जीएसटी का विरोध करने वाले विपक्षी दल नोटबंदी के विरोध जैसी भूल कर रहे हैं !

विपक्षी दल यह भूल रहे हैं कि जीएसटी संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित हुआ विधेयक है। इसके अलावा जीएसटी काउंसिल की अट्ठारह बैठकों में विधेयक से जुड़े हर मसले पर गहन विचार विमर्श हुआ और हर मसले पर काउंसिल के सदस्यों में आम सहमति बनी। एक भी बिंदु ऐसा उभर कर सामने नहीं आया, जिसपर वोटिंग की नौबत आए। साफ है कि जीएसटी को लागू करने से पहले सरकार ने सबको भरोसे में लिया। फिर कुछ विपक्षी दल किस आधार पर इसका विरोध कर रहे, यह समझ से परे है।

तीस जून की आधी रात देश में जीएसटी लागू हो गया। संसद के सेन्ट्रल हाल में एक भव्य आयोजन किया गया। हालांकि कांग्रेस एवं वामपंथी दलों समेत कई विपक्षी दलों ने इस कार्यक्रम का बेजा विरोध किया। देश इस आर्थिक सुधार के एतिहासिक क्षण का गवाह बना। ‘एक राष्ट्र एक कर’ के नारे के साथ जीएसटी समूचे देश में लागू हो गया। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह यह जरूरी है कि विपक्ष भी अपनी रचनात्मक भूमिका अदा करे। परन्तु, विपक्ष हर मसले पर निरर्थक विरोध को आतुर नज़र आता है।

जीएसटी लागू होने के अवसर पर संसद भवन में देश के कई गणमान्य नेताओं व अलग-अलग क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही, लेकिन कांग्रेस, ममता और वामदल इस समारोह में आमन्त्रण के बावजूद नदारद रहे। उनका तर्क है कि जीएसटी लाने में सरकार जल्दीबाजी दिखा रही और दूसरा तर्क है कि इससे आम जनता और व्यापारी वर्ग परेशान होंगें। विपक्ष की यह दोनों दलीलें अपने आप में हास्यास्पद हैं।

यह जगजाहिर है कि जीएसटी का सफरनामा काफी लंबा रहा है। मुख्य रूप से यह विधेयक पिछले एक दशक से अधिक समय तक राजनीतिक चंगुल में उलझता चला गया। किन्तु, उसके बाद केंद्र में आई मोदी सरकार ने विपक्ष के हर कदम पर विरोध के बावजूद  इस विधेयक को लाने के लिए हर स्तर पर आम सहमति कायम करने के लिए प्रयास किया और आख़िरकार इस विधेयक को लागू करने में सफलता अर्जित की।

सरकार की कोशिशों का ही परिणाम है कि आज देश सबसे बड़े आर्थिक सुधार की ओर बढ़ गया है। ऐसे में इसका विरोध करने वाले विपक्षी दल यह भूल रहे हैं कि जीएसटी संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित हुआ विधेयक है। इसके अलावा जीएसटी काउंसिल की अट्ठारह बैठकों में विधेयक से जुड़े हर मसले पर गहन विचार विमर्श हुआ और हर मसले पर काउंसिल के सदस्यों में आम सहमति बनी। एक भी बिंदु ऐसा उभर कर सामने नहीं आया, जिसपर वोटिंग की नौबत आए। साफ है कि जीएसटी को लागू करने से पहले सरकार ने सबको भरोसे में लिया। फिर कुछ विपक्षी दल किस आधार पर इसका विरोध कर रहे, यह समझ से परे है।

अब कुछ देर के लिए अगर हम यह मान भी लें कि जीएसटी से आम जनता और व्यापारी वर्ग की परेशानियाँ बढ़ने वाली हैं, तो फिर सवाल यह उठता है कि कांग्रेस व अन्य विरोधी दलों ने इस विधेयक को पारित क्यों होने दिया ? संख्याबल की दृष्टि से देखें तो राज्यसभा में बिना विपक्ष के समर्थन के कोई विधेयक पारित करवाना टेढ़ी खीर है। ऐसे में, जब विपक्ष ने इसे पारित करवा दिया है, तो फिर इसका किस आधार पर विरोध कर रहा ? निश्चित तौर पर अब जीएसटी का विरोध विपक्ष की बड़ी राजनीतिक भूल है।

खैर, नोटबंदी से परेशानी की अफवाह की तरह ही कुछ दिनों में विपक्ष द्वारा फैलाए जा रहे इस अफवाह की भी हवा निकल जाएगी कि जीएसटी से आम जनों को को दिक्कत होगी। दरअसल, यह विपक्ष का दोहरा रवैया ही है कि एकतरफ संसद में इस विधेयक को समर्थन देकर पारित करवाया, तो वहीं दूसरी तरफ जब इसे लागू करने का अवसर आया तो इसका बेजा विरोध करने में लगा है।

विपक्ष इसे राजनीतिक चश्मे से देखने का प्रयास कर रहा और इसके राजनीतिक लाभ के अवसर को तलाशने में लगा हुआ है। पर, इससे विपक्ष को राजनीतिक लाभ बराबर नील बटे सन्नाटा से अधिक कुछ नहीं मिलेगा। जनता अपना हानि-लाभ बाखूबी समझती है, इस बात का प्रमाण वो नोटबंदी के बाद दे चुकी है। मगर विपक्ष है कि जीएसटी का विरोध करके नोटबंदी का विरोध करने जैसी भूल फिर कर रहा है।

इस ऐतिहासिक अवसर की भागीदारी से विपक्ष द्वारा स्वयं को वंचित कर लेना उसकी ऐतिहासिक भूल है। गौर करें तो विपक्ष को यह डर सता रहा है कि मोदी सरकार जीएसटी का पूरा श्रेय ले लेगी और उसको राजनीतिक तौर पर भारी लाभ मिल जायेगा। यह विपक्ष की छोटी सोच का नमूना है।

जहाँ तक श्रेय लेने की बात है, तो इसपर वित्तमंत्री, प्रधानमंत्री कई बार बोल चुके हैं कि यह सभी दलों के सामूहिक प्रयास और परिश्रम का परिणाम है। जीएसटी लागू होने के अवसर पर भी प्रधानमंत्री ने पुनः इस बात को कहा कि यह एक दल का प्रयास नहीं है, बल्कि सबके साझे प्रयासों से यह संभव हुआ है। ऐसे में विपक्ष अगर श्रेय की राजनीति के तहत इसका विरोध कर रहा तो यह भी उसकी भूल है। इससे उसे हानि छोड़कर लाभ नहीं होगा। जीएसटी अब देश में लागू हो गया है। देश इस सुधार का स्वागत कर रहा है। पर, विपक्ष द्वारा विरोध के इस स्वांग से उसकी ओछी राजनीति की झलक ही सामने आती है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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