थी, तो दूसरी तरफ गिलानी अपनी पोती को सुरक्षा इंतजामों के बीच परीक्षा दिलवा रहे थे। बस यही दोहरा चरित्र फारुक अब्दुल्ला जैसे नेताओं का भी है।  

बहरहाल, अब्दुल्ला के अनर्गल बोल इतने पर ही नहीं रुके, उन्होंने भारत-पाक के कश्मीर विवाद का हल भी सुझा दिया। उनके अनुसार भारत-पाक के कश्मीर विवाद में यदि अमेरिका मध्यस्थ होकर इस विवाद को सुलझा सकता है, तो इसमें कुछ गलत नहीं है। अब्दुल्ला की नज़र में यह स्वागतयोग्य पहल है। हालांकि केंद्र ने इसपर पहले ही अपने रुख को साफ़ कर दिया है कि यह भारत-पाक का आंतरिक मामला है, जिसका हल केवल भारत-पाक को ही निकालना है। भारत हमेशा से अपने इस मसले में किसी तीसरे पक्ष का विरोध करता रहा है, मगर अब्दुल्ला साहब तो जैसे देश की नीतियों और विचारों के खिलाफ बोलना तय कर लिए हैं। सो, विवाद सुलझाने के लिए अमेरिका का स्वागत भी कर दिए।

इस साक्षात्कार में अब्दुल्ला ने कहा कि यदि वे जीते तो सभी प्रतिपक्षियों के गठजोड़ से सांप्रदायिक ताकतों जो उनकी नज़र में भाजपा है, का मुकाबला करेंगे। जाहिर है, उनकी समझ से परे है यह बात कि देश की जनता खुद भाजपा के साथ खड़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडे पर न केवल कश्मीर, बल्कि देश का पूरा युवा वर्ग भी उनका समर्थन करता है। ऐसे में यदि अब्दुल्ला साहब हार के डर से श्रीनगर में हिंसा कर रहे तत्वों का समर्थन कर और अनर्गल बयान दे कर स्थिति को अपने पक्ष में करना चाहते हैं, तो उन्हें जितनी जल्दी हो सके इस भ्रम से बाहर आ जाना चाहिए।

(लेखिका पत्रकारिता की छात्रा हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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