हिंदी के विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम में बदलाव की जरूरत

हिंदी के विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम जाति-विद्वेष, सांस्कृतिक विद्वेष और धर्म-विद्वेष को बढ़ावा देनेवाले पाठ्यक्रम हैं। इन पाठ्यक्रमों में हमारे सांस्कृतिक नायकों और मूल्यों के प्रति द्वेष को बढ़ावा दिया गया है। घृणा के कृत्रिम केन्द्र तैयार किये गए हैं। तथाकथित सवर्णों, विषयों और मिथकीय प्रतीकों को घृणा का केंद्र बनाकर पाठ्य-पुस्तकें लगाई गई हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ कि हिंदी के विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों को ‘डी टॉक्सिपफाई’ करना पड़ेगा। पाठ्यक्रमों के माध्यम से वामपंथी वैचारिक दुराग्रहों और राजनीतिक निहितार्थों को पूरा करने का जो कुचक्र चल रहा है – उसे समझना होगा।

सन् 1990 ई. में हिंदी में औपचारिक नामांकन हुआ. बी.ए, एम.ए, एम.फिल, पीएच. डी. फिर अध्यापन। समय बदला, देश का मिजाज बदला, पर हिंदी के विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम का स्वर नहीं बदला। वही प्रलेस, जलेस-मार्का कार्यकर्ता-अध्यापक लोग, वही पात्रों के वर्ग-चरित्र की व्याख्याएँ, वही द्वन्द्व खोजने की वृत्ति बनी रही। बदलने के नाम पर यौनिकता, लैंगिकता, स्त्री-देह और जातिवाद पर शोध करने को बढ़ावा देने की वृत्ति बढ़ी। ऐसा लगा जैसे हिंदी-समाज की बाकी समस्याएँ खत्म हो गईं और सेक्स ही सबसे बड़ी समस्या है।

हिंदी के क्रांतिकारी, कार्यकर्ता-आचार्यों को देख लीजिए, उनके शोध-विषय स्त्री-देह, स्त्री-समलैंगिकता, पुरुष-समलैंगिकता जैसे विषयों पर ही केंद्रित हैं। मेरी मान्यता है कि हिंदी के विभाग सेक्सुअली पोवर्टेड  और सेक्स ऑब्सेस्ड विभाग हैं। इसकी छाया हिंदी के पाठ्यक्रमों में देखी जा सकती है।

मेरा आरोप है कि देश के विश्वविद्यालयों का हिंदी पाठ्यक्रम एक निम्नस्तरीय राजनीतिक चेतना (थर्ड रेट पॉलिटिकल कान्ससनेस) का विभाग है। सिवान, बलिया, बनारस, गोपालगंज, जीयनपुर और गोपालन भवन से आए हुए लुगदी मार्का आचार्यों द्वारा पचास-साठ के दशक से उधार लिए गए शब्दों से बना, किसी द्विवेदी जी या किसी सेठ के यहाँ चटनी बनाते हुए सीखे गए वर्ग-विरोध, वर्ग-संघर्ष, बुर्जुआ, सर्वहारा, क्रांति की शब्दावली से बना हुआ यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को सामाजिक वास्तविकता से दूर करने वाला है। हिंदी क्षेत्र के गरीब विद्यार्थियों में यह पाठ्यक्रम अनावश्यक आक्रामकता पैदा करता है।

सांकेतिक चित्र

हिंदी की विश्वविद्यालयी शिक्षा अपनी शरण में आये विद्यार्थियों को समाज, पूँजी और व्यवस्था के प्रति अनावश्यक रूप से आक्रामक बनाती है। हमारा विद्यार्थी जो पढ़कर जाता है, वह व्यवस्था के किसी काम का नहीं; चाहे वह पत्राकारिता की पढ़ाई हो या अनुवाद की। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए विश्वविद्यालय से निकलने के बाद उसे एक अनलर्निंग की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यही कारण है कि हिंदी का विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम समाज और सच्चाई से कटा हुआ पाठ्यक्रम है।

समाज और हिंदी विभागों की लड़ाई में समाज जीत गया, विभाग हार गये। समाज के कवि हिंदी के पाठ्यक्रमों के कवि नहीं हैं और हिंदी पाठ्यक्रमों के कवि समाज के कवि नहीं हैं। मैं तो अक्सर कहता हूँ कि विश्वविद्यालयों के हिंदी-विभागों में ‘महान’ बनाने का एक ‘बौद्धिक उद्योग’ चलता है। गोपालगंज, बनारस, सिवान, बलिया और खुर्जा से आया हुआ विद्यार्थी बीस हजार की नौकरी मांगता है, तो पाठ्यक्रम सिखाते हैं कि कवि बन जाओ, जलेस-प्रलेस मार्का आलोचक बन जाओ या फिर किसी आचार्य जी के यहाँ गमले में पानी डालो और फेसबुक पर ‘वाह-वाह’ करो।

विभागों का काम कवि बनाना और कहानीकार बनाना नहीं है। जिसे कवि और कहानीकार बनना होगा, वो किसी आचार्य जी के गमले के भरोसे नहीं बैठेगा। विश्वविद्यालयों का काम विद्यार्थी को ‘इम्पावर’ करना है; उसे तैयार करना है कि वह समाज की चुनौतियों का मुकाबला कर सके और अपने लिए दो जून की रोटी तलाश सके।

हिंदी के विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों को विद्यार्थियों के हिसाब से बदलना होगा। मैं अक्सर कहता हूँ आचार्य जी लोगों से कि इस यौनिकता और चेतना मार्का विमर्श से बाहर निकलिए और सत्रह साल के बच्चे की आँख से दुनिया देखिए जो अभी-अभी महाविद्यालय में हिंदी पढ़ने आया है। दो लाख रुपये वेतन लेकर समाज के मुख्यधारा में पीछे छूट गए विद्यार्थी को ‘आह’ और ‘वाह’ सिखाना, देश के करदाता का पैसा ‘रामदास’ और ‘चाँद का मुंह टेढ़ा है’ जैसी चीजों पर बर्बाद करना एक बौद्धिक घोटाला है। पचास वर्ष के हिंदी का विश्वविद्यालयी-पाठ्यक्रम अनवरत चल रहे इस बौद्धिक घोटाले का साक्ष्य है। हिंदी को बचाना है, तो उसे उस पूँजी और तकनीक के इलाके में प्रवेश करना होगा।

हिंदी को तकनीक के इलाके में प्रवेश करना होगा (सांकेतिक चित्र)

हिंदी के विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम जाति-विद्वेष, सांस्कृतिक विद्वेष और धर्म-विद्वेष को बढ़ावा देनेवाले पाठ्यक्रम हैं। इन पाठ्यक्रमों में हमारे सांस्कृतिक नायकों और मूल्यों के प्रति द्वेष को बढ़ावा दिया गया है। घृणा के कृत्रिम केन्द्र तैयार किये गए हैं। तथाकथित सवर्णों, विषयों और मिथकीय प्रतीकों को घृणा का केंद्र बनाकर पाठ्य-पुस्तकें लगाई गई हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ कि हिंदी के विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों को ‘डी टॉक्सिपफाई’ करना पड़ेगा।

पाठ्यक्रमों के माध्यम से वामपंथी वैचारिक दुराग्रहों और राजनीतिक निहितार्थों को पूरा करने का जो कुचक्र चल रहा है – उसे समझना होगा। हिंदी साहित्य का भविष्य हो ना हो, हिंदी भाषा का भविष्य अवश्य है। हिंदी विभागों को अगर बचाना है, तो उन्हें हिंदी भाषा, हिंदी पत्रकारिता, हिंदी अनुवाद और हिंदी रंगमंच के विभागों में बदलना होगा। सिर्फ ‘कच्ची सड़क के गाँव के ओर जाने’ और ‘बैगन के खेत में शौच करने’ के ठाकुर साहेब मार्का किस्सों से ना तो हिंदी का भला होगा, ना हिंदी पढ़ानेवालों का।

(लेखक हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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12 thoughts on “हिंदी के विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम में बदलाव की जरूरत

  1. बहुत ही आक्रामक भाषा और प्रभावशाली शैली में वर्तमान हिंदी विभागों एवं पाठयक्रम की सटीक आलोचना की है आपने…. बधाई हो सर जी

  2. Bahut hi saral aur sateek shabdo me Hindi vibhago me chal rahe shodh karyo ki bidmbana ko Ankit kiya ….badhai ho sirr

  3. बहुत ही असरदार एवं सारगर्भित लेख।ये वर्तमान समय की मांग है कि हिंदी साहित्य को विभिन्न प्रकार के दुश्चक्रों से मुक्त किया जाय।विमर्शों के जाल में उलझकर साहित्य की आत्मा ही मृत हो जाती है।अतः सर का यह लेख प्रासंगिक और प्रसंशनीय है।हार्दिक बधाई।

  4. वैचारिकी अनुसंधानात्मक और अनुभवनात्मकता के साथ गुरुवर चंदन सर की दिग्दृष्टि को नमन

  5. सर आपने कबीर शैली में अपनी बात बेबाकी से रखा है और ये बेबकीपन की वर्तमान समय मे अपरिहार्य हो गयी है।बौद्धिक समाज का सोच कुछ विमर्शो तक सीमित होती जा रही है।कुएं का मेढक वाली स्थिति उसके अलावा वे और कुछ चिंतन में शमिल ही नही करना चाहते।एक कविता याद आ गयी-सबसे पहले मेरे घर का अंडे जैसा था आकर तब मैं यही समझती थी बस इतना सा ही है संसार।जब मैं उड़ी अधिक दूर तक पंख पसार तब समझ में मेरी आया बहुत बड़ा है यह संसार।।

  6. Badhai ho sir Mai DU k tras ka bhukt bhogi hu.aapne hame urja de di krapya muje apna pH. No. De

  7. Good morning sir
    No doubt, syllabus should be changed every year for the betterment of the society but not for revenge of any caste and religion.syllabus should be changed in such a manner that students can get job opportunity,they can develop their skill and also sustain in the market.

  8. नमस्कार सर। आपका यह आलेख तीन दिन पूर्व ही सरसरी तौर पर पढ़ लिया था, मगर जहाँ एक तरफ पिताजी को रोज अस्पताल ले जाना और ले आना, व्यवधान उपस्थित करता था, वहीं दूसरी तरफ आपका लेख बार – बार मेरे मानसपटल पर अपना अमिट छाप छोड़ जाता था और आज मेरे भीतर का कोलाहल अभिव्यक्ति के लिए कसमसाने लगा।
    गुंथन-मंथन की प्रक्रिया में मैंने पाया कि जितनी साफगोई और बेबाकी से इस सूक्ष्म और जटिल विषय को लेखक ने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है, उससे कहीं ज्यादा उसकी स्पष्टवादिता और निर्भीकता का पता चलता है। आजादी से लेकर अब तक यानी 68 वर्ष बाद भी एक पूरी की पूरी पढ़ी-लिखी पीढ़ी सेक्स, अधिकारता , पूंजी और व्यवस्था संबंधी समस्याओं पर अंधाधुंध अनुसंधान करते – करते स्वयं समस्याग्रस्त हो गई या बना दी गई।हमारे प्राचीन मनीषियों द्वारा निर्मित तर्काधारित मूल्यों को क्षत-विक्षत कर स्वतंत्रता के नाम पर स्वच्छंदता का पाठ पढ़ाया जाने लगा। अधर्म को ही धर्म समझ कर उसकी खिल्लियाँ उड़ायी जाने लगी। उसी का नतीजा है कि आज रिश्ते – नाते करक – दरक रहे हैं और मनुष्य अजनबीपन, अकेलापन, घूटन, ऊब, मनोरोग का शिकार हो गया है। ऐसे में जब तक इस आदमखोर, नरकुंड पाठ्यक्रम का बदलाव नहीं हो जाता और हमारे शाश्वत मूल्यों को प्रत्येक मनुष्य जीने नहीं लगता, तब तक लेखक का यह आलेख प्रासंगिक बना रहेगा।

  9. अच्छा लगा कि ” नेशनलिस्ट ऑनलाइन ” के मंच से साहित्य के माफिया गुटों के विरुद्ध प्रो. चन्दन कुमार जी ने एक मजबूत आवाज उठाई है | प्रो चन्दन कुमार जी का यह लेख माफियाई रंग-ढंग के प्रति व्यापक रोष का प्रकटीकरण है| ————————————————————————————————————————————मैं नहीं समझता कि साहित्य में माफिया गुट की मौजूदगी और उनकी कारगुजारियों से आज का कोई भी सजग शोधार्थी या छात्र अनजान होगा | समय समय पर कई लोंगों ने इनके विरोध में दबी-दबी ही सही, आवाज जरुर उठाई है| साहित्यिक मूल्य क्षरण की इस वेला में कहीं से एक बुलंद आवाज उठाने वाले की दरकार हम जैसे साहित्य प्रेमियों को अवश्य थी-सो प्रो. चन्दन कुमार जी का लेख एक जड़ व्यवस्था पर कुठाराघात करने वाला लगा ,समयानुकूल व प्रासंगिक लगा | ————————————————————————————————————————————अध्यापक समाज का एक ऐसा सदस्य है जिससे ईश्वरीय न्याय, ईश्वरीय प्रेम, करुणा और संवेदना की अपेक्षा की जाती है | इससे कम कुछ भी नहीं | लेकिन हिंदी विभाग के अधिकांश अध्यापकों की शैली पर नज़र दौराये तो वे छात्र के रूप में नहीं अपितु इक कंज्यूमर के रूप में देखते हैं | उसे तरह-तरह की कुण्ठित मनोकामनाएं की पूर्ति का माध्यम मानते हैं | उनसे ऐसी-ऐसी अपेक्षाएं रखते हैं, जिसे पूरा करना किसी भी स्वाभिमानी व राष्ट्रवादी छात्र-छात्राओं की बूते की बात नहीं नहीं है | मटुक परम्परा के रसिक अध्यापकों की हसरतें जब पूरी नहीं हो पाती तो वे उल्टे तोहमत मढ देते हैं कि आज का विद्यार्थी वर्ग जागरूक नहीं है| उनकी जागरूकता का आशय अधिकांश शोधार्थी भलीभांति समझते है| ———————————————————————————————————————————- वक़्त का तकाजा है कि ऐसे शिक्षकों को बेनकाब किया जाये| प्रगतिशीलता का लबादा ओढकर यौनिकता का अपूर्व आनंद लूटने वाले शिक्षकों से हिंदी विभाग को बचाया जाये| ” कितनी नावों में कितनी बार ” का पाठ रसास्वादन लेकर पढ़ाने व लपलपाते होठों से मनमाफिक व्याख्या करनेवाले वामपंथी शिक्षकों से सावधान रहने की जरुरत है|

  10. अच्छी पहल है।पाठ्यक्रम समाज,देश को जोड़ने वाले हों केवल संघर्ष पैदा करने वाले नहीं।

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