नक्सलगढ़ की छाती पर सवार हो रही सड़कें

इस बात में कोई संदेह नहीं कि सड़कें धीमी गति से ही सही, नक्सलगढ़ की छाती पर सवार हो रही हैं और परिवेश बदल रहा है। भय का वातावरण सड़कों  के आसपास से कम होने लगा है। रणनीतिक रूप से पहले एक कैम्प तैनात किया जाता है, जिसे केंद्र में रख कर पहले आस-पास के गाँवों में पकड़ को स्थापित किया जाता है। आदर्श स्थिति निर्मित होते ही फिर अगले पाँच किलोमीटर पर एक और कैम्प स्थापित कर दिया जाता है। इस तरह जैसे-जैसे फोर्स आगे बढ़ रही है, वह अपने प्रभाव क्षेत्र में सड़कों की पुनर्स्थापना के लिये मजबूती से कार्य भी कर रही है।

सुकमा में इस सोमवार को पुन: उसी परिक्षेत्र में नृशंस घटना हुई,  जिसमें सीआरपीएफ की चौहत्तरवीं बटालियन के छब्बीस जवान शहीद हो गये जहाँ पूर्व में भी ऐसी ही बड़ी वारदातों को अंजाम दिया गया है। इन्हीं जंगलों में नक्सलियों द्वारा वर्ष 2010  में छिहत्तर जवानों की हत्या की घटना पर अब इस देश ने विस्मृति की राख बिछा दी है। कुछ दिनों की खामोशी के पश्चात हमारे जवान फिर मरने के लिये जंगलों जंगलों भटकेंगे और उनके मनोबल को तोड़ने की कहानियाँ गढ़ने वाले विचारधारा विशेष के गिरोह फिर सक्रिय हो कर जन-मानस की स्मृतियों से इन बलिदानों के असर को समाप्त करने की अपनी रणनीतियों में जुट जायेंगे।

नक्सलवाद के लिये सबसे बड़ा खतरा है – सड़कें। इस घटना के पीछे के तथ्यों को देखा जाये तो वह स्थान जहाँ चिंतागुफा और बुरकापाल के निकटवर्ती स्थानों में सड़क निर्माण का कार्य प्रगति पर है, वहाँ सीआरपीएफ की पेट्रोलिंग पार्टी सुरक्षा तथा निर्माण कार्य को गति प्रदान करने के लिये नियुक्त थी। लाल आतंकवादी रणनीति होती है कि वे तीन गुणा अधिक ताकत से हमला करते हैं जैसा कि वर्तमान घटना है, जिसमें निन्यानवे जवानों पर घात लगा कर लगभग तीन सौ नक्सलियों ने हमला किया।

साभार : गूगल

घटनाक्रम की जड़ों में ध्यान दिया जाये तो पिछले कुछ समय से सड़कें बड़ी भूमिका में सामने आयी हैं। हाल के दिनों में मैंने वर्तमान घटना स्थल के दूसरे छोर पर दंतेवाड़ा की ओर से जगरगुण्डा के लिये बन रही सड़क का स-विस्तार जायजा लिया था और उसके परोक्ष में ग्रामीण हालातों और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों पर विवेचना करने का प्रयास किया था। मेरे लिये तब सु:खद आश्चर्य था कि दंतेवाड़ा-अरनपुर मार्ग में बदला हुआ वातावरण था। शहादत की अनेक कहानियाँ इस सड़क निर्माण के साथ जुड़ी हुई हैं।

ग्रामीण बताते हैं कि बिछाई गयी बारूद को तलाश-तलाश कर और भविष्य में मौत देने की तैयारियों के लिये लगाये गये सैंकड़ों विस्फोटकों को डिफ्यूज करते हुए डामर बिछाया गया है। अब दंतेवाड़ा जिले की आखिरी सीमा अर्थात अरनपुर पहुँचना सहज हो गया है। इस रास्ते से आगे बढ़ते हुए सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि जगरगुण्डा में राशन और आवश्यक सामान पहुँचाने के लिये क्यों पंद्रह सौ जवानों को जान पर खेल कर यह संभव बनाना पड़ता है। दोरनापाल से जगरगुंडा,  दंतेवाड़ा से जगरगुंडा और बासागुड़ा से जगरगुंडा तीनो ही पहुँच मार्ग इस तरह माओवादियों द्वारा अवरोधित किये गये हैं कि जगरगुण्डा एक द्वीप में तब्दील हो गया है, जहाँ सघन सुरक्षा में किसी खुली जेल की तरह ही जन-जीवन चल रहा है।

इस बात में कोई संदेह नहीं कि सड़कें बहुत धीमी गति से ही सही, नक्सलगढ़ की छाती पर सवार हो रही हैं और परिवेश बदल रहा है। भय का वातावरण सड़कों  के आसपास से कम होने लगा है। रणनीतिक रूप से पहले एक कैम्प तैनात किया जाता है, जिसे केंद्र में रख कर पहले आस-पास के गाँवों में पकड़ को स्थापित किया जाता है। आदर्श स्थिति निर्मित होते ही फिर अगले पाँच किलोमीटर पर एक और कैम्प स्थापित कर दिया जाता है। इस तरह जैसे-जैसे फोर्स आगे बढ़ रही है, वह अपने प्रभाव क्षेत्र में सड़कों की पुनर्स्थापना के लिये मजबूती से कार्य भी कर रही है।

साभार : गूगल

एक जानकारी के अनुसार इस क्षेत्र में केवल ग्यारह सड़कें दो सौ पैंतीस टुकड़ों में तैयार की जा रही हैं। अरनपुर कैम्प में सुरक्षा बलों के साथ समय गुजारते हुए मैंने उनके द्वारा अपने कार्यक्षेत्र की परिधि में किये जा रहे सामाजिक-आर्थिक कार्यों का जायजा लिया था। स्वास्थ्य सुविधा, साईकिल वितरण अन्य आवश्यक सामानों की आपूर्ति जैसे अनेक कार्य नक्सलियों से मोर्चा लेने के साथ-साथ समानान्तर रूप से सिविक एक्शन के तहत उनके द्वारा किये जा रहे हैं। मैंने यह महसूस किया कि ग्रामीणों को जैसे-जैसे सुरक्षा का अहसास हो रहा है उन्होंने माओवाद के स्थान पर मुख्यधारा को अपने पहले विकल्प के तौर पर चुना है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि सड़कें बेहतर तरीके से माओवाद के विरुद्ध लड़ाई में अपना योगदान दे रही हैं।

हमारी सशस्त्र ताकतें आरोपों के निरंतर घेरे में काम करती हैं। एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया गया है कि नक्सलवाद से लड़ने वाला प्रत्येक जवान या तो बलात्कारी है अथवा हत्यारा। इस कहन को इतनी चतुराई के साथ वैश्विक मंचो पर प्रस्तुत किया जाता है कि अनेक बार मैं दिवंगत आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा के मेरे द्वारा लिये गये आखिरी साक्षात्कार की इन पंक्तियों से सहमत हो जाता हूँ कि नक्सलवाद के विरुद्ध मैदानों में पायी गयी जीत को बहुत आसानी से दिल्ली में बैठ कर केवल पावरपोईंट प्रेजेंटेशन से पराजित किया जा सकता है। उदाहरण के लिये ताडमेटला में हुई घटना पर कानून अपना काम निर्पेक्षता से कर रहा है और बस्तर में लाल-आतंकवाद को पोषित करने वाली बौद्धिक धारायें आक्रामकता से।

रेखांकित करें कि जैसे-जैसे नक्सलवाद के विरुद्ध जमीनी लड़ाईयां तेज होंगी बहुत शातिरता के साथ सुरक्षाबल और उसके अगुवा लोगों को विलेन बनाने की साजिशें भी बल पकड़ेंगी, क्योंकि बस्तर में लड़ाई केवल हथियारों से नहीं बल्कि मानसिकता और मनोविज्ञान के हर स्तर पर लड़ी जा रही है, जो पक्ष कमजोर हुआ धराशायी हो जायेगा। इसी परिप्रेक्ष्य की बस एक कड़ी है वर्तमान सुकमा हमला। हम जैसे-जैसे मानसिक और मनोवैज्ञानिक लडाईयों में पराजित होते रहेंगे, वैसे-वैसे फिर से उठ खड़ा होगा नक्सलगढ़। जवान कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं…मैं शहादत को नमन करता हूँ।  

(लेखक पेशे से वैज्ञानिक हैं। प्रख्यात लेखक हैं। दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)

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